'भारतीय ज्ञान परंपरा और विज्ञान का दर्शन’ विषयक संगोष्ठी के प्रथम दिवस में विचारों का आदान-प्रदान

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, कोलकाता केंद्र एवं भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा 28–29 अगस्त, 2025 को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और विज्ञान का दर्शन’ विषय पर गहन विमर्श हुआ। उद्घाटन एवं विभिन्न अकादमिक सत्रों में वक्ताओं ने वेद, उपनिषद, न्याय, सांख्य, वेदांत, लोक परंपरा और आधुनिक विज्ञान के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डालते हुए यह प्रतिपादित किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की वैज्ञानिक तथा दार्शनिक चुनौतियों के समाधान का आधार है। संगोष्ठी में विज्ञान और अध्यात्म, तर्क और आस्था, लोक और शास्त्र, परंपरा और आधुनिकता के बीच समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया।

Aug 29, 2025 - 17:25
Aug 29, 2025 - 18:03
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'भारतीय ज्ञान परंपरा और विज्ञान का दर्शन’ विषयक संगोष्ठी के प्रथम दिवस में विचारों का आदान-प्रदान
संगोष्ठी में सम्मिलित प्राध्यापक, अध्येता, विद्यार्थी एवं शोधार्थी

 कोलकाता, 28 अगस्त । महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय केंद्र कोलकाता और भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली ने संयुक्त रूप से 28–29 अगस्त, 2025 को राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और विज्ञान का दर्शन’ विषय पर 28 अगस्त के विभिन्न सत्रों के दौरान महत्वूपर्ण विचार रखे गए जिनमें भारतीय ज्ञान परंपरा, विज्ञान का दर्शन, संस्कृति, साहित्य, लोक, आधुनिकता, और अन्य संबद्ध विषयों से जुड़े मुद्दे शामिल थे।

उद्घाटन सत्र में विषय की रूपरेखा रखते हुए संयोजक डॉ. अमित राय ने विषय की आवश्यकता और संपृक्त का उल्लेख करते हुए बताया कि यह भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनरावलोकन का समय है, जिसमें वैज्ञानिक दृष्टियों और भारतीय तर्क पद्धतियों को साथ जोड़ने की आवश्यकता है। 'सत्य ही ईश्वर है' की गांधीवादी सोच के साथ विज्ञान के सापेक्षता और पारस्परिकता के नियम की व्याख्या करते हुए उन्होंने मानव, प्रकृति और समाज के अंतर्संबंधों को समझने के लिए भारतीय परंपरा की आवश्यकता को रेखांकित किया। साथ ही वर्तमान समय की वैज्ञानिक चुनौतियों और ज्ञान के संकट का भी संकेत दिया।

डॉ. विट्ठल दास मूँधड़ा ने वेदों, उपनिषद, वैज्ञानिक शोध, ज्योतिष, वास्तु, आयुर्वेद, विमानशास्त्र, और भारतीय विज्ञान की ऐतिहासिकता का उल्लेख किया। उन्होंने ‘ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या’ जैसे दर्शनिक सूत्र, समय की चक्रीय अवधारणा, एस्ट्रोनॉमी, एटम, एनर्जी, चेतना इन सभी का भारतीय और पश्चिमी विज्ञान से तुलनात्मक विश्लेषण किया। उन्होंने माना कि विज्ञान और दर्शन का अंततः समन्वय संभाव्य है और भारतीय ज्ञान परंपरा की फिजिक्स विषय को पुनर्निर्माण की आवश्यकता है। उन्होंने भारतीय परंपरा की निरंतरता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “भारतीय ज्ञान परंपरा सनातन है, क्योंकि इसमें आत्मा और ब्रह्म के अखंड संबंध की चर्चा है। यह दृष्टि केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक कसौटी पर भी खरी उतरती है। हमें इसे अंधविश्वास से बचाकर वैज्ञानिक चेतना के साथ प्रस्तुत करना होगा।”

डॉ. अंबिका दत्त शर्मा ने विज्ञान और भारतीय ज्ञान परंपरा के ऐतिहासिक संघर्ष, शोध प्रणाली, 64 विद्याओं, न्याय, सांख्य, वेदांत और बौद्ध-दार्शनिक ग्रंथों के उदाहरण दिए। उन्होंने आधुनिक विज्ञान की तुलनात्मकता, भारतीय दर्शन के बहुलवाद, सनातनता, संवाद और भारतीय ज्ञान के वैश्विक औचित्य को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में लोक सिद्धि और स्वरूप सिद्धि, अर्थात धर्म और मोक्ष, दोनों के संगम से उसकी आत्म प्रतिमा बनती है, जो विश्व के नैतिक और सांस्कृतिक विमर्श को नया आयाम देती है। उन्होंने आगे कहा, “भारतीय दृष्टि में धर्म, विज्ञान और कला तीनों एक ही सत्य की अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ हैं। पश्चिमी द्वैत को स्वीकार करना भारतीय परंपरा के साथ न्याय नहीं होगा। हमें यह समझना होगा कि भारतीय ज्ञान-दृष्टि सार्वकालिक और सार्वभौमिक है।”

उद्घाटन सत्र का समापन अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए पूर्व कुलपति प्रो. हनुमान प्रसाद शुक्ल ने कहा कि भारतीय दर्शन का उद्देश्य केवल मोक्ष नहीं, बल्कि समग्र जीवन का वैज्ञानिक और नैतिक संतुलन है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा नीति, वैज्ञानिक शोध और पर्यावरणीय दृष्टिकोण के साथ जोड़कर ही आगे बढ़ाया जा सकता है। आगे उन्होंने ज्ञान की अखंडता, विश्व दृष्टि की समन्वयात्मकता, सत्य और धर्म की अवधारणा, चराचर के संबंध सहित वैदिक ज्ञान की प्रकृति पर भी अपना विचार प्रस्तुत किया। उन्होंने उपनिषद, वेद, रामायण आदि शास्त्रों के साक्ष्य व तुलसीदास की चराचर की चर्चा के साथ भारतीय ज्ञान प्रणाली के वैज्ञानिक पहलू को जोड़ते हुए प्रकृति, मानव, और ब्रह्मांड के समन्वय पर प्रकाश डाला। उनके संवाद में परंपरा की बहुवचनात्मकता और वर्तमान चुनौतियों की चर्चा शामिल थी। उन्होंने आगे कहा -“भारतीय ज्ञान परंपरा की सार्थकता उसके समन्वय में है। यहाँ ज्ञान केवल शास्त्र तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन और आचरण में अभिव्यक्त होता है। आधुनिक शिक्षा नीति में इस परंपरा को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ना समय की माँग है।”

प्रथम सत्र के वक्ता अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बेंगलुरु के डॉ. आशुतोष व्यास ने भारतीय दर्शन में शब्द-ब्रह्म और नासदीय सूक्त का उल्लेख करते हुए कहा-“जैसे ही जानने की इच्छा उत्पन्न होती है, वैसे ही ज्ञाता और ज्ञेय के बीच भेद पैदा होता है। भारतीय परंपरा इस भेद को श्रुति, युक्ति और अनुभव के माध्यम से पाटने का प्रयास करती है। यही समग्रता हमारी विशिष्टता है।” 'विश्व का विचार' विषय पर बोलते हुए ‘शब्द-ब्रह्म’ की अवधारणा, भर्तृहरि के वाक्यपदीयम् के उदाहरण और नासदीय सूक्त के सन्दर्भ से ‘ज्ञान के अंतर्विरोधों’ तथा ‘विश्वास और सत्य’ के द्वैध को रेखांकित किया। उन्होंने भारतीय परंपराओं की श्रुति, युक्ति और अनुभव की प्रणाली पर बल देते हुए 'दृष्टांत' और 'लौकिक न्याय' जैसे औजारों द्वारा सिद्धांत और व्यवहार के बीच के अंतर को समझाया। उनके अनुसार ज्ञान की प्रक्रिया आश्चर्य व जिज्ञासा से शुरू होती है और भारतीय संस्कृति में शास्त्रीय और लोक दृष्ट्वि का सामंजस्य है।

विचारक प्रियंकर पालीवाल ने Blowing Point (क्वथांक) व Chintz (छींट) जैसे शब्दों के उद्गम का उल्लेख कर भारतीय परंपरा की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों को पश्चिम के संदर्भ में रेखांकित किया। उनके वक्तव्य में नैतिकता, संवेदना और मूल्यबोध पर जोर रहा। उन्होंने विज्ञान और मानविकी के द्वंद्व, सीपी स्नो के पश्चिम की ‘टू कल्चर्स’ की अवधारणा में विज्ञान और कला को अलग-अलग रखा गया, जबकि भारत की परंपरा में वे पूरक माने जाते हैं। यहाँ तकनीक तभी मूल्यवान है जब वह करुणा और प्रेम से प्रेरित हो, न कि केवल लाभ से।” उन्होंने तेनजिंग नॉर्गे और हिलेरी, तथा गांधी और सिंगर की सिलाई मशीन का उदाहरण देकर भारतीय और पश्चिमी दृष्टि के माध्यम से दृष्टिकोण के अंतर को स्पष्ट किया।

विश्वविद्यालय के जनसंचार विभागाध्यक्ष डॉ. कृपाशंकर चौबे ने भारतेंदु, महावीर प्रसाद द्विवेदी, आर्यभट, कौटिल्य, न्याय, सांख्य आदि शास्त्रों के ऐतिहासिक योगदान, शोध की भारतीय प्रविधि, नाट्यशास्त्र, पाणिनी, वासुदेव शरण अग्रवाल, औपनिवेशिकता, डिनाइजेशन, लोक-प्रतिबद्धता, समावेशिकता, और संवाद के परिप्रेक्ष्य में भारतीय ज्ञान परंपरा के आधुनिक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा - “भारतीय परंपरा में ज्ञान और नैतिकता का अलगाव नहीं है। आधुनिक शिक्षा में सिद्धांत और व्यवहार का अंतराल सबसे बड़ी चुनौती है। इसे केवल श्रुति और अनुभव के आधार पर ही पाटा जा सकता है।”

सदीनामा मासिक पत्रिका के संपादक जितेंद्र जितांशु ने भारतीय संस्कृति के ऐतिहासिक विकास, चीन के कन्फ़्यूशियस, यूनान और भारत, मार्क्स, डेमोक्रेसी, ईसा मसीह समेत कई  उदाहरणों द्वारा भाषा, संस्कृति, और विचारधारा की स्थायित्व शक्ति, विलय और पुनरुद्धार की संभावना बताई। उन्होंने लोक, साहित्य, कविता और विचार विमर्श के महत्व को सिद्ध कर, सांस्कृतिक अस्मिता, समावेशिता, और संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा-“भारतीय दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता है उसका व्यावहारिक आयाम। दृष्टांत और लौकिक न्याय जैसे उपकरण केवल शास्त्रीय तर्क नहीं, बल्कि जीवन और समाज को समझने के साधन हैं। यही भारतीय ज्ञान को जीवंत और लोकमंगलकारी बनाता है।”

प्रथम सत्र की अध्यक्षता कर रहे डॉ. अवधेश प्रधान ने विज्ञान और धर्म के रिश्ते पर स्वामी विवेकानंद के विचार के आधार पर तर्कसंगतता, परीक्षण, अनुभव और समावेशिता। सभ्यता, संस्कृति, और भाषा का ऐतिहासिक विस्तार, डीकॉलोनाइजेशन और डीमिस्टिफिकेशन की आवश्यकता। शोध दृष्टि में भारतीय श्रुति, युक्ति, अनुभव, दृष्टांत, लौकिक न्याय जैसी पद्धतियों की उपयोगिता। बहुवचनात्मकता, समावेशिता, संवाद, आस्था-विवेक और लोक की चेतना को केंद्र में रखते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुप्रयोग पर प्रकाश डाला।

प्रोफेसर संजय जायसवाल ने अपने वक्तव्य में कहा, “भारतीय ज्ञान परंपरा कोई एकरेखीय धारा नहीं है, बल्कि अनेक जातियों, भाषाओं और समुदायों की साझा यात्रा है। इसे समझने के लिए तीन दृष्टिकोण जरूरी हैं, डी-कोलोनाइजेशन, डी-मिस्टिफिकेशन और इंक्लूसिवनेस। औपनिवेशिक सत्ता ने हमारे इतिहास को विकृत किया, हमें इसे पुनः समझना होगा। साथ ही रहस्यवाद और अंधविश्वास को तार्किक व वैज्ञानिक दृष्टि से डिकोड करना होगा। धर्म और विज्ञान का संबंध आस्था और विवेक की तरह होना चाहिए। भारतीय ज्ञान परंपरा तभी सार्थक होगी जब क्लासिक ग्रंथों के साथ लोक की आवाज़ों को भी शामिल किया जाए। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है निरंतरता, समावेशिता, संवाद और आनंद का भाव।” भारतीय शिक्षा और संस्कृति के संदर्भ में उन्होंने आगे कहा, “हमारे यहाँ ज्ञान केवल पुस्तकीय नहीं, बल्कि व्यवहार और कर्म से जुड़ा है। शिक्षा तभी सार्थक है जब विद्यार्थी कक्षा से एक बदला हुआ मनुष्य बनकर निकले। भारतीय परंपरा में यही शिक्षा का आदर्श रहा है।”

द्वितीय सत्र की अध्यक्षता करते हुए विज्ञान और दर्शन के अध्येता डॉ. आलोक टंडन ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल शास्त्रों और परंपरागत धारणाओं तक सीमित कर देखने के बजाय उसे वैज्ञानिकता, तर्क और विवेक की कसौटी पर परखना होगा। उन्होंने कहा कि संस्कृति कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि एक निरंतर प्रवाह है जो इतिहास में विभिन्न प्रभावों और आदान-प्रदान से विकसित होती है। धर्म और विज्ञान के संबंध पर उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक विज्ञान का मूल्य उसकी परीक्षणशीलता और संशोधनशीलता में है, जबकि भारतीय परंपरा में अकसर रहस्यवाद और मोक्ष-केंद्रित दृष्टि के कारण सामाजिक परिवर्तन की उपेक्षा हुई। उन्होंने यह भी कहा कि हमने आधुनिक विज्ञान की तकनीक तो स्वीकार कर ली, लेकिन वैज्ञानिक चिंतन और आलोचनात्मक विवेक को नहीं अपनाया। जाति व्यवस्था और सामाजिक अन्याय की चर्चा करते हुए उन्होंने जोर दिया कि भारतीय ज्ञान परंपरा को तभी सार्थक कहा जा सकता है जब वह समता, स्वतंत्रता, भाईचारा और न्याय जैसे आधुनिक मूल्यों को आत्मसात करे। समापन में उन्होंने कहा कि संवाद, शास्त्रार्थ और आलोचना की परंपरा ही भारतीय ज्ञान संस्कृति की असली शक्ति है, और आज आवश्यकता है कि हम अपनी परंपरा की विवेकपूर्ण पुनर्व्याख्या करें ताकि वह वैश्विक संस्कृति और मानवता के लिए उपयोगी बन सके।

संगोष्ठी में सभी वक्ताओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा की समावेशी, बहुलवादी, संवादात्मक और वैज्ञानिक दृष्टि का विस्तार से विवेचन किया। भारतीय और पश्चिमी विज्ञान, दर्शन, संस्कृति व समाज के अंतर्संबंध, शोध प्रविधि, आस्था-विवेक, तर्क-संवाद, शिक्षा, और आधुनिक चुनौतियों को एक साझा अखंडता में समझने पर बल रहा। हर वक्ता के विचारों में परंपरा की निरंतरता, पुनर्रचना, समावेशिता, और लोक-जागरण की आवश्यकता उजागर हुई । उन्होंने विज्ञान और अध्यात्म के अंतर्संबंध पर जोर देते हुए कहा-आधुनिक विज्ञान और भारतीय दर्शन दोनों सत्य की खोज में लगे हैं। फर्क केवल दृष्टिकोण का है। यदि विज्ञान को नैतिकता और दर्शन का मार्गदर्शन मिले, तो वह केवल तकनीक नहीं, बल्कि मानवता के विकास का साधन बन सकता है।”

संगोष्ठी के प्रथम दिवस का निष्कर्ष रहा कि भारतीय ज्ञान-परंपरा को केवल अतीत का गौरव मानकर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के विज्ञान-दर्शन और वैश्विक चुनौतियों से जोड़कर देखना चाहिए। उल्लेखनीय है कि उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. अमरेन्द्र कुमार शर्मा, प्रथम सत्र का संचालन डॉ. राकेश मिश्र तथा द्वितीय सत्र का संचालन डॉ. एकता हेला द्वारा किया गया। इस अवसर पर प्रख्यात विद्वानों ने भारतीय विश्व-दृष्टि की महत्ता और उसकी समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।  संगोष्ठी की सफलता में डॉ. चित्रा माली के अथक प्रयास और मार्गदर्शन की विशेष भूमिका रही। साथ ही डॉ. आलोक कुमार, डॉ. दुबे एवं सुखेन के सहयोग और समर्पण ने कार्यक्रम की तैयारी एवं सफलता को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I