फर्श पर चढ़ी ड्रिप, सवालों के घेरे में सिस्टम
गोरखपुर के BRD मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी के दौरान एक बच्चे को बेड नहीं मिला, फर्श पर बैठाकर ड्रिप चढ़ाई गई। मुख्यमंत्री के गृह जनपद में उजागर हुई स्वास्थ्य व्यवस्था की सचाई।
मुख्यमंत्री के गृह जनपद गोरखपुर के BRD मेडिकल कॉलेज में उजागर हुई सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की भयावह तस्वीर
घटना का विवरण
साइकिल चलाते समय एक नाबालिग बच्चा गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गया। उसका हाथ टूट गया और दर्द से कराहता बच्चा परिजनों के साथ तुरंत गोरखपुर के BRD मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी में पहुँचा। परिजन इस उम्मीद में थे कि प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेजों में से एक में उनके बच्चे को तत्काल और सुरक्षित इलाज मिलेगा। लेकिन इमरजेंसी में जो दृश्य सामने आया, उसने सभी को स्तब्ध कर दिया। न तो बच्चे को लेटाने के लिए बेड उपलब्ध था, न ही स्ट्रेचर या व्हीलचेयर, और न ही किसी वैकल्पिक व्यवस्था का संकेत। अंततः बच्चे को इमरजेंसी आर्थो ओटी के सामने फर्श पर बैठाकर, दीवार की खूंटी में बोतल टांग कर ड्रिप चढ़ाई गई। यह सब खुलेआम, दर्जनों मरीजों और परिजनों की मौजूदगी में हुआ।
मानवीय गरिमा और चिकित्सा मानकों पर चोट
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, हड्डी टूटने जैसे मामलों में मरीज को समुचित सपोर्ट, स्वच्छ वातावरण और नियंत्रित स्थिति में इलाज मिलना आवश्यक होता है। फर्श पर बैठाकर ड्रिप चढ़ाना: संक्रमण का गंभीर खतरा पैदा करता है, चिकित्सा प्रोटोकॉल का उल्लंघन है, और सबसे बढ़कर, मानवीय गरिमा के विरुद्ध है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब एक बच्चे के इलाज में इस स्तर की लापरवाही बरती जा रही है, तो गंभीर ट्रॉमा, बुजुर्गों या महिलाओं के मामलों में हालात कैसे होंगे?
दावे बनाम ज़मीनी हकीकत
उत्तर प्रदेश सरकार बार-बार यह दावा करती रही है कि: हर जिले में मेडिकल कॉलेज खोले जा रहे हैं, स्वास्थ्य ढांचे का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है, और इमरजेंसी सेवाओं को सुदृढ़ किया गया है। लेकिन मुख्यमंत्री के अपने शहर के सबसे बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेज में यदि एक बच्चे को ड्रिप चढ़ाने के लिए बेड तक नहीं मिलता, तो ये दावे खोखले प्रतीत होते हैं। सवाल यह नहीं है कि कितनी इमारतें बनीं, सवाल यह है कि: क्या पर्याप्त बेड, स्टाफ और उपकरण उपलब्ध हैं?
क्या इमरजेंसी सेवाएँ वास्तव में 24×7 प्रभावी हैं?
क्या मरीजों की संख्या के अनुपात में संसाधन बढ़ाए गए हैं?
ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल
BRD मेडिकल कॉलेज को पूर्वांचल के कई जिलों का रेफरल सेंटर माना जाता है। यहाँ हालात इतने बदतर हैं, तो: ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) की स्थिति का अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं है। जहाँ पहले से ही डॉक्टरों की कमी, दवाओं का अभाव और रेफरल सिस्टम की विफलता की शिकायतें आम हैं, वहाँ यह घटना पूरे स्वास्थ्य ढांचे की पोल खोलती है।
प्रशासनिक जवाबदेही कहाँ?
इस मामले में अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि: इमरजेंसी में बेड क्यों उपलब्ध नहीं था?
क्या यह स्थायी कमी है या प्रबंधन की लापरवाही?
क्या अस्पताल प्रशासन ने इसकी सूचना उच्च अधिकारियों को दी?
यदि ऐसी घटनाओं पर त्वरित जांच और जवाबदेही तय नहीं होती, तो यह एक खतरनाक मिसाल बन सकती है।
यह घटना केवल एक अस्पताल की अव्यवस्था नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता का आईना है। स्वास्थ्य सेवाएँ किसी प्रचार अभियान का हिस्सा नहीं, बल्कि नागरिकों का मौलिक अधिकार हैं। जब मुख्यमंत्री के गृह जनपद में एक बच्चे को फर्श पर बैठाकर ड्रिप चढ़ाई जाती है, तो यह सवाल पूरे प्रदेश के सामने खड़ा हो जाता है, क्या हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था वास्तव में आम आदमी के लिए है?
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