जाँच जारी, लेकिन उत्पीड़न भी जारी: प्रयागराज में पुलिस की ‘झूठी आख्याओं’ पर उठे गंभीर सवाल
प्रयागराज में पुलिस पर गंभीर आरोप अपर पुलिस आयुक्त, प्रयागराज डॉ. अजय पाल की जाँच जारी, लेकिन स्थानीय स्तर पर उत्पीड़न के आरोप बरकरार। एसीपी शेषधर पाण्डेय की आख्या से उठे सवाल।
हंडिया, प्रयागराज। प्रयागराज के हंडिया क्षेत्र से सामने आया यह मामला अब केवल एक स्थानीय विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक निष्पक्षता और पुलिस कार्यप्रणाली पर गहरे सवाल खड़े कर रहा है।
पीड़ित सुशील कुमार पाण्डेय का आरोप है कि उनके व परिवार के खिलाफ ‘झूठी आख्याओं’ का सिलसिला पूर्व सहायक पुलिस आयुक्त पंकज लवानिया के समय से शुरू हुआ, जिसे निवर्तमान सहायक पुलिस आयुक्त सुनील कुमार सिंह के कार्यकाल में आगे बढ़ाया गया और अब वर्तमान सहायक पुलिस आयुक्त शेषधर पाण्डेय के समय में भी यह बिना रुके जारी है। जनसुनवाई पर शिकायतें लिखने और RTI लगाने पर पूर्व सहायक पुलिस आयुक्त द्वारा सुशील का एनकाउंटर कर देने की धमकी भी दी जा चुकी है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पीड़ित की शिकायत पर 14 अगस्त 2025 से अपर पुलिस आयुक्त (कानून व व्यवस्था) डॉ. अजय पाल द्वारा पूर्व में हुई पुलिस अधिकारियों की प्रताड़ना की जाँच की जा रही है। यह दर्शाता है कि मामला प्रशासन के उच्च स्तर तक पहुँच चुका है और इसकी गंभीरता को स्वीकार किया गया है।
इसके बावजूद, पीड़ित पक्ष का आरोप है कि जब उनके भाई द्वारा इस जाँच का तथ्य सहायक पुलिस आयुक्त शेषधर पाण्डेय को बताया गया, तो उन्होंने कथित रूप से इसे नजरअंदाज करते हुए कहा, “कुछ नहीं होगा जाँच-वांच से”। पीड़ित परिवार का कहना है कि यह कथन न केवल जाँच प्रक्रिया के प्रति असम्मान दर्शाता है, बल्कि इसका उद्देश्य स्पष्ट रूप से पीड़ित का मनोबल तोड़ना और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करना था।
दस्तावेजों के अनुसार, पहले भी जमानतीय प्रकरण में हंडिया थाना प्रभारी ने पीड़ित को और उसके अन्य पारिवारिक सदस्यों को जेल भेज दिया था। अभी भी ‘वारंट’ और ‘गिरफ्तारी’ का भय दिखाकर परिवार पर दबाव बनाया जा रहा है, जबकि न्यायालय ने अपने आदेश दिनांक 16.01.2026 में स्पष्ट किया कि मामला पूरी तरह जमानतीय है और अग्रिम जमानत की आवश्यकता नहीं है।
इसके बावजूद, स्थानीय स्तर पर पुलिस कथित धमकियों और दबाव का वातावरण बना रही है, जिसके चलते एक नाबालिग बालिका की शिक्षा तक प्रभावित हुई और परिवार को उसे दूसरे शहर भेजने के लिए मजबूर होना पड़ा।
वहीं, सहायक पुलिस आयुक्त शेषधर पाण्डेय द्वारा प्रस्तुत जाँच आख्या में इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा गया है कि शिकायतों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिले हैं।
यही द्वंद्व इस पूरे मामले को अत्यंत गंभीर बना देता है -
• एक ओर उच्च स्तर पर जाँच जारी है,
• दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर उसी मामले को नकारा जा रहा है,
• और साथ ही पीड़ित को हतोत्साहित करने के आरोप भी सामने आ रहे हैं।
यह स्थिति न केवल उत्तर प्रदेश के प्रयागराज पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि क्या विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग ‘आख्याएँ’ तैयार कर एक ही पक्ष को लगातार दबाव में रखा जा रहा है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि जाँच लंबित होने के बावजूद इस प्रकार की टिप्पणियाँ और व्यवहार सामने आते हैं, तो यह न केवल सेवा आचरण नियमों का उल्लंघन है, बल्कि न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने का भी प्रयास माना जा सकता है।
इस पूरे प्रकरण में अब निष्पक्ष, स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जाँच की माँग और अधिक प्रबल होती जा रही है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि क्या वास्तव में ‘झूठी आख्याओं’ के माध्यम से एक सुनियोजित उत्पीड़न चल रहा है या नहीं।
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