गणेश: गण, तंत्र और हमारे बुद्धि का दर्पण
यह लेख गणेश चतुर्थी के अवसर पर गणेश की वास्तविक प्रतीकात्मकता और गणतंत्र के बीच के रिश्ते को उजागर करता है। इसमें बताया गया है कि आज़ादी पूर्व गणेशोत्सव जनजागरण और स्वतंत्रता संग्राम का हथियार था, जबकि आज यह करोड़ों की भव्यता, ठेकेदारी और राजनीतिक दिखावे तक सीमित हो गया है।

गणपति बप्पा - मोरया या माया?
आज कोलकाता में गणेश पूजा की धूम है। कोलकाता के साथ ही साथ देशभर में 'गणपति बप्पा मोरया' के नारों से आसमान गूँज रहा है। लेकिन, ज़रा ठहरकर सोचिए, क्या केवल यह नारा लगाने से गणेश को जाना जा सकता है? या गणपति भी अब बाकी देवताओं की तरह एक 'इवेंट मैनेजमेंट इंडस्ट्री' का हिस्सा बनकर रह गए हैं? गणेश का अर्थ था गणों का नायक, जनता का नेता। लेकिन आज की राजनीति और समाज ने इस अर्थ को पलटकर रख दिया है। अब गण नहीं, तंत्र का नायक ही गण का मालिक है। संसद से लेकर थाने तक हर जगह यही हो रहा है, जनता बाहर लाइन में और तंत्र अंदर गद्दी पर।
प्लास्टिक सर्जरी वाले गणेश
गणेश के सिर पर कभी धार्मिक विमर्श होता था। पर आज 'प्लास्टिक सर्जरी' वाला जोक बनाकर नेताओं ने इसे विज्ञान-भक्ति का नमूना बता दिया। मानो गणेश की कहानी का मतलब सिर्फ़ इतना है कि भारत में शल्य चिकित्सा बहुत पुरानी थी। न बुद्धि का जिक्र, न विवेक का। यह वही है जैसे कोई गीता पढ़े और सिर्फ़ युद्धकला का प्रशिक्षण नोट कर ले, बाकी ज्ञान को कूड़ेदान में डाल दे।
आज़ादी पूर्व गणेश बनाम आज का गणेश
लोकमान्य तिलक ने जब सार्वजनिक गणेशोत्सव शुरू किया तो मंशा थी जनता को संगठित करना, अंग्रेज़ों को ललकारना और राष्ट्रीय चेतना जगाना। तब गणेश पंडाल देशभक्ति का मंच बनते थे। आज वही पंडाल ठेकेदारों, नेताओं और फूहड़ डीजे वालों का अड्डा बन गए हैं। आज़ादी से पहले गणेश जनता को जोड़ते थे। आज़ादी के बाद गणेश का त्यौहार नेता और ठेकेदार को जोड़ता है। एक ठेकेदार लाइटिंग लगाएगा, दूसरा प्रसाद का ठेका लेगा, तीसरा नेता मंच से भाषण देगा। जनता? वह अब भी वही 'गण' है, जो बाहर लाइन में खड़ा है और भीतर की व्यवस्था में झाँक भी नहीं सकता।
दिव्यता बनाम भव्यता
अब गणेश पूजा की बोली करोड़ों में लगती है। 20–20 करोड़ रुपये खर्च होते हैं, ताकि दिखाया जा सके कि किसका पंडाल बड़ा, किसका मूर्ति भारी और किसका डीजे सबसे ज़्यादा कानफाड़ू है। गणेश की दिव्यता कब की खत्म हो चुकी है, अब केवल भव्यता का 'रियलिटी शो' बचा है।
लोग चूहे के कान में फुसफुसाकर मनोकामना माँगते हैं। यह दृश्य देखकर कभी लगता है कि अगला चरण आएगा जब लोग उल्लू के कान में भी इच्छा जताने लगेंगे। शुक्र है, अभी तक वह 'प्रोजेक्ट' लॉन्च नहीं हुआ है।
प्रतीकों की हत्या
गणेश का वाहन चूहा, और लक्ष्मी का उल्लू, ये प्रतीक थे कि बुद्धि और धन दोनों को यदि विवेक से न संभाला जाए तो वे इंसान को चूहा या उल्लू बना देंगे। लेकिन हमने प्रतीकों का मतलब समझने के बजाय उन्हें 'फुसफुसाहट ATM मशीन' बना दिया है। अब चूहा देवता है, उल्लू प्रतीक नहीं, शुभ पक्षी है। यह सब देखकर शायद स्वयं गणेश भी सोचे होंगे,'गण तो गया, तंत्र ही बचा है!'
जनता की सरलता और ठगी
भारत का आम आदमी बेहद सरल है। वही सरलता जो उसे आज़ादी के आंदोलन में वीर बना देती है, वही सरलता आज उसे नारों और लाइटों के जाल में फँसा देती है। लेकिन, यही सरलता उसकी ताक़त भी है, क्योंकि उसमें कल्पना की अद्भुत क्षमता है। सवाल सिर्फ़ यह है कि वह कल्पना कब नारों और तमाशे से बाहर आकर बुद्धि की रोशनी में प्रवेश करेगी।
गणेश का असली संदेश
गणेश का संदेश था-बुद्धि से ही गणतंत्र चलता है। लेकिन हमने बुद्धि को छोड़कर अंधविश्वासों, भव्य आयोजनों और ठेकेदारी धर्म पर भरोसा कर लिया। अब गणेश पूजा का मतलब है भीड़, पैसा, डीजे और राजनेता की फोटो। जब तक गणेश को 'मोदकप्रिय भोजनरसिक देवता' और 'प्लास्टिक सर्जरी का नमूना' बनाए रखेंगे, तब तक गणेश सिर्फ़ शोपीस रहेंगे। और जब तक जनता अपनी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करेगी, तब तक गणतंत्र भी शोपीस ही रहेगा। तो सवाल यह है, आज हम 'गणपति बप्पा मोरया' कह रहे हैं, या 'गणपति बप्पा माया'?
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