“बौद्धिक उपनिवेशन और अतीतांधता ज्ञान के दो बड़े शत्रु हैं” - डॉ. शंभुनाथ
विद्यासागर विश्वविद्यालय में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदी साहित्य’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन। डॉ. शंभुनाथ ने बौद्धिक उपनिवेशन और अतीतांधता को ज्ञान का सबसे बड़ा खतरा बताया।
विद्यासागर विश्वविद्यालय में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदी साहित्य’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आगाज़
मिदनापुर, 24 मार्च । विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदी साहित्य’ का प्रथम दिन गंभीर वैचारिक विमर्श और बहुआयामी संवादों के साथ संपन्न हुआ। इस संगोष्ठी ने भारतीय ज्ञान परंपरा के स्वरूप, उसकी बहुलता और वर्तमान संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए।
बीज वक्तव्य: आलोचनात्मक दृष्टि का आह्वान
संगोष्ठी के मुख्य आकर्षण के रूप में बीज वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ आलोचक डॉ. शंभुनाथ ने कहा, “बौद्धिक उपनिवेशन और अतीतांधता ज्ञान के दो बड़े शत्रु हैं।” उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को एकल न मानते हुए बहुवचनात्मक बताया और इस परंपरा को समझने के लिए रामचंद्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, निराला, महादेवी वर्मा और जयशंकर प्रसाद जैसे चिंतकों की पुनर्पाठ की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने चेताया कि यदि भारतीय ज्ञान परंपरा को संकीर्ण दृष्टि से देखा गया, तो उसकी व्यापकता और समावेशिता खतरे में पड़ सकती है। सत्र का संचालन करते हुए डॉ. संजय जायसवाल ने पश्चिमी श्रेष्ठता-बोध से सावधान रहने और विविध आवाजों के समन्वय को ही भारतीय ज्ञान परंपरा का वास्तविक स्वर बताया।
आलोचना सत्र: समकालीन प्रश्नों से मुठभेड़
प्रथम आलोचना सत्र में अध्यक्षता करते हुए डॉ. शंभुनाथ ने विमर्श को आगे बढ़ाया। प्रो. मुक्तेश्वरनाथ तिवारी (विश्वभारती, शांतिनिकेतन) ने हिंदी साहित्य में ज्ञान-चिंतन की परंपरा पर प्रकाश डाला और रामविलास शर्मा के योगदान को रेखांकित किया। प्रख्यात आलोचक प्रो. रवि भूषण ने तीखा प्रश्न उठाया कि जब समाज में भय, हिंसा और असत्य का माहौल है, तब भारतीय ज्ञान परंपरा की चर्चा किस दिशा में जा रही है। उन्होंने ज्ञान के “अज्ञानियों के हाथ में जाने” की चिंता व्यक्त की और कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को किसी एक विचारधारा में सीमित करना खतरनाक है।
द्वितीय सत्र: परंपरा, प्रतिरोध और संवाद
द्वितीय आलोचना सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. दामोदर मिश्र ने कहा कि ज्ञान गतिशील है, इसलिए ज्ञान परंपरा भी स्थिर नहीं हो सकती। वक्ताओं ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत करते हुए महत्वपूर्ण बिंदु रखे -
डॉ. संजय राय: परंपरा में प्रतिरोध के स्वर भी अंतर्निहित हैं; सत्ता के एकांगी दृष्टिकोण का प्रतिरोध आवश्यक है।
डॉ. राहुल शर्मा: भारतीय ज्ञान परंपरा में कथाओं (लिखित व मौखिक) की केंद्रीय भूमिका है।
डॉ. आदित्य गिरि: उपन्यास विधा की भूमिका पर प्रकाश।
डॉ. शारदा बनर्जी: भारतीय ज्ञान परंपरा और मानवतावाद के संबंध पर विचार। शोधार्थी रचना रश्मि ने भी अपना आलेख प्रस्तुत किया।
शोध सारांशिका का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम का संचालन उष्मिता गौड़ा और मदन शाह ने किया। धन्यवाद ज्ञापन सुषमा कुमारी और सोनम सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया।
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