उत्तर प्रदेश ‘पुलिस स्टेट’ की ओर? कानपुर में सत्यम त्रिवेदी को जारी पुलिसिया नोटिस ने खड़े किए गंभीर सवाल
कानपुर में सत्यम त्रिवेदी को धारा 130 बी.एन.एस.एस. के तहत जारी पुलिस नोटिस ने निवारक कानूनों, नागरिक स्वतंत्रता और ‘पुलिस स्टेट’ की बहस को तेज कर दिया है।
पूरा मामला
दिनांक 29 अप्रैल 2025 को सहायक पुलिस आयुक्त/विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट, पनकी द्वारा जारी नोटिस में थानाध्यक्ष की 10.04.2025 की आख्या के आधार पर सत्यम त्रिवेदी को न्यायालय में उपस्थित होकर यह बताने का निर्देश दिया गया कि क्यों न उससे ₹50,000 का मुचलका और दो समान धनराशि की प्रतिभूतियाँ लेकर एक वर्ष तक नेक चाल-चलन बनाए रखने का आदेश पारित कर दिया जाए।
नोटिस की भाषा अत्यंत कठोर है, जिसमें कहा गया है कि विपक्षी के खुले घूमने से ‘क्षेत्र में आतंक और भय' है। परंतु जिन तथ्यों का हवाला दिया गया, उनमें शामिल हैं:
- मु.अ.सं. 22/2025 - धारा 303(2) बीएनएस (थाना गुजैनी)
- मु.अ.सं. 116/2025 - धारा 352/351(2) बीएनएस (थाना पनकी)
- बीट सूचना रिपोर्ट (दिनांक 04 व 05 अप्रैल 2025)
इन प्रविष्टियों में दोषसिद्धि, चार्जशीट की स्थिति, या न्यायालयीन निष्कर्ष का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, फिर भी व्यक्ति को ‘जन-भय का स्रोत’ ठहराते हुए बंधपत्र की मांग की गई।
कानूनी और लोकतांत्रिक सवाल
1. निर्दोषता की धारणा (Presumption of Innocence): बिना दोषसिद्धि के किसी को ‘भयंकर अपराधी’ बताना क्या संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है?
2. निवारक कानूनों का प्रयोग: धारा 130 बी.एन.एस.एस. का उद्देश्य शांति-व्यवस्था है, न कि दंडात्मक दमन। क्या यहाँ अनुपातिकता का पालन हुआ?
3. बीट रिपोर्ट की विश्वसनीयता: क्या केवल बीट सूचना को आधार बनाकर नागरिक स्वतंत्रता सीमित की जा सकती है?
4. भाषा की कठोरता: न्यायिक नोटिस में प्रयुक्त शब्दावली निष्पक्षता पर सवाल उठाती है।
मानवाधिकार दृष्टिकोण
कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार के नोटिस डर का वातावरण बनाते हैं, जहाँ पुलिस रिपोर्ट स्वयं 'सत्य' बन जाती है और नागरिक को पहले ही अपराधी मान लिया जाता है। यह प्रवृत्ति यदि सामान्य हुई, तो कानून का शासन (Rule of Law) कमजोर पड़ सकता है।
सत्यम त्रिवेदी को जारी नोटिस केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, यह राज्य बनाम नागरिक स्वतंत्रता की बहस है। उत्तर प्रदेश में निवारक कानूनों के उपयोग पर पारदर्शिता, न्यायिक निगरानी और संतुलन अनिवार्य है, अन्यथा ‘पुलिस स्टेट’ की आशंका केवल आशंका नहीं रह जाएगी।
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