झूठी एफआईआर पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अब शिकायतकर्ता ही नहीं, गवाह भी कटघरे में
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने झूठी एफआईआर पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि अब फर्जी शिकायत दर्ज कराने वाले शिकायतकर्ता ही नहीं, उनके गवाहों पर भी आपराधिक मुकदमा चलेगा। पुलिस और मजिस्ट्रेट की जवाबदेही तय करते हुए डीजीपी को 60 दिनों में आदेश लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।
न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर निर्णायक प्रहार, पुलिस और मजिस्ट्रेट की जवाबदेही तय
झूठी एफआईआर की बढ़ती प्रवृत्ति और न्याय व्यवस्था की चुनौती
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली पिछले कुछ वर्षों से एक गंभीर समस्या से जूझ रही है झूठी और दुर्भावनापूर्ण एफआईआर। निजी रंजिश, वैवाहिक विवाद, संपत्ति संघर्ष, राजनीतिक दबाव या प्रतिशोध की भावना के चलते कानून का इस्तेमाल हथियार की तरह किया जाने लगा है। इसका सबसे घातक परिणाम यह हुआ कि निर्दोष व्यक्ति वर्षों तक मुकदमों में फँसे रहते हैं, सामाजिक बदनामी झेलते हैं और उनकी स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा व आजीविका प्रभावित होती है।
इसी पृष्ठभूमि में इलाहाबाद हाई कोर्ट का हालिया फैसला न केवल कानून की व्याख्या, बल्कि न्यायिक नीति निर्धारण की दृष्टि से भी ऐतिहासिक माना जा रहा है। इस निर्णय में अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि झूठी एफआईआर दर्ज कराने वाले शिकायतकर्ता और उनके गवाह अब कानून की ढाल में नहीं छिप सकेंगे।
फैसले का मूल संदेश: झूठ अब सुरक्षित नहीं
न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की एकलपीठ ने अपने विस्तृत निर्णय में कहा कि “यदि विवेचना के बाद यह स्पष्ट हो जाए कि कोई अपराध घटित नहीं हुआ है, तो यह केवल पुलिस की औपचारिकता नहीं, बल्कि विधिक दायित्व है कि झूठी सूचना देने वालों के खिलाफ भी आपराधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।” कोर्ट ने दो टूक कहा कि केवल फाइनल रिपोर्ट (Final Report / Closure Report) दाखिल कर देना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ-साथ झूठी एफआईआर कराने वाले और उसमें नामित गवाहों के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराना अनिवार्य होगा, ताकि उनके विरुद्ध विधि सम्मत कार्यवाही शुरू की जा सके।
किन कानूनी धाराओं का दिया गया हवाला?
कोर्ट ने अपने आदेश में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की स्पष्ट व्याख्या करते हुए कहा कि
- बीएनएस की धारा 212 और 217 (पूर्व भारतीय दंड संहिता की धारा 177 और 182) पुलिस को झूठी सूचना देने से संबंधित अपराध।
- बीएनएसएस की धारा 215(1)(A) (पूर्व दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195(1)(A)) जिसके तहत न्यायालय तभी संज्ञान ले सकता है जब सक्षम अधिकारी द्वारा लिखित शिकायत दाखिल की जाए।
अदालत ने कहा कि यदि विवेचना अधिकारी इन धाराओं के तहत शिकायत दाखिल नहीं करता, तो वह स्वयं कानून के उल्लंघन का दोषी माना जाएगा।
पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही: अब लापरवाही नहीं चलेगी
यह फैसला केवल शिकायतकर्ता या गवाहों तक सीमित नहीं है। अदालत ने पुलिस तंत्र की संरचनात्मक जवाबदेही तय करते हुए कहा कि विवेचना अधिकारी (IO), थाना प्रभारी (SHO), अग्रेषण अधिकारी / सर्किल ऑफिसर, अपर पुलिस अधीक्षक (ASP), लोक अभियोजक यदि झूठी एफआईआर के बावजूद आवश्यक कानूनी कार्रवाई नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही, और आवश्यकता पड़ने पर अदालत की अवमानना (Contempt of Court) की कार्रवाई भी की जा सकती है।
इस संदर्भ में कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के मुखिया डीजीपी उत्तर प्रदेश को निर्देश दिया है कि वे पूरे प्रदेश में 60 दिनों के भीतर इस आदेश का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करें।
न्यायिक मजिस्ट्रेटों को भी स्पष्ट संदेश
इस फैसले का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने न्यायिक मजिस्ट्रेटों की भूमिका को भी कठघरे में खड़ा किया है।
कोर्ट ने कहा कि
1. यदि किसी मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होती है, तो मजिस्ट्रेट केवल रिपोर्ट के आधार पर निर्णय न लें।
2. पूरी केस डायरी और दस्तावेज़ मंगाकर उनका सूक्ष्म परीक्षण करें।
3. यदि एफआईआर प्रथम दृष्टया झूठी प्रतीत होती है, तो पुलिस को शिकायतकर्ता और गवाहों के खिलाफ लिखित शिकायत दाखिल करने का निर्देश दें।
4. यदि शिकायतकर्ता प्रोटेस्ट याचिका दाखिल करता है, तो उसे सुनने के बाद ही यह तय करें कि
o धारा 190(1)(A) CrPC के तहत संज्ञान लेना है या नहीं,
o या धारा 190(1)(B) के तहत आगे की कार्यवाही करनी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून की प्रक्रिया को दरकिनार कर मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
60 दिनों की समय-सीमा: क्यों अहम है यह निर्देश?
कोर्ट ने पंजाब बनाम राज सिंह (1998) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हल देते हुए कहा कि झूठी सूचना के अपराध में कोर्ट लोक सेवक की लिखित शिकायत के बिना बौद्धिक नहीं ले सकता, इसलिए पुलिस द्वारा शिकायत दर्ज करना अनिवार्य है। कोर्ट ने प्रदेश के पुलिस कांस्टेबल और न्यायिक अधिकारियों को 60 दिन के भीतर जिन शिकायतों का पालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया है, उनमें -
झूठी सूचना पर कार्रवाई अनिवार्यः जब भी पुलिस किसी मामले में यह कहते हुए अंतिम रिपोर्ट लगाती है कि आरोप झूठी या संदिग्ध थे, तो पुलिस को अनिवार्य रूप से सूचना देने वाले और गवाहों के खिलाफ बीएनएसएस की धारा 215 (1) के तहत लिखित शिकायत दर्ज करनी होगी।
मजिस्ट्रेट की भूमिकाः मजिस्ट्रेट ऐसी अंतिम रिपोर्ट को तब तक स्वीकार न करें जब तक उसके साथ झूठी सूचना देने वाले के खिलाफ लिखित शिकायत न हो। यदि विरोध याचिका दाखिल की जाती है, तो पुलिस की शिकायत पर कार्रवाई तब तक रुकी रहेगी जब तक विरोध याचिका पर फैसला नहीं हो जाता।
अवमानना की चेतावनी: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन शिकायतों का पालन न करना कोर्ट की अवमानना माना जाएगा। इस मामले में प्रवीण कुमार गिरी ने यह भी साफ किया कि असंज्ञेय अपराध में पुलिस की रिपोर्ट को स्टेट केस नहीं, बल्कि परिवाद माना जाना चाहिए। इसी के साथ कोर्ट ने अलीगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें असंज्ञेय मामले में पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञेय अपराध की तरह मनोवैज्ञानिक लिया गया था। हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि “कानून के अनुसार न्यायिक कार्यवाही को विनियमित करना केवल पुलिस का नहीं, बल्कि न्यायिक अधिकारियों का भी दायित्व है।” इसीलिए-
- पुलिस महानिदेशक,
- पुलिस आयुक्त,
- वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक,
- पुलिस अधीक्षक
सभी को निर्देश दिए गए हैं कि 60 दिनों के भीतर अधीनस्थ अधिकारियों के लिए स्पष्ट आदेश जारी किए जाएँ। यदि ऐसा नहीं होता, तो हाई कोर्ट स्वयं हस्तक्षेप करेगा।
पूरा प्रकरण: अलीगढ़ का मामला कैसे बना मिसाल
यह मामला अलीगढ़ से जुड़ा है, जहाँ
- उम्मे फ़ारवा ने अपने पूर्व पति महमूद आलम ख़ान द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर को हाई कोर्ट में चुनौती दी।
- दोनों पहले कोरिया के सियोल में रहते थे।
- लिव-इन संबंध को लेकर विवाद हुआ, तलाक हुआ और उसके बाद अलीगढ़ के क्वार्सी थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई।
- पुलिस ने विवेचना के बाद पाया कि कोई अपराध नहीं बनता और फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी।
- लेकिन शिकायतकर्ता की प्रोटेस्ट याचिका पर अलीगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) ने केस कायम रखते हुए समन जारी कर दिया। इसी आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।
हाई कोर्ट का हस्तक्षेप और संतुलित रुख
हाई कोर्ट ने
- मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द कर दिया,
- और निर्देश दिया कि मामले पर नए सिरे से, विधि अनुसार, दोनों पक्षों को सुनकर निर्णय लिया जाए।
हालाँकि अदालत ने यह भी कहा कि
- मजिस्ट्रेट की सफाई को आंशिक रूप से संतोषजनक माना जाता है,
- और हाई कोर्ट की टिप्पणी का उनके करियर पर भविष्य में कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
यह टिप्पणी अदालत के संवैधानिक संतुलन और न्यायिक शालीनता को भी दर्शाती है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय: गेम चेंजर फैसला
वरिष्ठ अधिवक्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि
- यह फैसला झूठी एफआईआर की प्रवृत्ति पर निर्णायक रोक लगाएगा।
- गवाहों को भी जवाबदेह ठहराने से ‘नाम जोड़ दो, बयान लिखवा दो’ वाली संस्कृति पर अंकुश लगेगा।
- पुलिस की विवेचना अब केवल औपचारिकता नहीं रहेगी, बल्कि उसके हर निष्कर्ष के साथ कानूनी परिणाम जुड़े होंगे।
आम नागरिक के लिए क्या बदलेगा?
इस फैसले के बाद
- निर्दोष व्यक्ति को झूठी एफआईआर के बावजूद कानूनी सुरक्षा मिलेगी।
- शिकायत दर्ज कराते समय लोग जिम्मेदारी और सत्य के प्रति अधिक सतर्क होंगे।
- पुलिस और न्यायालय दोनों पर पारदर्शिता और जवाबदेही का दबाव बढ़ेगा।
कानून का भय नहीं, कानून का सम्मान
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि कानून न्याय के लिए है, बदले के लिए नहीं। झूठी एफआईआर, झूठे गवाह और लापरवाह जाँच तीनों ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक हैं। यह निर्णय न्यायपालिका का वह साहसिक कदम है, जो न्यायिक प्रक्रिया को पुनः विश्वासयोग्य बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
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