भारतीय भाषा परिषद का भव्य सम्मान समारोह: आठ भाषाओं के रचनाकारों को सम्मान, साहित्य से वैश्विक मानवता का संदेश
कोलकाता में भारतीय भाषा परिषद के समारोह में आठ भारतीय भाषाओं के वरिष्ठ और युवा लेखकों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में साहित्य, शांति और वैश्विक मानवता पर गहन विमर्श हुआ।
कोलकाता, 2 मई। भारतीय भाषाओं की समृद्ध परंपरा, सांस्कृतिक विविधता और साहित्यिक चेतना को एक मंच पर प्रतिष्ठित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए भारतीय भाषा परिषद ने अपने सभागार में एक भव्य सम्मान समारोह का आयोजन किया। इस अवसर पर देश की आठ प्रमुख भारतीय भाषाओं असमिया, हिंदी, कन्नड़, उर्दू, गुजराती, बांग्ला, मलयालम और हिंदी के वरिष्ठ एवं युवा रचनाकारों को सम्मानित किया गया। यह समारोह न केवल साहित्यिक उपलब्धियों का उत्सव था, बल्कि भाषाई एकता, सांस्कृतिक संवाद और वैश्विक मानवता के मूल्यों को पुनर्स्थापित करने का भी एक गंभीर प्रयास था।
वरिष्ठ साहित्यकारों का सम्मान
समारोह में जिन वरिष्ठ साहित्यकारों को सम्मानित किया गया, उनमें असमिया के दीपक कुमार बरकाकाती, हिंदी के प्रतिष्ठित कवि नरेश सक्सेना, कन्नड़ की सुप्रसिद्ध लेखिका जानकी निवास मूर्ति ‘वैदेही’ और उर्दू के चर्चित लेखक अनीस अशफाक शामिल रहे। इन सभी रचनाकारों को परिषद की ओर से मोमेंटो, प्रशस्ति-पत्र (मानपत्र) और एक-एक लाख रुपये की सम्मान राशि प्रदान की गई। इन रचनाकारों ने अपनी-अपनी भाषाओं में साहित्य को नई दृष्टि, संवेदना और सामाजिक सरोकारों से समृद्ध किया है। इनके लेखन में भारतीय समाज की जटिलताओं, मानवीय रिश्तों और समय की चुनौतियों का गहरा चित्रण मिलता है।
युवा रचनाकारों को प्रोत्साहन
युवा पीढ़ी के लेखकों को भी परिषद ने समान महत्व देते हुए सम्मानित किया। गुजराती के अजय सोनी, बांग्ला के पीयूष सरकार, मलयालम की जिन्शा गंगा और हिंदी की दिव्या विजय को युवा साहित्य सम्मान प्रदान किया गया। प्रत्येक को 51 हजार रुपये, मानपत्र और मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया। यह सम्मान न केवल उनकी रचनात्मक उपलब्धियों की स्वीकृति है, बल्कि साहित्य की भावी दिशा के प्रति परिषद की प्रतिबद्धता का भी प्रतीक है।
उद्घाटन और अतिथि वक्तव्य
परिषद की अध्यक्ष डॉ. कुसुम खेमानी ने अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि भारत की विविध भाषाओं में सृजित साहित्य हमारी सांस्कृतिक शक्ति का मूल आधार है। उन्होंने कहा कि इन रचनाकारों की शब्द-साधना को सम्मानित करना वास्तव में भारतीय ज्ञान परंपरा को सम्मानित करना है।
समारोह के मुख्य अतिथि, प्रतिष्ठित बांग्ला कथाकार रामकुमार मुखोपाध्याय ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय भाषा परिषद की यह परंपरा विभिन्न भाषाओं के बीच संवाद, सद्भाव और प्रेम को मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने साहित्य को ‘मनुष्यता का साझा घर’ बताया, जहाँ भाषा की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं।
परिचर्चा: ‘लेखक : वैश्विक मानवता और शांति’
परिषद के स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित परिचर्चा ‘लेखक : वैश्विक मानवता और शांति’ इस कार्यक्रम का बौद्धिक केंद्र रही। इसमें वरिष्ठ और युवा दोनों वर्गों के लेखकों ने अपने विचार रखे।
- दीपक कुमार बरकाकाती ने कहा कि लेखक केवल सृजनकर्ता ही नहीं, बल्कि एक सजग वक्ता भी होता है, जो समाज की पीड़ा को स्वर देता है।
- अनीस अशफाक ने कहा कि “कलम हमारी सबसे बड़ी ताकत है, इसे हम कभी रख नहीं सकते” यह साहित्य की निरंतरता और संघर्षशीलता का प्रतीक है।
- ‘वैदेही’ ने स्त्री और बच्चों की आवाज को शांति की आधारशिला बताया और कहा कि जब तक इन वर्गों की पीड़ा नहीं सुनी जाएगी, तब तक वास्तविक शांति संभव नहीं है।
- नरेश सक्सेना ने वैश्विक मानवता के संदर्भ में साहित्य की गरिमा को रेखांकित करते हुए कहा कि साहित्य मनुष्य को उसकी संवेदनशीलता से जोड़ता है।
युवा लेखकों की दृष्टि
युवा रचनाकारों ने भी अपने विचारों से परिचर्चा को नई ऊर्जा दी
- अजय सोनी ने कहा कि केवल शैक्षणिक डिग्रियां व्यक्ति को महान नहीं बनातीं; संवेदनशीलता और विचार ही उसे ऊंचाई देते हैं।
- पीयूष सरकार ने साहित्य को “अंतर्निहित चेतना का फल” बताते हुए कहा कि लेखक को अपने भीतर के अंधकार को स्वीकार करना भी जरूरी है।
- जिन्शा गंगा ने मानवीयता के पुनर्स्थापन में साहित्य की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
- दिव्या विजय ने विश्व में चल रहे युद्धों और विनाश की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि “हर दिन विनाश को देखना और उससे सीख न लेना मानवता की सबसे बड़ी विफलता है।”
अध्यक्षीय उद्बोधन और निष्कर्ष
समारोह की अध्यक्षता करते हुए परिषद के निदेशक डॉ. शंभुनाथ ने अत्यंत सारगर्भित टिप्पणी की “इतिहास और राजनीति जहाँ खाई पैदा करते हैं, वहीं लेखक पुल बनाते हैं।” उन्होंने कहा कि साहित्य उन आवाजों को अभिव्यक्ति देता है, जिन्हें अक्सर समाज अनसुना कर देता है।
कार्यक्रम में श्रीमती बिमला पोद्दार, घनश्याम सुगला, आशीष झुनझुनवाला और विजय हलवासिया की विशेष उपस्थिति रही। संचालन डॉ. राजश्री शुक्ला ने किया, जबकि मानपत्र वाचन प्रो. वेदरमण, डॉ. संजय जायसवाल, डॉ. प्रीति सिंघी और डॉ. श्रद्धांजलि सिंह ने किया। अंत में आशीष झुनझुनवाला ने सभी अतिथियों, लेखकों और श्रोताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापन किया।
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