कथाकार नहीं रहे, समय की बेचैनी रह गई
प्रख्यात कथाकार, संपादक और वैचारिक हस्तक्षेप के प्रतीक ज्ञानरंजन का निधन हिंदी साहित्य के लिए केवल एक रचनाकार का जाना नहीं है, बल्कि उस बेचैन दृष्टि का अवसान है, जो साहित्य को सत्ता, सुविधा और समझौतों से लगातार टकराने की ताक़त देती थी।
हिंदी साहित्य के इतिहास में कुछ लेखक ऐसे होते हैं जिनका जाना केवल साहित्यिक क्षति नहीं होता, बल्कि बौद्धिक चेतना में आई दरार की तरह महसूस होता है। ज्ञानरंजन का निधन ऐसा ही एक क्षण है। यह उस लेखक का जाना है, जिसने कभी साहित्य को आरामदेह नहीं होने दिया; जिसने कहानी को मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की बेचैनी का दस्तावेज़ माना; और जिसने संपादन को प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि जोखिम भरा वैचारिक हस्तक्षेप बनाया।
साहित्य में असुविधा की जरूरत
ज्ञानरंजन उस परंपरा के लेखक थे जो यह मानते थे कि साहित्य का मूल उद्देश्य पाठक को संतुष्ट करना नहीं, बल्कि उसे असहज करना है। वे जानते थे कि जो साहित्य केवल सुख देता है, वह अंततः सत्ता और सुविधा का साझीदार बन जाता है। उनकी कहानियाँ पाठक को वहीं छोड़ देती हैं, जहाँ सवाल खत्म नहीं होते, जहाँ उत्तर नहीं, बल्कि आत्म-परीक्षा शुरू होती है। उनका लेखन यह स्वीकार करता है कि समाज की सच्चाइयाँ अक्सर सुंदर नहीं होतीं। वे टूटन, भय, अवसरवाद, नैतिक पतन और मध्यवर्गीय पाखंड को बिना सजावट के सामने रखते हैं। उनके पात्र न तो नायक होते हैं, न खलनायक, वे उस ग्रे ज़ोन के निवासी होते हैं, जिसमें आज का समाज सांस लेता है।
कहानी: शिल्प नहीं, हस्तक्षेप
ज्ञानरंजन की कहानियाँ पारंपरिक अर्थों में ‘रस’ या ‘रोमांच’ नहीं रचतीं। वे संरचनात्मक बेचैनी पैदा करती हैं। उनकी कथा-दृष्टि का केंद्र व्यक्ति नहीं, बल्कि व्यक्ति को गढ़ने वाली सामाजिक-राजनीतिक स्थितियाँ हैं। उनके पात्र किसी महान आदर्श के प्रतिनिधि नहीं होते, वे हमारे आसपास के साधारण लोग हैं, जो समझौतों, डर, महत्वाकांक्षाओं और चुप्पियों से बने हैं। उन्होंने हिंदी कहानी को यह सिखाया कि कहानी केवल घटना का विवरण नहीं, बल्कि सत्ता और समाज के बीच छुपे संबंधों की पड़ताल है। उनकी रचनाओं में मध्यवर्गीय नैतिकता की पोल खुलती है। वह नैतिकता जो सही-गलत का फैसला अपने हितों के अनुसार बदल लेती है। ज्ञानरंजन इस वर्ग के भीतर से ही उसके पाखंड पर प्रहार करते हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ आज भी असहज करती हैं, क्योंकि वे हमें आईना दिखाती हैं, उपदेश नहीं देतीं।
कहानी की राजनीति और संरचना
ज्ञानरंजन की कथा-दृष्टि का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने हिंदी कहानी को संरचनात्मक राजनीति से जोड़ा। उनके लिए कहानी किसी एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का बयान है जो व्यक्ति को गढ़ती है। वे घटनाओं से अधिक स्थितियों में रुचि रखते थे। वे परिस्थितियाँ जो इंसान को समझौता करना सिखाती हैं, चुप रहना सिखाती हैं, और धीरे-धीरे अन्याय का साझीदार बना देती हैं। उनकी कहानियों में मध्यवर्ग एक केंद्रीय पात्र की तरह उपस्थित है। एक ऐसा वर्ग जो नैतिकता की भाषा तो बहुत बोलता है, लेकिन अवसर आने पर सत्ता के साथ खड़ा हो जाता है। ज्ञानरंजन इस वर्ग को बाहर से नहीं, भीतर से बेनकाब करते हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ कई बार असहज करती हैं, चुभती हैं, और कभी-कभी नाराज़ भी करती हैं।
संपादक के रूप में वैचारिक साहस
ज्ञानरंजन का साहित्यिक योगदान केवल रचना तक सीमित नहीं था। एक संपादक के रूप में उन्होंने हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता को वह गरिमा दी, जो आज दुर्लभ होती जा रही है। उनके लिए पत्रिका केवल रचनाओं का संग्रह नहीं थी, बल्कि समय के साथ सीधी बहस का माध्यम थी। उन्होंने संपादन को सत्ता, पुरस्कार और संस्थानों से दूरी बनाकर किया। यह दूरी कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सचेत वैचारिक निर्णय थी। वे जानते थे कि साहित्य जब सत्ता के बहुत करीब चला जाता है, तो उसकी भाषा बदलने लगती है, वह सवाल पूछना छोड़ देती है और औचित्य सिद्ध करने लगती है। नए लेखकों को अवसर देते समय भी वे केवल भाषा या शिल्प नहीं देखते थे, बल्कि यह भी देखते थे कि लेखक अपने समय के प्रति कितना ईमानदार है। उनके संपादन में वैचारिक अनुशासन था, लेकिन वह अनुशासन दमनकारी नहीं, बौद्धिक रूप से जिम्मेदार था।
लोकप्रियता बनाम प्रासंगिकता
ज्ञानरंजन उस दौर के लेखक थे जब लोकप्रिय होना साहित्यिक सफलता का पैमाना नहीं माना जाता था। उनके लिए महत्वपूर्ण यह नहीं था कि कितने लोग किसी रचना को पसंद कर रहे हैं, बल्कि यह था कि वह रचना किससे टकरा रही है। वे जानते थे कि कई बार सबसे जरूरी लेखन वही होता है, जिसे तत्काल सराहना नहीं मिलती। आज के समय में, जब साहित्य भी सोशल मीडिया, मार्केटिंग और ब्रांडिंग की भाषा में ढलता जा रहा है, ज्ञानरंजन का लेखन एक जरूरी प्रतिपक्ष की तरह खड़ा दिखाई देता है। वे याद दिलाते हैं कि साहित्य का मूल्य उसके ‘वायरल’ होने में नहीं, बल्कि उसके वैचारिक जोखिम में होता है।
बुद्धिजीवी की चुप्पी पर प्रहार
ज्ञानरंजन ने केवल सत्ता की आलोचना नहीं की; उन्होंने साहित्यिक समाज और बुद्धिजीवियों की चुप्पी को भी कठघरे में खड़ा किया। उनके लेखन में एक तीखा सवाल बार-बार उभरता है, जब अन्याय हो रहा हो, तब तटस्थ रहना किसके पक्ष में खड़ा होना है? वे मानते थे कि तटस्थता अक्सर यथास्थिति का समर्थन बन जाती है। इसलिए उनके लेखन और संपादन में स्पष्ट पक्षधरता दिखाई देती है कमजोर के पक्ष में, सच के पक्ष में, और सत्ता से सवाल करने के पक्ष में।
आज के भारत में ज्ञानरंजन की प्रासंगिकता
ज्ञानरंजन का जाना ऐसे समय में हुआ है जब असहमति को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है, जब सवाल पूछने वालों को हाशिये पर धकेला जा रहा है, और जब साहित्य से भी ‘सुरक्षित’ रहने की अपेक्षा की जा रही है। ऐसे समय में उनकी रचनाएँ और विचार हमें यह याद दिलाते हैं कि साहित्य का सबसे बड़ा धर्म है सवाल पूछते रहना। उनकी विरासत हमें यह भी सिखाती है कि लेखक का काम सत्ता का विरोध करना भर नहीं, बल्कि समाज के भीतर मौजूद सुविधाजनक झूठ को भी उजागर करना है।
एक नैतिक विरासत
ज्ञानरंजन का लेखन हमें किसी आसान निष्कर्ष तक नहीं पहुँचाता। वह हमें रास्ते में छोड़ देता है विचारों के बीच, असमंजस के बीच, सवालों के बीच। और शायद यही उनकी सबसे बड़ी देन है। वे पाठक को उपभोक्ता नहीं बनाते, बल्कि सहभागी बनाते हैं। उनकी विरासत आज के लेखकों और पाठकों दोनों के लिए एक चुनौती है। यह चुनौती है ईमानदार रहने की, असुविधा स्वीकार करने की, और समय के साथ सहज न होने की।
अंतिम विदाई नहीं, एक शुरुआत
ज्ञानरंजन का जाना एक रिक्ति है, लेकिन उनकी रचनाएँ, उनका संपादकीय साहस और उनकी वैचारिक दृढ़ता आज भी हमारे साथ है। वे उन लेखकों में से हैं जिनका प्रभाव उनकी अनुपस्थिति में और अधिक स्पष्ट होता है। जागो टीवी इस अवसर पर एक निर्भीक कथाकार, सजग संपादक और असहमति के लेखक को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है। उनकी कमी खलती रहेगी और यही खलना शायद हमें यह याद दिलाता रहेगा कि साहित्य का काम चैन देना नहीं, चेतना जगाना है।
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