शब्दभूमि प्रकाशन की राष्ट्रीय संगोष्ठी में डिजिटल युग की हिंदी लघुकथा पर व्यापक विमर्श

शब्दभूमि प्रकाशन की राष्ट्रीय ऑनलाइन संगोष्ठी में सोशल मीडिया, AI, स्त्री चेतना और डिजिटल युग में हिंदी लघुकथा की चुनौतियों एवं संभावनाओं पर देशभर के साहित्यकारों, शोधार्थियों और शिक्षकों ने अपने विचार रखे।

May 19, 2026 - 07:41
May 19, 2026 - 08:53
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शब्दभूमि प्रकाशन की राष्ट्रीय संगोष्ठी में डिजिटल युग की हिंदी लघुकथा पर व्यापक विमर्श
हिंदी लघुकथा के नए आयामों पर आयोजित संवाद के वक्तागण

शब्दभूमि प्रकाशन की राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर के साहित्यकारों, शोधार्थियों और शिक्षकों ने रखे विचार

शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा डिजिटल युग में हिंदी लघुकथा : संवेदना से स्क्रीन तक की यात्राविषय पर राष्ट्रीय ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े साहित्यकारों, शोधार्थियों, शिक्षकों और साहित्यप्रेमियों ने भाग लेकर समकालीन हिंदी लघुकथा की दिशा, चुनौतियों और संभावनाओं पर गंभीर चर्चा की।

कार्यक्रम के प्रारंभ में संचालिका गायत्री उपाध्याय ने कहा कि शब्दभूमि प्रकाशन केवल पुस्तकों के प्रकाशन तक सीमित नहीं है, बल्कि साहित्यिक संवाद, सांस्कृतिक विमर्श और सामाजिक चेतना के विस्तार का भी माध्यम है। डिजिटल मंचों ने हिंदी साहित्य, विशेषकर लघुकथा को नए पाठक, नई अभिव्यक्ति और व्यापक पहुंच प्रदान की है।

संगोष्ठी में शोधार्थी संजय शाह ने हिंदी और बांग्ला कहानियों में स्त्री चेतनाविषय पर बोलते हुए महादेवी वर्मा, कृष्णा सोबती, मनु भंडारी, आशापूर्णा देवी और महाश्वेता देवी की रचनाओं के उदाहरण देते हुए हिंदी और बांग्ला साहित्य में स्त्री प्रतिरोध और स्वतंत्र चेतना के स्वर को रेखांकित किया।

मुकेश राम ने सोशल मीडिया और लघुकथा : अवसर या चुनौतीविषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि सोशल मीडिया ने नए लेखकों को मंच दिया है और हिंदी साहित्य को वैश्विक पाठक वर्ग तक पहुंचाया है। उन्होंने साहित्यिक चोरी, सतही लेखन और लाइक-फॉलोअर्स की संस्कृति को गंभीर चुनौती बताते हुए साहित्यिक मूल्यों की रक्षा की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. आशीष कुमारी कांता ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता और लघुकथा की रचनात्मकताविषय पर वक्तव्य देते हुए कहा कि AI कथाकार को प्लॉट, चरित्र और कथानक निर्माण में सहायता कर सकता है, लेकिन कहानी की भावनात्मक गहराई और मानवीय संवेदना अब भी मनुष्य की रचनात्मक चेतना से ही संभव है। उन्होंने एआई को साहित्यकार का सहायक उपकरण बताते हुए उसके विवेकपूर्ण उपयोग की बात कही।

राजीव रंजन ने सोशल मीडिया के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों पर चर्चा करते हुए कहा कि डिजिटल माध्यमों ने शिक्षा, व्यापार और सामाजिक जागरूकता को नई गति दी है, लेकिन फेक न्यूज़, साइबर बुलिंग और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं भी तेजी से बढ़ी हैं। उन्होंने संतुलित और जिम्मेदार उपयोग की आवश्यकता पर बल दिया।

राजस्थान से जुड़े मुन्नाराम मेघवाल ने सोशल मीडिया को चुनौती से अधिक अवसर बताते हुए कहा कि साहित्य भी सामाजिक और तकनीकी बदलावों से अछूता नहीं रह सकता। उन्होंने कहा कि सकारात्मक चिंतन और सही दिशा में प्रयास के माध्यम से डिजिटल मंच हिंदी साहित्य के विकास में सहायक बन सकते हैं।

केरल से जुड़ी मिथिला पी. नायर ने डिजिटल माध्यमों पर लघुकथा का बदलता स्वरूपविषय पर विस्तार से विचार रखते हुए कहा कि ब्लॉग, ई-पत्रिकाएं, सोशल मीडिया, पॉडकास्ट और वीडियो मंचों ने लघुकथा को वैश्विक पहचान दिलाई है। उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल युग में भाषा अधिक संवादात्मक और संक्षिप्त हुई है, लेकिन साहित्यिक गुणवत्ता और मौलिकता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है।

तमिलनाडु से डॉ. वी. मल्लिका ने हिंदी लघुकथा में AI के प्रयोग और महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता लेखन प्रक्रिया को गति देती है, अनुवाद और संपादन में मदद करती है तथा नए विषयों के सुझाव देती है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि कहानी की आत्मा, संवेदना और मानवीय अनुभव का स्थान कोई तकनीक नहीं ले सकती।

महाराष्ट्र से राहुल भिवा हातागले ने परंपरा से प्रयोग तक : हिंदी लघुकथा की संभावनाएंविषय पर अपने वक्तव्य की शुरुआत करते हुए हिंदी साहित्य की गतिशीलता और परिवर्तनशील स्वरूप की चर्चा की। हालांकि तकनीकी व्यवधान के कारण उनका वक्तव्य पूर्ण रूप से श्रोताओं तक नहीं पहुंच सका।

संगोष्ठी में छत्तीसगढ़ से जुड़ी शांति सोनी ने स्त्री, दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक विमर्श में लघुकथा की भूमिकाविषय पर अपने विचार रखने हेतु सहभागिता दर्ज कराई। उन्होंने लघुकथा को सामाजिक न्याय, हाशिए के समुदायों की आवाज और संवेदनशील अभिव्यक्ति का प्रभावशाली माध्यम बताया। हालांकि तकनीकी कारणों से उनका विस्तृत वक्तव्य पूर्ण रूप से प्रस्तुत नहीं हो सका, फिर भी उनके विषय ने संगोष्ठी में सामाजिक विमर्श की व्यापकता को रेखांकित किया।

इसी क्रम में राजेश देहाती ने भी डिजिटल दौर में साहित्य और लोक संवेदना के संबंध पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों ने गांव, कस्बों और आम जनजीवन से जुड़े अनुभवों को साहित्य के केंद्र में लाने का कार्य किया है।

संगोष्ठी के दौरान कई वक्ताओं ने तकनीकी समस्याओं और विषय की पूर्व सूचना न मिलने की बात भी रखी। पुष्कर, राजस्थान से डॉ. तुहिना प्रकाश शर्मा ने सुझाव दिया कि भविष्य में वक्ताओं को विषय कुछ दिन पहले उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे बेहतर तैयारी के साथ भाग ले सकें। आयोजकों ने इस सुझाव का स्वागत करते हुए आगामी कार्यक्रमों में बेहतर समन्वय का आश्वासन दिया।

संगोष्ठी में देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े अनेक साहित्यकारों, शोधार्थियों और शिक्षकों की सक्रिय सहभागिता रही। कार्यक्रम में डॉ. मिनाक्षी सोनवणे (नागपुर, महाराष्ट्र), मुकेश राम (दमोह, मध्यप्रदेश), संजय साह (बिहार), डॉ. आशिष कुमारी कांता (मुजफ्फरपुर, बिहार), डॉ. बी. मल्लिका (दिण्डुक्कल, तमिलनाडु), आशीष अम्बर (दरभंगा, बिहार), डॉ. तुहिना प्रकाश शर्मा (अजमेर, राजस्थान), शांति सोनी (बिलासपुर, छत्तीसगढ़), राजीव रंजन (पटना, बिहार), मुन्ना राम मेघवाल (डीडवाना-कुचामन, राजस्थान), मिथिला पी. नायर (एर्णाकुलम, केरल), राहुल भिवा हातागले (संभाजीनगर, महाराष्ट्र) तथा सुषमा शुक्ला (मुंबई, महाराष्ट्र) सहित अनेक प्रतिभागियों ने उपस्थिति दर्ज कराई।

इन प्रतिभागियों की सहभागिता ने संगोष्ठी को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करते हुए हिंदी लघुकथा, डिजिटल साहित्य, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और समकालीन साहित्यिक विमर्शों पर बहुआयामी संवाद का मंच बनाया।

संगोष्ठी के आयोजन एवं संचालन में संयोजक मंडल की सक्रिय भूमिका भी उल्लेखनीय रही। आयोजन समिति में प्रिया श्रीवास्तव, प्रिया पाण्डेय रोशनी’, श्रद्धा गुप्ता केशरी’, नूपुर श्रीवास्तव, निधि कुमारी सिंह तथा गायत्री उपाध्याय शामिल रहीं, जिन्होंने कार्यक्रम के सफलता में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

कार्यक्रम की संचालिका गायत्री उपाध्याय ने कहा कि हिंदी लघुकथा आज केवल साहित्यिक विधा नहीं रह गई है, बल्कि डिजिटल संस्कृति और सामाजिक विमर्श का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है। यह संगोष्ठी हिंदी साहित्य और डिजिटल तकनीक के बदलते संबंधों पर एक महत्वपूर्ण और सार्थक संवाद साबित हुई।

कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन निधि गुप्ता द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसमें उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े वक्ताओं, शोधार्थियों, श्रोताओं तथा साहित्यप्रेमियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए हिंदी लघुकथा और डिजिटल साहित्य के इस संवाद को निरंतर आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I