19 वर्षीय छात्र ने खुद लड़ा केस, सुप्रीम कोर्ट ने पलटा फैसला
19 वर्षीय अथर्व चतुर्वेदी ने सुप्रीम कोर्ट में खुद बहस कर EWS आरक्षण के तहत MBBS में प्रोविजनल एडमिशन का आदेश हासिल किया। कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का प्रयोग किया।
नई दिल्ली/जबलपुर। न्यायालयों में अक्सर अनुभवी वकील अपनी दलीलों से माहौल बदलते हैं, लेकिन इस बार कहानी अलग थी। 19 वर्षीय छात्र अथर्व चतुर्वेदी ने सुप्रीम कोर्ट में स्वयं खड़े होकर कहा, “मुझे बस 10 मिनट दीजिए, सर…” कुछ ही मिनटों की बहस में मामला पलट गया। सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के योग्य छात्र को MBBS में प्रोविजनल प्रवेश दिया जाए।
पृष्ठभूमि: मेहनत, मेरिट और नीति की बाधा
अथर्व चतुर्वेदी ने NEET परीक्षा दो बार क्वालिफाई की और 530 अंक प्राप्त किए। वे जबलपुर के निवासी हैं और एक सरकारी स्कूल से शिक्षा प्राप्त की है। उनका चयन जबलपुर के एक सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में भी हो चुका था, लेकिन उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र को अपना लक्ष्य चुना। समस्या तब शुरू हुई जब राज्य सरकार ने निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण नीति लागू नहीं की। परिणामस्वरूप, मेरिट में योग्य होने के बावजूद उन्हें MBBS सीट नहीं मिल सकी।
हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक
अथर्व ने पहले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाई कोर्ट ने याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि इसी तरह के मामले में राज्य सरकार को नीति लागू करने के लिए एक वर्ष का समय दिया गया है, जो अभी समाप्त नहीं हुआ है।
हालांकि, सुनवाई के दौरान न्यायाधीश उनकी तार्किक क्षमता से प्रभावित हुए और टिप्पणी की, “आपको वकील बनना चाहिए, डॉक्टर नहीं।” हाई कोर्ट से राहत न मिलने पर अथर्व ने स्वयं विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट में निर्णायक क्षण
फरवरी की एक दोपहर, जब सुनवाई लगभग समाप्ति पर थी, अथर्व ने 10 मिनट का समय मांगा। पीठ ने पूछा, “क्या आप स्वयं बहस करेंगे?” उन्होंने आत्मविश्वास से कहा, “हाँ।”
अथर्व ने संविधान की मूल भावना और EWS आरक्षण के उद्देश्य का हवाला देते हुए कहा कि नीतिगत देरी के कारण किसी योग्य छात्र का भविष्य दांव पर नहीं लगाया जा सकता। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का संदर्भ भी दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा: “इस लड़के का भविष्य बर्बाद मत कीजिए।”
अनुच्छेद 142 का प्रयोग
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए आदेश दिया:
- 2025-26 शैक्षणिक सत्र के लिए प्रोविजनल एडमिशन दिया जाए।
- छात्र निर्धारित फीस जमा करे।
- राज्य सरकार सात दिनों के भीतर कॉलेज आवंटित करे।
पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर प्रवेश से इनकार नहीं किया जा सकता कि निजी कॉलेजों में EWS आरक्षण लागू नहीं हुआ है।
सामाजिक और नीतिगत प्रभाव
यह मामला केवल एक छात्र की जीत नहीं, बल्कि उन सभी EWS अभ्यर्थियों के लिए आशा का संकेत है, जो नीतिगत अस्पष्टता या प्रशासनिक देरी के कारण अवसर से वंचित रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश राज्यों को आरक्षण नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए बाध्य करेगा। हालांकि, निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS श्रेणी की फीस निर्धारण को लेकर परिवार की आर्थिक चिंता अभी भी बनी हुई है। अथर्व के पिता मनोज चतुर्वेदी पेशे से वकील हैं, लेकिन इस मामले में अथर्व ने स्वयं बहस की।
व्यापक संदेश
यह घटना दिखाती है कि न्याय व्यवस्था में साहस, तैयारी और संवैधानिक समझ कितनी महत्वपूर्ण है। एक 19 वर्षीय छात्र ने न केवल अपने लिए, बल्कि समान परिस्थिति में खड़े हजारों छात्रों के लिए रास्ता खोला है।
What's Your Reaction?

