राकेश कुमार पर गंभीर आरोप: सूचना आयोग बना ‘सूचना अवरोध आयोग’?

सूचना आयुक्त राकेश कुमार पर RTI कानून उल्लंघन और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप। प्रयागराज के रवि शंकर की शिकायत ने खोली UP सूचना आयोग की कार्यशैली।

Apr 17, 2026 - 13:36
Apr 17, 2026 - 14:26
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राकेश कुमार पर गंभीर आरोप: सूचना आयोग बना ‘सूचना अवरोध आयोग’?
सूचना आयुक्त राकेश कुमार

प्रयागराज के रवि शंकर की लड़ाई ने खोली व्यवस्था की परतें

उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग में सूचना आयुक्त राकेश कुमार की कार्यशैली पर गंभीर आरोप सामने आए हैं। प्रयागराज के निवासी रवि शंकर द्वारा दायर अपीलों और ईमेल पत्राचार के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि RTI Act, 2005 के तहत माँगी गई सूचनाएँ जानबूझकर रोकी गईं, सुनवाई प्रक्रियाओं में अनियमितता बरती गई और पारदर्शिता के बजाय टालमटोल व दमन का रास्ता अपनाया गया। मामला अब राष्ट्रपति सचिवालय तक पहुँच चुका है, जो इसकी गंभीरता को दर्शाता है।

कानून का संरक्षक या उल्लंघनकर्ता?

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का मूल उद्देश्य है सरकार को जवाबदेह बनाना। लेकिन जब यही जिम्मेदारी निभाने वाला संस्थान उत्तर प्रदेश सूचना आयोग सवालों के घेरे में आ जाए, तो लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है।

प्राप्त दस्तावेज़ों के अनुसार

अपील संख्या S10/A/0008/2024 में सूचना आयुक्त राकेश कुमार द्वारा पारित आदेश दिनांक 17/10/2025 पर अपीलार्थी रवि शंकर (प्रयागराज) ने 16 बिंदुओं पर कारणयुक्त जवाब माँगा है। पृष्ठ-1 में स्पष्ट उल्लेख है कि RTI Act की धारा 4(1)(d) के तहत कारण सहित सूचना माँगी गई थी, लेकिन आरोप है कि कोई कारण नहीं दिया गया, कोई प्रमाणित साक्ष्य नहीं दिया गया और सूचना का अधिकार कानून को 'कागजी औपचारिकता' बना दिया गया

सुनवाई या साज़िश?

प्रयागराज निवासी आवेदक रवि शंकर ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 4(1)(d) के तहत स्पष्ट रूप से यह माँग की थी कि सूचना आयोग द्वारा पारित आदेशों के संबंध में कारणयुक्त एवं प्रमाणित उत्तर को 7 दिवसो में उपलब्ध कराया जाए। इसके साथ ही उन्होंने यह भी विधिक रूप से आग्रह किया था कि यदि उक्त कारणयुक्त एवं प्रमाणित उत्तर उपलब्ध नहीं कराई जाती, तों उनकी सभी लंबित अपीलों/शिकायतों की सुनवाई स्थगित रखी जाए, ताकि न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे। आवेदक की यह माँग किए हुए आज 70 दिनों से अधिक समय व्यतीत हो चुका है और इस अवधि में आवेदक द्वारा लगातार 7 अनुस्मारक आयोग को भेजे जा चुके हैं; इसके बावजूद न तो चाहे गए कारणयुक्त एवं प्रमाणित उत्तर मिला और न ही सुनवाई स्थगन पर कोई निर्णय लिया गया। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि प्रशासनिक स्तर पर मनमाने ढंग से विधि के निदेशों का उल्लंघन किया जा रहा है। स्थिति की गंभीरता इस बात से और बढ़ जाती है कि सूचना उपलब्ध कराए बिना ही आयोग द्वारा सुनवाई जारी रखी जा रही है और मामलों का निस्तारण किया जा रहा है। यह प्रक्रिया RTI Act, 2005 की धारा 4(1)(d) की अवहेलना है। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Natural Justice) का उल्लंघन है तथा इसे prima facie अवैध (illegal adjudication) की श्रेणी में रखा जा सकता है। अब सवाल उठता है कि क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है, या जानबूझकर किया गया दमन?

भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का आरोप

रिपोर्ट के अनुसार रवि शंकर ने सीधे-सीधे आरोप लगाया है कि सूचना आयुक्त राकेश कुमार और अन्य अधिकारी जनसूचना अधिकारियों के साथ मिलकर भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता और मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों को दबा रहे हैं। आगे पृष्ठ-2 और 5 में घूस, सुविधा शुल्क और भ्रष्टाचार के आरोपों का उल्लेख मिलता हैयदि ये आरोप सही हैं, तो यह सिर्फ RTI उल्लंघन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ विश्वासघात है।

एक आम नागरिक की असाधारण लड़ाई

प्रयागराज के एक साधारण नागरिक रवि शंकर ने सूचना आयोग से न्याय माँगा, जवाब नहीं मिला तो राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट और CIC तक पहुँचेलगातार 4 अनुस्मारक भेजे जा चुके हैं। पृष्ठ-3 में राष्ट्रपति सचिवालय द्वारा मामले को संज्ञान में लेकर अग्रेषित करने की पुष्टि हैयह दर्शाता है कि जब संस्थाएँ जवाब नहीं देतीं, तो नागरिक को दर-दर भटकना पड़ता है।

RTI सिस्टम की गिरती साख

यह मामला कई बड़े सवाल छोड़ता है- क्या सूचना आयोग 'सूचना देने' के बजाय 'सूचना रोकने' का केंद्र बन गया है? क्या आम नागरिक के लिए RTI अब सिर्फ एक भ्रम है? क्या पारदर्शिता की जगह संस्थागत अपारदर्शिता ने ले ली है? यह स्थिति लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।

जवाबदेही तय होगी या नहीं?

यह मामला केवल एक अधिकारी या एक अपीलार्थी का नहीं है, यह पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता का सवाल है।

अब क्या होना चाहिए?

स्वतंत्र न्यायिक जाँच, सूचना आयुक्त की भूमिका की जाँच, आयोग की कार्यप्रणाली का ऑडिट। अब सभी आदेशों को सार्वजनिक और कारणयुक्त बनाना होगा

 अगर सूचना आयोग ही सूचना छिपाने लगे, तो फिर लोकतंत्र में पारदर्शिता की उम्मीद किससे की जाए?”

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