क्या हमें किसी नेहा की मौत का इंतजार है? लोकतंत्र और संवेदनहीनता पर बड़ा सवाल

जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल कर रही शोधार्थी नेहा बोरा की बिगड़ती हालत के बहाने लोकतंत्र, नागरिक प्रतिरोध, सत्ता की जवाबदेही और समाज की संवेदनशीलता पर एक गहन विचार ....

Jul 17, 2026 - 14:14
Jul 17, 2026 - 14:33
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क्या हमें किसी नेहा की मौत का इंतजार है? लोकतंत्र और संवेदनहीनता पर बड़ा सवाल
नेहा बोरा कभी भी मर सकती हैं. कोमा में जा सकती हैं. - डॉ. अंजलि छाबड़िया

जब लोकतंत्र अपने सबसे शांत नागरिकों की आवाज़ भी नहीं सुनता

किसी लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान उसकी संसद नहीं होती। उसकी सबसे बड़ी पहचान यह होती है कि वह अपने सबसे कमजोर, सबसे शांत और सबसे अहिंसक नागरिक की आवाज कितनी जल्दी सुनता है। जब किसी देश में एक 26 वर्ष की शोधार्थी अपनी किताबें छोड़कर सड़क पर बैठ जाती है, भोजन छोड़ देती है, अपने शरीर को दाँव पर लगा देती है और फिर भी सत्ता के कानों तक उसकी आवाज नहीं पहुँचती, तब प्रश्न केवल उस लड़की का नहीं रह जाता। प्रश्न पूरे लोकतंत्र का हो जाता है। जंतर-मंतर पर बैठी शोधार्थी नेहा बोरा उन्हीं प्रश्नों का चेहरा बन चुकी हैं। उपलब्ध रिपोर्टें के अनुसार पिछले 19 दिनों से नेहा बोरा केवल पानी के सहारे भूख हड़ताल पर हैं। उनके स्वास्थ्य को लेकर चिकित्सकीय चिंताएँ भी सामने आई हैं। यदि स्थिति वास्तव में इतनी गंभीर है, तो यह केवल एक चिकित्सकीय आपातस्थिति नहीं, बल्कि एक नैतिक और लोकतांत्रिक चेतावनी भी है। यह प्रश्न अब किसी राजनीतिक दल का नहीं है। यह प्रश्न इंसानियत का है।

भूख हड़ताल शरीर पर नहीं, सत्ता के विवेक पर प्रहार होती है

भूख हड़ताल आत्महत्या नहीं होती। यह हिंसा भी नहीं होती। यह लोकतंत्र में उपलब्ध सबसे शांतिपूर्ण प्रतिरोध का माध्यम है। जब किसी नागरिक के पास बोलने, लिखने, ज्ञापन देने, प्रदर्शन करने और संवाद के सारे रास्ते निष्प्रभावी लगने लगते हैं, तब वह अपने शरीर को ही प्रतिरोध का माध्यम बना देता है। वह किसी और को नहीं मारता। वह स्वयं कष्ट सहता है। इतिहास गवाह है कि महात्मा गांधी ने भी उपवास को नैतिक दबाव का माध्यम बनाया था। उसका उद्देश्य किसी को पराजित करना नहीं, बल्कि समाज और सत्ता के अंतःकरण को जगाना था। लेकिन यदि एक लोकतंत्र का अंतःकरण ही सो जाए, तब क्या होगा?

एक लड़की, जिसकी जगह प्रयोगशाला या पुस्तकालय होना चाहिए था

नेहा एक शोधार्थी हैं। एक पीएचडी छात्रा। जिस उम्र में अधिकांश युवा अपने भविष्य की योजनाएँ बना रहे होते हैं, करियर और शोध में लगे होते हैं, उस उम्र में यदि कोई छात्रा अपने शरीर को दाँव पर लगाने का निर्णय लेती है, तो हमें यह पूछना चाहिए- आख़िर ऐसा क्यों हुआ? किस परिस्थिति ने उसे यह रास्ता चुनने पर मजबूर किया? कोई भी समझदार व्यक्ति भूखा रहना नहीं चाहता। भूख किसी का सपना नहीं होती। भूख हमेशा मजबूरी होती है। और यदि वह मजबूरी विचारों से जन्मी हो, तो वह समाज के लिए चेतावनी होती है।

सवाल केवल नेहा का नहीं

जंतर-मंतर पर यदि अनेक लोग भूख हड़ताल पर बैठे हैं, तो इसका अर्थ है कि यह किसी एक व्यक्ति की निजी समस्या नहीं है। यह एक सामूहिक असंतोष का संकेत है। लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं होती। बल्कि असहमति ही लोकतंत्र को जीवित रखती है। यदि असहमति को केवल अनदेखा कर दिया जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे संवाद खो देता है।

सत्ता की सबसे बड़ी ताकत सुनने की क्षमता होती है

हर आंदोलन सही हो, यह आवश्यक नहीं। हर माँग स्वीकार हो, यह भी आवश्यक नहीं। लेकिन हर नागरिक को सुना जाना चाहिए। यही लोकतंत्र है। यदि सरकार किसी माँग से सहमत नहीं है, तो उसे तर्क देने चाहिए। संवाद करना चाहिए। प्रतिनिधि भेजने चाहिए। समाधान खोजने चाहिए। चुप्पी किसी लोकतांत्रिक सरकार का उत्तर नहीं हो सकती।

समाज भी दोषमुक्त नहीं है

हम हर दिन सोशल मीडिया पर सैकड़ों वीडियो देखते हैं। कुछ सेकंड रुकते हैं। एक टिप्पणी करते हैं। फिर अगले वीडियो पर चले जाते हैं। लेकिन एक लड़की लगातार भूखी बैठी है। क्या हमने एक बार भी सोचा कि वह किस मानसिक और शारीरिक पीड़ा से गुजर रही होगी? क्या हम इतने असंवेदनशील हो चुके हैं कि किसी की जान पर बन आए, तब भी हम केवल 'ट्रेंड' देखते रहें?

विश्वविद्यालय केवल डिग्री नहीं देते

विश्वविद्यालय सोचने की क्षमता देते हैं। वहीं से प्रश्न पूछने की संस्कृति जन्म लेती है। यदि विश्वविद्यालयों से निकले युवा समाज के प्रश्नों पर आवाज उठाते हैं, तो यह लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति है। युवाओं को केवल नौकरी की मशीन समझ लेना भी एक भूल है। वे नागरिक भी हैं। उन्हें देश की दिशा पर बोलने का अधिकार है।

क्या हम केवल शहीदों का सम्मान करते हैं?

हम इतिहास में उन लोगों का सम्मान करते हैं जिन्होंने अपने सिद्धांतों के लिए बलिदान दिया। लेकिन वर्तमान में किसी के संघर्ष को अकसर अनदेखा कर देते हैं। क्यों? क्या किसी व्यक्ति की पीड़ा तभी महत्वपूर्ण होती है जब वह इतिहास बन जाए? क्या हमें पहले किसी की मृत्यु चाहिए, तब हम उसकी तस्वीर पर फूल चढ़ाएँ?

लोकतंत्र की परीक्षा चुनाव नहीं, करुणा है

लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं है। लोकतंत्र यह भी है कि सरकार अपने आलोचकों के साथ कैसा व्यवहार करती है। यह भी कि नागरिक असहमति जताने वालों को देशद्रोही मानते हैं या संवाद का हिस्सा। यह भी कि मीडिया सत्ता और जनता के बीच पुल बनता है या केवल शोर का माध्यम।

मीडिया का भी आत्ममंथन आवश्यक

यदि कोई छात्रा 19 दिनों से भूख हड़ताल पर है और उसकी स्थिति लगातार बिगड़ रही है, तो यह केवल एक समाचार नहीं, सार्वजनिक महत्व का विषय है। मीडिया का दायित्व केवल सनसनी नहीं, संदर्भ देना भी है। तथ्यों की पुष्टि करना भी है। विभिन्न पक्षों को सामने लाना भी है। और सबसे महत्वपूर्ण मानवीय गरिमा का सम्मान करना भी।

असहमति लोकतंत्र की ऑक्सीजन है

जो राष्ट्र अपने असहमत नागरिकों को सुनना बंद कर देता है, वह धीरे-धीरे संवाद की जगह अविश्वास को जन्म देता है। संविधान ने हमें अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण विरोध और नागरिक भागीदारी का अधिकार इसलिए दिया है कि समस्याएँ हिंसा से नहीं, संवाद से हल हों। यदि अहिंसक प्रतिरोध भी अनसुना रह जाए, तो यह चिंता का विषय है।

आज आवश्यकता किसकी है?

यदि नेहा बोरा और अन्य प्रदर्शनकारियों का स्वास्थ्य वास्तव में गंभीर स्थिति में है, तो सबसे पहले उनकी सुरक्षा और चिकित्सकीय देखभाल सुनिश्चित होना चाहिए। साथ ही, संबंधित पक्षों के बीच तत्काल संवाद की पहल होनी चाहिए। लोकतंत्र का उद्देश्य किसी पक्ष की जीत नहीं, बल्कि समाधान तक पहुँचना है।

अंत में...

यह संपादकीय किसी एक व्यक्ति का महिमामंडन नहीं है। यह किसी दल के समर्थन या विरोध का लेख भी नहीं है। यह केवल इतना पूछता है-  क्या हम अपने समय के उन नागरिकों को सुन रहे हैं जो हिंसा नहीं, बल्कि अपने शरीर की पीड़ा के माध्यम से हमें जगाना चाहते हैं?

यदि किसी दिन हमें यह सुनना पड़े कि एक युवा शोधार्थी की जान चली गई, तो उसके बाद होने वाली श्रद्धांजलियाँ शायद उस संवाद की जगह नहीं ले पाएँगी, जो समय रहते किया जा सकता था। लोकतंत्र की असली जीत तब होगी, जब किसी नागरिक को अपनी बात सुनाने के लिए अपने प्राणों को दाँव पर न लगाना पड़े। क्योंकि एक स्वस्थ लोकतंत्र में सबसे ऊँची आवाज वह नहीं होती जो सबसे ज़्यादा शोर मचाती है, बल्कि वह होती है जिसे सबसे पहले सुना जाता है, विशेषकर तब जब वह कमजोर, शांत और अहिंसक हो।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I