सहारनपुर गैंगरेप केस: पूर्व CO और इंस्पेक्टर को 20 साल की सजा

पति की गिरफ्तारी के बाद मदद माँगने देवबंद थाने पहुँची थी महिला; पुलिस अधिकारियों पर लगे थे सामूहिक दुष्कर्म और धमकी के आरोप, हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दर्ज हुआ मुकदमा, सीबीसीआईडी की क्लोजर रिपोर्ट को भी दी चुनौती।

Nov 7, 2026 - 23:40
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सहारनपुर गैंगरेप केस: पूर्व CO और इंस्पेक्टर को 20 साल की सजा

गर्भवती महिला से सामूहिक दुष्कर्म में रिटायर्ड सीओ और इंस्पेक्टर को 20-20 साल की कैद, 11 साल बाद मिला न्याय

सहारनपुर, 7 नवंबर 2026। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में पुलिस की जवाबदेही और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है। वर्ष 2015 में देवबंद थाने के तत्कालीन प्रभारी के सरकारी आवास में ढाई माह की गर्भवती महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म के मामले में अदालत ने दो पुलिस अधिकारियों को 20-20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। करीब 11 वर्ष तीन महीने तक चली कानूनी लड़ाई के बाद आए इस फैसले ने पुलिस व्यवस्था, आपराधिक न्याय प्रणाली और पीड़ित महिलाओं की न्याय तक पहुंच से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को फिर चर्चा में ला दिया है। सहारनपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वितीय के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रबोध कुमार वर्मा ने 6 नवंबर 2026 को तत्कालीन देवबंद थाना प्रभारी बृजमोहन यादव और तत्कालीन उपनिरीक्षक वेगपाल उर्फ वेदपाल सिंह को 20-20 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई। दोनों पर 1.20-1.20 लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है।

बृजमोहन यादव बाद में पदोन्नत होकर पुलिस क्षेत्राधिकारी (सीओ) बने और सेवानिवृत्त हो गए, जबकि वेगपाल सिंह पदोन्नति के बाद निरीक्षक बने। अदालत ने दोनों को सामूहिक दुष्कर्म और आपराधिक धमकी के मामले में दोषी पाया।

पति को छुड़ाने थाने पहुँची थी महिला

मामले की शुरुआत जुलाई 2015 के अंतिम दिनों में हुई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 29 जुलाई 2015 को पुलिस पीड़िता के पति को उसके घर से पूछताछ के लिए ले गई थी। बाद में एक आपराधिक मामले में उसकी गिरफ्तारी दिखाकर जेल भेज दिया गया। पति की गिरफ्तारी से परेशान महिला ने पुलिस से मदद माँगने का निर्णय लिया। उस समय वह लगभग ढाई महीने की गर्भवती थी।

पीड़िता के अधिवक्ता राजीव तोमर के अनुसार, महिला पहले स्थानीय पुलिस चौकी पहुँची थी। इसके बाद उसे थाना प्रभारी से मिलने के लिए देवबंद थाने बुलाया गया। महिला अपनी सास और ननद के साथ वहां पहुँची।

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि थाने में महिला को उसके परिजनों से अलग कर तत्कालीन थाना प्रभारी के सरकारी आवास में ले जाया गया, जहां उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। महिला की ननद ने विरोध किया तो उसके साथ भी कथित रूप से मारपीट की गई और जान से मारने की धमकी दी गई। आरोपियों ने घटना का खुलासा करने पर पीड़िता और उसके पति को झूठे आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी भी दी थी।

पुलिस अधिकारियों से शिकायत, लेकिन दर्ज नहीं हुआ मुकदमा

घटना के बाद पीड़िता ने स्थानीय पुलिस और सहारनपुर के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से शिकायत की। हालांकि, पीड़ित पक्ष के अनुसार, प्रारंभिक स्तर पर उसकी शिकायत पर मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। इसके बाद महिला ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। प्रारंभिक न्यायिक प्रयासों में राहत नहीं मिलने पर मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय तक पहुँचा। उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद अधीनस्थ न्यायालय ने मुकदमा दर्ज कर जाँच करने का निर्देश दिया। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, नवंबर 2017 में चार पुलिसकर्मियों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज हुई। इस प्रकार घटना के लगभग दो वर्ष बाद पुलिस अधिकारियों के खिलाफ औपचारिक आपराधिक कार्यवाही आगे बढ़ सकी।

सीबीसीआईडी ने दी थी क्लोजर रिपोर्ट, पीड़िता ने किया विरोध

मुकदमा दर्ज होने के बाद मामले की जाँच उत्तर प्रदेश पुलिस की अपराध शाखा-अपराध अनुसंधान विभाग (सीबीसीआईडी) को सौंपी गई। जाँच एजेंसी ने आरोपों को प्रमाणित नहीं मानते हुए अदालत में अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। यदि पीड़िता इस रिपोर्ट को स्वीकार कर लेती, तो मामला आगे बढ़ने की संभावना सीमित हो सकती थी। लेकिन महिला ने जाँच एजेंसी के निष्कर्ष को चुनौती देते हुए न्यायालय में प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की। पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता के अनुसार, 6 अक्टूबर 2018 को अदालत ने प्रोटेस्ट पिटीशन को परिवाद के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया। इसके बाद न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी और साक्ष्यों तथा गवाहों के आधार पर आरोपियों को विचारण के लिए तलब किया गया। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि पुलिस की अंतिम रिपोर्ट न्यायिक प्रक्रिया का अंतिम निर्णय नहीं होती। शिकायतकर्ता को कानून के अनुसार उसे चुनौती देने और न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अधिकार है।

चार पुलिसकर्मियों पर आरोप, दो को सजा

इस मामले में प्रारंभिक शिकायत चार पुलिसकर्मियों के विरुद्ध थी। इनमें तत्कालीन थाना प्रभारी बृजमोहन यादव, उपनिरीक्षक वेगपाल सिंह, तत्कालीन चौकी प्रभारी पंकज धामा और एक अन्य अज्ञात पुलिसकर्मी शामिल बताए गए। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, पंकज धामा से संबंधित कार्यवाही उनकी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी स्थिति के दावे के कारण अलग कर दी गई थी। चौथे आरोपी की पहचान स्थापित नहीं हो सकी। इस कारण मुख्य विचारण बृजमोहन यादव और वेगपाल सिंह के विरुद्ध चला। न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों का परीक्षण करने के बाद दोनों को दोषी ठहराया। अन्य आरोपियों के संबंध में दोषसिद्धि का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, क्योंकि उनके विरुद्ध इस निर्णय में सजा नहीं सुनाई गई है।

5 नवंबर को दोषसिद्धि, 6 नवंबर को सजा

फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 5 नवंबर 2026 को दोनों पुलिस अधिकारियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 376डी और धारा 506 के अंतर्गत दोषी करार दिया। अगले दिन 6 नवंबर को सजा के प्रश्न पर अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें सुनी गईं। अदालत ने सामूहिक दुष्कर्म के अपराध में दोनों को 20-20 वर्ष के कठोर कारावास और एक-एक लाख रुपये के अर्थदंड से दंडित किया। आपराधिक धमकी के अपराध में दोनों को पांच-पांच वर्ष के साधारण कारावास और 20-20 हजार रुपये के अतिरिक्त अर्थदंड की सजा सुनाई गई। दोनों कारावास की सजाएँ साथ-साथ चलेंगी। इस प्रकार प्रत्येक दोषी पर कुल 1.20 लाख रुपये का अर्थदंड लगाया गया है। दोषसिद्धि के बाद दोनों को न्यायिक हिरासत में लिया गया और सजा सुनाए जाने के बाद जेल भेज दिया गया।

पीड़िता को मिलेगी अर्थदंड की धनराशि

समाचार रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने पीड़िता को आर्थिक प्रतिकर देने का भी निर्देश दिया है। सामूहिक दुष्कर्म के अपराध में लगाए गए एक-एक लाख रुपये के अर्थदंड की पूरी राशि पीड़िता को देने का निर्देश है। इसके अतिरिक्त आपराधिक धमकी के अपराध में लगाए गए अर्थदंड का 75 प्रतिशत हिस्सा भी पीड़िता को दिया जाना है। अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 के प्रावधानों के अंतर्गत प्रतिकर की व्यवस्था का उल्लेख किया। संबंधित राशि का भुगतान न्यायिक आदेश और अपील संबंधी प्रक्रिया के अनुसार किया जाएगा।

500 से अधिक तारीखें, आठ गवाह और लंबा संघर्ष

लाइव हिन्दुस्तान की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, मामले में 500 से अधिक सुनवाई की तारीखें पड़ीं और आठ गवाहों के बयान दर्ज हुए। पीड़ित पक्ष के अधिवक्ताओं ने आरोप लगाया कि मुकदमे की पैरवी के दौरान परिवार को दबाव, धमकियों और कथित हमलों का भी सामना करना पड़ा। परिवार के विरुद्ध अन्य आपराधिक मुकदमे दर्ज होने की बात भी सामने आई है।

हालाँकि, इन अतिरिक्त आरोपों की स्वतंत्र न्यायिक पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से नहीं होती। इसलिए इन्हें पीड़ित पक्ष के आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद अदालत का निर्णय पीड़िता के लिए महत्वपूर्ण न्यायिक सफलता माना जा रहा है।

फैसला सुनते समय अदालत में मौजूद थी पीड़िता

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, सजा सुनाए जाने के दौरान पीड़िता और उसका पति अदालत में मौजूद थे। पीड़िता ने फैसले के बाद न्याय मिलने पर संतोष व्यक्त किया। उसने बताया कि दोषियों ने अपने चेहरे ढक रखे थे, जिसके कारण वह उनकी प्रतिक्रिया नहीं देख सकी। पीड़िता के पति ने भी दावा किया कि वर्ष 2015 में पुलिस ने उसे एक झूठे आपराधिक मामले में फंसाया था और बाद में अदालत ने उसे उस मामले में बरी कर दिया। यह दावा पीड़ित परिवार के बयान पर आधारित है।

पीड़ित पक्ष चाहता है आजीवन कारावास

20-20 वर्ष की सजा सुनाए जाने के बावजूद पीड़ित पक्ष इसे अंतिम न्यायिक पड़ाव नहीं मान रहा है। पीड़िता के अधिवक्ता राजीव तोमर ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि वे सजा को बढ़ाकर आजीवन कारावास किए जाने की मांग को लेकर उच्च न्यायालय जाने की योजना बना रहे हैं। दूसरी ओर, दोषियों के बचाव पक्ष ने भी निर्णय के विरुद्ध अपील करने की बात कही है। इसलिए वर्तमान निर्णय के विरुद्ध आगे की अपीलीय कार्यवाही की संभावना बनी हुई है।

पुलिस की जवाबदेही और न्यायिक निगरानी पर गंभीर सवाल

यह मामला केवल दो पुलिस अधिकारियों की दोषसिद्धि तक सीमित नहीं है। यह उन परिस्थितियों की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है, जिनमें किसी नागरिक को उसी संस्था के विरुद्ध न्याय प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, जिस पर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है। इस प्रकरण से तीन महत्वपूर्ण प्रश्न उभरते हैं।

पहला, जब किसी पुलिस अधिकारी के विरुद्ध गंभीर अपराध की शिकायत प्राप्त होती है, तो प्राथमिकी दर्ज करने और निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?

दूसरा, यदि जाँच एजेंसी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर देती है, तो शिकायतकर्ता को न्यायिक उपचार प्राप्त करने में कितना समय और संसाधन खर्च करना पड़ता है?

तीसरा, गंभीर यौन अपराधों के मामलों में पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा तथा समयबद्ध सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए वर्तमान संस्थागत व्यवस्थाएँ कितनी पर्याप्त हैं?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है। न्यायिक व्याख्याओं में मानवीय गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता को भी इस अधिकार से जोड़ा गया है। पुलिस अधिकारियों द्वारा अधिकारों का दुरुपयोग केवल व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी का प्रश्न नहीं, बल्कि कानून के शासन और संस्थागत जवाबदेही की भी चुनौती है।

न्याय मिला, लेकिन देरी भी एक गंभीर प्रश्न

सहारनपुर के इस मामले में अदालत का फैसला पीड़िता के लंबे संघर्ष का महत्वपूर्ण परिणाम है। साथ ही, घटना से सजा तक लगभग 11 वर्ष तीन महीने का समय लगना आपराधिक न्याय प्रणाली में देरी की समस्या को भी रेखांकित करता है। यह निर्णय संदेश देता है कि वर्दी, पद या प्रशासनिक अधिकार किसी व्यक्ति को आपराधिक कानून से ऊपर नहीं रखते।

हालाँकि, न्याय की वास्तविक प्रभावशीलता केवल दोषसिद्धि से नहीं, बल्कि समय पर निष्पक्ष जाँच, पीड़ित की सुरक्षा, साक्ष्यों के संरक्षण और न्यायिक प्रक्रिया की सुलभता से भी निर्धारित होती है। सहारनपुर का यह मामला आने वाले समय में पुलिस जवाबदेही, महिला सुरक्षा और न्यायिक सुधारों की चर्चा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I