'साहित्यिक अड्डा' में कविता, ग़ज़ल, लोकगीत और मुक्त संवाद का अद्भुत समागम
कोलकाता में आयोजित 'साहित्यिक अड्डा' में वरिष्ठ साहित्यकारों, पत्रकारों, ग़ज़लकारों, कवियों और युवा रचनाकारों ने कविता, ग़ज़ल, लोकगीत प्रस्तुतियों के माध्यम से साहित्य और समाज के समकालीन प्रश्नों पर विचार साझा किए। कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि इसमें पारंपरिक औपचारिकताओं के स्थान पर खुला साहित्यिक संवाद आयोजित किया गया, जिसमें विद्यार्थियों को भी अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति का मंच मिला।
'साहित्यिक अड्डा' में कविता, ग़ज़ल, लोकगीत और मुक्त संवाद का अद्भुत समागम
हावड़ा, 29 जून 2026। बारिश से भीगी शाम में जब अधिकांश सांस्कृतिक गतिविधियाँ थम जाती हैं, तब साहित्य प्रेमियों ने यह सिद्ध कर दिया कि शब्दों का संसार मौसम का मोहताज नहीं होता। आत्मीय संवाद, साहित्यिक विमर्श और लोकसंस्कृति को समर्पित ‘साहित्यिक अड्डा’ का आयोजन अत्यंत गरिमापूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें परंपरागत मुख्य अतिथि, अध्यक्षीय भाषण, औपचारिक स्वागत और लंबे मंचीय संबोधनों के स्थान पर साहित्य को केंद्र में रखकर मुक्त संवाद, कविता, ग़ज़ल और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को प्राथमिकता दी गई।
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के स्मरण के साथ हुआ। संचालन करते हुए सुशील कुमार पांडेय ने स्पष्ट किया कि साहित्यिक अड्डा केवल एक मंच नहीं, बल्कि ऐसा साहित्यिक परिवार है जहाँ मंच और श्रोता के बीच कोई दूरी नहीं होती। यहाँ साहित्य को भाषण नहीं बल्कि संवाद के रूप में जीने का प्रयास किया जाता है। संचालक ने अज्ञेय, मुक्तिबोध, कबीर और दुष्यंत कुमार जैसे रचनाकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि साहित्य का मूल उद्देश्य समाज के विवेक को जागृत करना और समय से प्रश्न करना है।
स्वास्थ्य कारणों से नहीं पहुँच सके कृष्ण कल्पित
आयोजन के केंद्र में वरिष्ठ कवि कृष्ण कल्पित का विशेष संवाद प्रस्तावित था। संचालक ने बताया कि उन्होंने स्नेहपूर्वक कार्यक्रम का आमंत्रण स्वीकार किया था, किन्तु अस्वस्थता के कारण अंतिम समय में उपस्थित नहीं हो सके। उनका संदेश सुनाते हुए संचालक ने उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की और विश्वास व्यक्त किया कि आगामी साहित्यिक अड्डा में उनका सान्निध्य अवश्य मिलेगा।
पत्रकारिता और साहित्य का साझा सरोकार
कार्यक्रम में भागलपुर से पधारे वरिष्ठ पत्रकार, कवि एवं लघुकथाकार पारस कुंज का स्वागत विद्यार्थी मंच की अध्यक्ष व मुक्तांचल की संपादक डॉ. मीरा सिन्हा ने संस्था का स्मृति चिह्न भेंटकर किया। श्री कुंज ने अपने उद्बोधन में राष्ट्रकवि गोपाल सिंह नेपाली का स्मरण करते हुए साहित्य की स्वतंत्र चेतना, अभिव्यक्ति की निर्भीकता और सामाजिक जिम्मेदारी पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कलम केवल शब्द नहीं लिखती, बल्कि इतिहास की दिशा भी निर्धारित करती है।
आशुतोष ने सुनाईं विचारोत्तेजक ग़ज़लें
भारतीय रेलवे के राजभाषा विभाग में दीर्घकाल तक सेवाएँ दे चुके वरिष्ठ साहित्यकार आशुतोष सिंह का स्वागत विद्यार्थी मंच के सचिव विवेक लाल ने संस्था का स्मृति चिह्न भेंटकर किया। श्री सिंह ने संघर्ष, समय और मनुष्य की आंतरिक यात्रा को केंद्र में रखकर अपनी ग़ज़लों का पाठ किया। उन्होंने कहा कि संघर्ष ही मनुष्य का वास्तविक शिक्षक है। उनकी रचनाओं में जीवन की जटिलताओं, बदलते सामाजिक परिवेश और मानवीय संबंधों की गहरी पड़ताल दिखाई दी।
युवा पीढ़ी ने दिखाई साहित्यिक प्रतिभा
कार्यक्रम का अत्यंत प्रेरक पक्ष रहा युवा विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी। मंगल पांडेय, रागिनी पांडेय, जाह्नवी पांडेय तथा स्वराज पांडेय ने कवि एवं गजलकार कृष्ण देव कल्पित, पारस कुंज, आशुतोष सिंह, कैलाश गौतम की रचनाओं का प्रभावशाली काव्यपाठ किया। उनकी प्रस्तुति ने यह विश्वास मजबूत किया कि नई पीढ़ी साहित्य की गंभीर परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। संचालक ने कहा कि प्रत्येक महान कवि कभी एक युवा रचनाकार ही रहा है और ऐसे मंच ही भविष्य के साहित्यकारों का निर्माण करते हैं।
स्त्री विमर्श, मजदूर जीवन और सामाजिक सरोकारों पर केंद्रित रचनाएँ
कार्यक्रम में डॉ. शुभ्रा उपाध्याय ने अपनी बहुचर्चित कविता ‘गाती हुई औरतें’ का पाठ किया। कविता में स्त्री जीवन, उसके मौन संघर्ष, सामाजिक बंधनों और उसकी रचनात्मक शक्ति का अत्यंत संवेदनशील चित्रण किया गया। इसी क्रम में डॉ. मनोज मिश्र ने श्रमिक जीवन पर आधारित अपनी कविता ‘मज़दूर’ प्रस्तुत की, जिसमें श्रमिक वर्ग के संघर्ष, अभाव और आत्मसम्मान को मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया गया। विद्यार्थी मंच के सचिव विवेक लाल ने अपने प्रिय कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की प्रसिद्ध कविता ‘भेड़िया’ का सस्वर पाठ कर उपस्थित श्रोताओं को अन्याय, भय और दमन के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध का संदेश दिया। शिक्षक सुरेन्द्र सिंह ने देश विभाजन की त्रासदी पर आधारित अपनी नई कविता तथा भोजपुरी में महँगाई पर व्यंग्यात्मक रचना प्रस्तुत कर श्रोताओं की खूब सराहना प्राप्त की।
सेराज ख़ान बातिश की ग़ज़लों ने बाँधा समाँ
कोलकाता के वरिष्ठ ग़ज़लकार सेराज ख़ान बातिश ने समकालीन राजनीति, सामाजिक विडंबनाओं, दोस्ती, प्रेम और बदलते मानवीय संबंधों पर आधारित अपनी नई ग़ज़लों का पाठ किया। उनकी शायरी में व्यंग्य, संवेदना और सामाजिक चेतना का सुंदर संतुलन दिखाई दिया। श्रोताओं ने उनकी प्रत्येक ग़ज़ल का भरपूर आनंद लिया।
लोकरंगी की प्रस्तुति बनी आकर्षण का केंद्र
कार्यक्रम का सबसे आकर्षक हिस्सा रहा लोकरंगी संस्था की सांस्कृतिक प्रस्तुति। निर्देशक रितेश पांडेय एवं उनकी टीम ने कथाकार संजीव की चर्चित कहानी ‘झूठी है, तेतरी दादी’ पर आधारित लोकगीतों का मंचन किया। शिव विवाह गीतों, लोकधुनों, डोमकच परंपरा और भोजपुरी सांस्कृतिक तत्वों से सजी इस प्रस्तुति ने उपस्थित दर्शकों को भारतीय लोकसंस्कृति की समृद्ध परंपरा से जोड़ दिया। कलाकारों द्वारा मंच पर लाइव गायन ने वातावरण को अत्यंत जीवंत बना दिया।
साहित्य को संवाद बनाने का प्रयास
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर विशेष बल दिया कि साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज में संवेदनशीलता, लोकतांत्रिक चेतना और मानवीय मूल्यों को मजबूत करना है। अनेक वक्ताओं ने साहित्य और पत्रकारिता को लोकतंत्र की नैतिक शक्ति बताते हुए नई पीढ़ी से पढ़ने, लिखने और प्रश्न करने का आह्वान किया।
बारिश भी नहीं रोक सकी साहित्य प्रेमियों का उत्साह
तेज बारिश के बावजूद बड़ी संख्या में साहित्यकार, पत्रकार, विद्यार्थी, रंगकर्मी और साहित्यप्रेमी कार्यक्रम में उपस्थित रहे। आयोजकों ने कहा कि यह उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि साहित्य के प्रति समाज की आस्था आज भी जीवित है।
धन्यवाद ज्ञापन
कार्यक्रम में पद्माकर व्यास, डॉ. विनय मिश्रा, परमजीत पंडित, सुरेश अग्रवाल, तरुण वर्मा, रवि जयसवारा, त्रिनेत्रकांत त्रिपाठी, इतु शर्मा सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
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