बेदखली आदेश कागज़ों में दफ़न, सरकारी ज़मीन पर चढ़ रही छत
गाजीपुर के बलुआतप्पेशाहपुर में नवीन परती सरकारी भूमि पर न्यायालयी आदेश के बावजूद निर्माण जारी। ग्रामीणों ने प्रशासन, राजस्व अधिकारियों और भूमाफियाओं की मिलीभगत के आरोप लगाए।
न्यायालय के आदेश के बाद भी नहीं रुका निर्माण, ग्रामीणों ने पूछा, ‘क्या भूमाफियाओं से हार चुका है प्रशासन?’
उत्तर प्रदेश में सरकारी ज़मीनों पर बुलडोज़र चलाने की राजनीति और ‘अतिक्रमण मुक्त अभियान’ के सरकारी दावों के बीच गाजीपुर जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक दावों की पूरी परत उधेड़ दी है। मुहम्मदाबाद तहसील के ग्राम बलुआतप्पेशाहपुर में ग्राम सभा की सार्वजनिक ‘नवीन परती’ भूमि पर न्यायालय द्वारा बेदखली आदेश जारी होने के बावजूद कथित भूमाफियाओं द्वारा खुलेआम पक्का निर्माण कराया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि शिकायतों, ई-मेलों, तहसील दिवस की गुहार और न्यायालयी आदेशों के बावजूद प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यह मामला अब केवल अवैध कब्जे का नहीं रह गया है; यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति, राजस्व संरक्षण, कानून के समान अनुपालन और सरकारी मशीनरी की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन चुका है।
गाजीपुर प्रशासन पर मिलीभगत, संरक्षण और राजस्व तंत्र की विफलता के गंभीर आरोप, क्या है पूरा मामला?
दस्तावेजों के अनुसार, ग्राम बलुआतप्पेशाहपुर की आराजी संख्या 114, जो ‘नवीन परती’ अर्थात सार्वजनिक उपयोग की भूमि है, पर अवैध कब्जे की शिकायतें लंबे समय से चल रही थीं। मामले में न्यायिक तहसीलदार, मुहम्मदाबाद द्वारा उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 67 के अंतर्गत सुनवाई के बाद 22 मई 2025 को बेदखली आदेश पारित किया गया। आदेश में स्पष्ट कहा गया कि कब्जाधारियों को भूमि से बेदखल किया जाए तथा ग्राम सभा की भूमि को मुक्त कराया जाए।
‘अभियान’ की घोषणा, लेकिन ज़मीन पर निर्माण तेज़
ग्रामीणों और शिकायतकर्ताओं द्वारा जिलाधिकारी, एसडीएम, तहसीलदार, थाना भांवरकोल और अन्य अधिकारियों को लगातार ई-मेल भेजे गए। शिकायतों में साफ लिखा गया कि प्रशासन स्वयं 12 मई से अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाने की बात कर रहा था, लेकिन उसी दौरान सरकारी ज़मीन पर युद्धस्तर पर निर्माण कराया जा रहा है। शिकायतकर्ता अम्बुज कुमार राय ने आरोप लगाया कि रातों-रात निर्माण हुआ, दीवारें खड़ी की गईं और अब छत ढलाई तक की तैयारी कर ली गई। सवाल यह उठाया गया कि आखिर यह निर्माण किसके संरक्षण में हो रहा है? अगर प्रशासन को पहले से सूचना थी, तो मौके पर पुलिस और राजस्व टीम क्यों नहीं भेजी गई?
शिकायत में लिखा गया कि ‘अंदरखाने संरक्षण मिलने के कारण निर्माण रुकने के बजाय और तेज़ हो गया।’
बुलडोज़र सिर्फ गरीबों के लिए?
ग्रामीणों में सबसे बड़ा आक्रोश इस बात को लेकर है कि उत्तर प्रदेश में आम लोगों और गरीबों के मकानों पर तो तत्काल बुलडोज़र चल जाता है, लेकिन जब मामला प्रभावशाली लोगों या कथित भूमाफियाओं का हो, तो प्रशासनिक मशीनरी अचानक निष्क्रिय हो जाती है।
शिकायत में व्यंग्यात्मक भाषा में पूछा गया है कि ‘क्या बुलडोज़र सिर्फ गरीबों के लिए है?’
‘मनरेगा लुटेरा’ और स्थानीय गठजोड़ के आरोप
दस्तावेजों में बार-बार ‘मनरेगा लुटेरा’ शब्द का प्रयोग हुआ है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि जिन लोगों पर सार्वजनिक भूमि कब्जाने का आरोप है, उन्हीं के खिलाफ मनरेगा घोटाले के आरोप भी वर्षों से लंबित हैं, लेकिन कोई एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई। ग्रामीणों का आरोप है कि स्थानीय राजनीतिक संरक्षण, राजस्व अधिकारियों की सांठगांठ और भूमाफियाओं के प्रभाव के कारण सरकारी आदेश भी निष्प्रभावी हो चुके हैं। यदि यह आरोप सत्य हैं, तो यह केवल अतिक्रमण नहीं बल्कि राजस्व प्रशासन के भीतर संस्थागत भ्रष्टाचार का मामला बनता है।
तहसील दिवस: सिर्फ औपचारिकता?
शिकायतकर्ताओं के अनुसार, 2 मई 2026 को तहसील दिवस में जिलाधिकारी को पूरे दस्तावेज सौंपे गए थे। जिलाधिकारी ने 12 मई से अभियान चलाने का आश्वासन दिया था। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह रही कि अभियान शुरू होने से पहले ही निर्माण और तेज़ हो गया।
- क्या तहसील दिवस केवल कागज़ी औपचारिकता बन चुका है?
- क्या जनता की शिकायतें सिर्फ फाइलों में दबाने के लिए ली जाती हैं?
- क्या प्रशासनिक आश्वासन अब भरोसे लायक नहीं रहे?
न्यायालयी आदेश की अवमानना?
राजस्व न्यायालय द्वारा पारित आदेश का अनुपालन न होना एक गंभीर संवैधानिक प्रश्न भी खड़ा करता है। यदि किसी न्यायालय के आदेश के बावजूद सरकारी भूमि पर कब्जा जारी रहता है, तो यह न्यायिक प्रक्रिया की अवमानना के समान स्थिति पैदा करता है।
ग्रामीणों में भय और आक्रोश
स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी भूमि धीरे-धीरे निजी कब्जों में बदलती जा रही है और विरोध करने वालों को दबाव, धमकी और प्रशासनिक उदासीनता का सामना करना पड़ता है। ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी तेज़ है कि अगर सार्वजनिक भूमि ही सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिकों की संपत्ति और अधिकारों की रक्षा कैसे होगी?
सबसे बड़ा सवाल
यह मामला अब कुछ मूलभूत प्रश्न खड़े करता है -
- न्यायालयी आदेश के बाद भी कब्जा क्यों नहीं हटाया गया?
- निर्माण कार्य किसके संरक्षण में चलता रहा?
- राजस्व और पुलिस अधिकारियों ने मौके पर कार्रवाई क्यों नहीं की?
- क्या प्रभावशाली लोगों के सामने प्रशासनिक कानून निष्प्रभावी हो जाता है?
- क्या ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’ केवल प्रचार का माध्यम है?
निष्कर्ष
गाजीपुर का यह मामला सिर्फ एक गांव की सार्वजनिक भूमि का विवाद नहीं है। यह उस प्रशासनिक तंत्र की कहानी है, जिसमें आदेश तो निकलते हैं, लेकिन उनका पालन नहीं होता; शिकायतें भेजी जाती हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं होती; और सरकारी ज़मीन पर कब्जा रोकने के बजाय निर्माण की छतें चढ़ती जाती हैं। यदि न्यायालयी आदेश के बावजूद सरकारी भूमि सुरक्षित नहीं रह पा रही, तो यह लोकतांत्रिक प्रशासन की विश्वसनीयता के लिए गंभीर चेतावनी है।
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