सूचना आयोग या ‘सूचना नियंत्रण केंद्र’? राकेश कुमार पर उठे सवाल, RTI व्यवस्था पर गहराता संकट
यूपी सूचना आयोग में आयुक्त राकेश कुमार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल। RTI कानून के उल्लंघन, सूचना दबाने और सुनवाई स्थगन के आरोपों से पारदर्शिता पर संकट गहराया।
सूचना आयोग में पारदर्शिता या मनमानी- राकेश कुमार पर उठते सवाल क्यों?
उत्तर प्रदेश सूचना आयोग में आयुक्त राकेश कुमार की कार्यशैली को लेकर लगातार गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। jagotv जैसे वैकल्पिक मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पहले भी आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं, और अब नए दस्तावेजों से यह आरोप और मजबूत होते दिख रहे हैं कि RTI कानून को लागू करने के बजाय उसे कमजोर किया जा रहा है।
जब प्रहरी ही प्रश्नों के घेरे में हो…
लोकतंत्र में सूचना आयोग को ‘पारदर्शिता का प्रहरी’ कहा जाता है। लेकिन यदि वही प्रहरी सूचना को रोकने लगे, तो लोकतंत्र की नींव हिलना स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश सूचना आयोग में आयुक्त राकेश कुमार की कार्यशैली को लेकर जो आरोप उभर कर आए हैं, वे केवल प्रशासनिक खामी नहीं बल्कि संस्थागत विफलता की ओर संकेत करते हैं।
दस्तावेजों से उभरती तस्वीर
भेजे गए ईमेल शृंखला में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि:
• आवेदक को राकेश कुमार, सूचना आयुक्त के 16 बिंदुओं के अन्यायपूर्ण और उसको अपमानित करने के 16 बिंदुओं के आदेश पर 4 (1) (d) के अंतर्गत लोक प्राधिकारी, उत्तर प्रदेश सूचना आयोग से साक्ष्य सहित कारण माँगे गए।
• RTI Act 2005 की धारा 4(1)(d) के तहत कारण सहित जवाब देना अनिवार्य था।
• कई अनुस्मारक (फरवरी-मार्च 2026) भेजे गए, फिर भी कोई जवाब नहीं दिया गया।
• सुनवाई स्थगित करने तथा सुनवाई कक्ष ट्रांसफर करने के अनुरोध पर भी न तो सुनवाई स्थगित की गयी और न सुनवाई स्थगित की गयी, बार बार मनमर्जी के आदेश देकर आवेदक को परेशान किया जा रहा।
यह केवल देरी नहीं, बल्कि जानबूझकर सूचना से वंचित करने का पैटर्न दर्शाता है।
RTI: अधिकार से ‘अनुग्रह’ तक?
RTI कानून का मूल उद्देश्य था-
✔ पारदर्शिता
✔ जवाबदेही
✔ भ्रष्टाचार पर अंकुश
लेकिन jagotv जैसी रिपोर्ट्स में पहले भी यह रेखांकित किया गया है कि:
• सूचना आयोग में लंबित मामलों का अंबार
• सुनवाई में देरी
• आदेशों की अस्पष्टता
• और कई बार सूचना देने से बचने की प्रवृत्ति
अब यह नया मामला इन चिंताओं को और गहरा करता है।
तानाशाही का ‘सॉफ्ट मॉडल’?
इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर आरोप यह है कि:
• आवेदकों को ‘थकाने’ की रणनीति अपनाई जा रही है।
• सूचना को दबाकर संभावित भ्रष्टाचार को बचाया जा रहा है।
• और आयोग स्वयं जवाबदेही से बच रहा है।
यह वही स्थिति है जिसे राजनीतिक विश्लेषक “soft authoritarianism” कहते हैं। जहाँ संस्थाएँ दिखती लोकतांत्रिक हैं, लेकिन व्यवहार में नियंत्रणकारी हो जाती हैं
प्रणाली पर प्रभाव
यदि यही स्थिति बनी रही, तो इसके परिणाम होंगे:
• आम नागरिक का RTI पर विश्वास खत्म
• भ्रष्टाचार के मामलों का दब जाना
• न्याय पाने की प्रक्रिया का और जटिल होना
बड़ा सवाल
क्या सूचना आयोग अब नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कर रहा है, या फिर वह खुद ‘सूचना अवरोधक संस्था’ बनता जा रहा है?
यह मामला किसी एक अधिकारी या एक शिकायत तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक संकट की झलक है जहाँ ❝सूचना का अधिकार कानून, कागजों में जीवित और व्यवहार में निष्प्रभावी होता जा रहा है।❞
यदि समय रहते इस पर जवाबदेही तय नहीं हुई, तो लोकतंत्र का सबसे मजबूत औजार RTI धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश राज्य में ऐसे मनमाने, कानून विरोधी सूचना आयुक्तों के छत्र-छाया में निष्क्रिय हो सकता है।
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