गिरती गरिमा, गढ़ती गणना: छठे स्थान पर फिसलता भारत और विकास की विडंबना

भारत वैश्विक GDP रैंकिंग में छठे स्थान पर खिसका, फिर भी सबसे तेज़ बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। जानिए भारत की विकास कहानी का असली विरोधाभास।

Apr 21, 2026 - 16:20
Apr 21, 2026 - 16:20
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गिरती गरिमा, गढ़ती गणना: छठे स्थान पर फिसलता भारत और विकास की विडंबना
छठे स्थान पर फिसलता भारत

अप्रैल 2026 के वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत की स्थिति एक गहरे और विचारोत्तेजक विरोधाभास को सामने लाती है। एक ओर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और अन्य वैश्विक संस्थान भारत को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में लगातार गिन रहे हैं; दूसरी ओर वही भारत नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद (Nominal GDP) के आधार पर वैश्विक रैंकिंग में छठे स्थान पर खिसक गया है। यह केवल रैंकिंग का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि विकास की उस जटिल कहानी का संकेत है जिसमें वृद्धि, वितरण, मुद्रा शक्ति, उत्पादन संरचना और सामाजिक यथार्थ सब एक-दूसरे से जुड़े हैं।

यह समझना होगा कि वैश्विक आर्थिक रैंकिंग प्रायः डॉलर आधारित नाममात्र GDP पर आधारित होती है। अर्थात किसी देश की अर्थव्यवस्था का आकार केवल उसके उत्पादन से नहीं, बल्कि उसकी मुद्रा की वैश्विक कीमत से भी तय होता है। भारत के मामले में रुपये के हालिया अवमूल्यन ने इस गिरावट में प्रमुख भूमिका निभाई है। घरेलू मुद्रा में अर्थव्यवस्था बढ़ती रही, लेकिन डॉलर में उसका मूल्यांकन अपेक्षाकृत कम दिखाई दिया। यही कारण है कि एक समय ब्रिटेन को पीछे छोड़ने वाला भारत अगले ही वर्ष फिर उससे पीछे दिखने लगा।

परंतु इस गिरावट को आर्थिक संकट का प्रतीक मान लेना गंभीर भूल होगी। भारत की वास्तविक विकास दर अभी भी 6 से 7 प्रतिशत के बीच बनी हुई है, जो अधिकांश विकसित अर्थव्यवस्थाओं से कहीं अधिक है। घरेलू उपभोग, सार्वजनिक पूंजी निवेश, डिजिटलीकरण, अवसंरचना विस्तार और सेवा क्षेत्र की मजबूती इस वृद्धि के प्रमुख आधार हैं। युवा आबादी, बढ़ता मध्यवर्ग और विशाल घरेलू बाजार भारत को एक दीर्घकालिक संरचनात्मक बढ़त भी प्रदान करते हैं।

फिर भी, इस चमकदार तस्वीर के पीछे कई अनसुलझे प्रश्न छिपे हैं।

भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा अब भी अनौपचारिक है। करोड़ों लोग ऐसे क्षेत्रों में काम करते हैं जिनकी आय, उत्पादकता और रोजगार सुरक्षा का पूरा आकलन आधिकारिक आँकड़ों में नहीं हो पाता। यदि विकास का बड़ा हिस्सा कागज़ पर है और श्रम का बड़ा हिस्सा असुरक्षित है, तो वृद्धि की कहानी अधूरी रह जाती है। आँकड़ों की विश्वसनीयता, उपभोग के सही अनुमान और रोजगार डेटा की पारदर्शिता आज भी महत्वपूर्ण प्रश्न बने हुए हैं।

वृद्धि है, पर रोजगार कहाँ?

भारत की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती शायद यही है कि विकास दर ऊँची है, लेकिन रोजगार सृजन उतना व्यापक नहीं। सेवा क्षेत्र विशेषकर IT, वित्तीय सेवाएँ, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और कॉर्पोरेट गतिविधियाँ उच्च मूल्य सृजित करते हैं, लेकिन सीमित रोजगार देते हैं। दूसरी ओर विनिर्माण क्षेत्र, जो बड़े पैमाने पर नौकरियाँ पैदा कर सकता था, अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पाया।

यही कारण है कि भारत में ‘जॉबलेस ग्रोथ’ शब्द बार-बार लौटता है। यदि GDP बढ़े लेकिन युवाओं को स्थायी, सम्मानजनक और उत्पादक रोजगार न मिले, तो आर्थिक वृद्धि सामाजिक असंतोष में बदल सकती है।

कृषि में फँसी श्रमशक्ति

आज भी भारत की लगभग आधी कार्यशक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, जबकि GDP में कृषि का योगदान अपेक्षाकृत कम है। इसका अर्थ है कि बड़ी आबादी कम उत्पादक क्षेत्र में सीमित आय के साथ अटकी हुई है। महामारी के बाद बड़ी संख्या में श्रमिकों का वापस कृषि की ओर लौटना इस संरचनात्मक कमजोरी का संकेत था। यदि कृषि से श्रम का सम्मानजनक संक्रमण उद्योग और सेवाओं में नहीं होता, तो भारत की जनसांख्यिकीय शक्ति बोझ में बदल सकती है।

प्रति व्यक्ति आय का मौन सत्य

भारत कुल GDP में दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय के स्तर पर तस्वीर अलग है। विशाल जनसंख्या के कारण राष्ट्रीय संपत्ति का औसत विभाजन सीमित है। इसका अर्थ है कि विश्व मंच पर आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन, नागरिक जीवन में समान रूप से समृद्धि में परिवर्तित नहीं हुआ है। जब तक शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, शहरी जीवन गुणवत्ता, महिला श्रम भागीदारी और आय समानता में सुधार नहीं होगा, तब तक GDP का आकार जनता के जीवन स्तर का सटीक प्रतिनिधि नहीं बन सकता।

बाहरी जोखिम भी कम नहीं

भारत की ऊर्जा निर्भरता उसे वैश्विक तेल कीमतों के उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बनाती है। पश्चिम एशिया में तनाव, समुद्री व्यापार मार्गों की अस्थिरता, अमेरिका-चीन व्यापार प्रतिस्पर्धा और संरक्षणवादी नीतियाँ भारत के निर्यात एवं मुद्रास्फीति दोनों को प्रभावित कर सकती हैं। हालाँकि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, नियंत्रित चालू खाता घाटा और अपेक्षाकृत स्थिर बैंकिंग तंत्र भारत को कई अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बेहतर स्थिति में रखते हैं।

अब असली लड़ाई रैंकिंग नहीं, गुणवत्ता की है

भारत को यदि सचमुच वैश्विक आर्थिक शक्ति बनना है तो केवल GDP रैंकिंग पर्याप्त नहीं। उसे पाँच निर्णायक मोर्चों पर काम करना होगा-

1. रोजगार आधारित विकास

विनिर्माण, MSME, टेक्सटाइल, फूड प्रोसेसिंग और श्रम-प्रधान उद्योगों को बढ़ावा देना होगा।

2. शिक्षा और कौशल क्रांति

युवा आबादी तभी पूंजी बनेगी जब वह प्रशिक्षित, तकनीकी रूप से सक्षम और नवाचारोन्मुख होगी।

3. कृषि का आधुनिकीकरण

भंडारण, वैल्यू चेन, प्रोसेसिंग, कृषि-उद्योग और तकनीकी खेती पर ध्यान देना होगा।

4. असमानता पर नियंत्रण

संपत्ति और अवसरों का अत्यधिक केंद्रीकरण सामाजिक अस्थिरता को जन्म देता है।

5. हरित और ऊर्जा सुरक्षित अर्थव्यवस्था

सौर, पवन, हरित हाइड्रोजन और स्वदेशी ऊर्जा तंत्र भारत की आर्थिक स्वतंत्रता को मजबूत करेंगे।

रैंकिंग से आगे का भारत

भारत का छठे स्थान पर खिसकना संभवतः अस्थायी है। भविष्य में वह पुनः ऊपर जा सकता है। लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत की आर्थिक शक्ति गाँवों, कस्बों, खेतों, श्रमिक बस्तियों, महिलाओं, युवाओं और मध्यम वर्ग के जीवन में वास्तविक परिवर्तन ला पाएगी?

यदि उत्तर ‘हाँ’ है, तो रैंकिंग स्वयं सुधर जाएगी। यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो ऊँची रैंकिंग भी खोखली उपलब्धि साबित होगी। भारत आज इतिहास के ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसे यह तय करना है कि वह केवल बड़ी अर्थव्यवस्था बनेगा या महान समाज भी।

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डॉ. शैलेश शुक्ला लेखक डॉ. शैलेश शुक्ला वैश्विक स्तर पर ख्याति प्राप्त वरिष्ठ लेखक, पत्रकार, साहित्यकार, भाषाकर्मी होने के साथ-साथ 'सृजन अमेरिका', 'सृजन ऑस्ट्रेलिया', 'सृजन मॉरीशस', 'सृजन मलेशिया', 'सृजन कतर', 'सृजन यूरोप' जैसी विभिन्न अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के वैश्विक प्रधान संपादक हैं। डॉ. शुक्ला द्वारा लिखित एवं संपादित 25 पुस्तकें, दिल्ली विश्वविद्यालय और इग्नू की बीए और एमए के पाठ्यक्रमों सहित कुल 30 से अधिक अध्याय विभिन्न पुस्तकों में 30 से अधिक शोध-पत्र, कविताओं, लेखों, कहानियों, व्यंग्यों सहित कुल 300 रचनाएं प्रकाशित हैं। डॉ. शैलेश शुक्ला भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा प्रदत्त 'राजभाषा गौरव पुरस्कार (2019-20)' और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की हिंदी अकादमी द्वारा ‘नवोदित लेखक पुरस्कार (2004)’ सहित विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मनों एवं पुरस्कारों से सम्मानित हैं।