क्या भारत का लोकतंत्र जवाबदेही खो रहा है? | भरत तिवारी विमर्श पर विशेष संपादकीय

क्या लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित रह गया है? भरत तिवारी विमर्श के बहाने चुनावी वादों, जवाबदेही, संविधान, नागरिक अधिकार और भारतीय राजनीति का गहन विश्लेषण।

Jul 8, 2026 - 09:02
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क्या भारत का लोकतंत्र जवाबदेही खो रहा है? | भरत तिवारी विमर्श पर विशेष संपादकीय
क्या भारत का लोकतंत्र जवाबदेही खो रहा है?

आज का भारत केवल आर्थिक विकास, डिजिटल क्रांति और वैश्विक प्रतिष्ठा की चर्चा तक सीमित नहीं है; यह लोकतंत्र की गुणवत्ता, राजनीतिक जवाबदेही और नागरिक अधिकारों की कसौटी पर भी लगातार परखा जा रहा है। ऐसे समय में जब किसी घटना के बाद सोशल मीडिया से लेकर जमीनी स्तर पर भावनाएँ तीव्र होती जा रही है, तब सबसे बड़ी आवश्यकता तथ्यों, संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर विमर्श करने की होती है। हाल में बिहार के भोजपुर जिला के बिलौटी में बिहार पुलिस द्वारा भरत तिवारी की हत्या कर दी गई। आज उन्हें एक क्रांतिकारी, व्यवस्था परिवर्तन का प्रतीक और लोकतांत्रिक जवाबदेही की माँग उठाने वाले व्यक्ति के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही आज देश की जनता राजनीतिक नेतृत्व, जातीय राजनीति, भ्रष्टाचार, पुलिस व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर गंभीर प्रश्न उठा रही है। इन दावों से सहमत या असहमत होने से पहले आवश्यक है कि हम उस मूल प्रश्न पर विचार करें, जो इस पूरे विमर्श के केंद्र में दिखाई देता है- क्या भारतीय लोकतंत्र में जनता द्वारा किए गए प्रश्नों का उत्तर देने की संस्कृति कमजोर होती जा रही है?

लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं, जवाबदेही भी है

लोकतंत्र का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि मतदान कर देना ही नागरिक का अंतिम कर्तव्य है। वास्तव में मतदान लोकतंत्र की शुरुआत है, अंत नहीं।

कोई भी राजनीतिक दल चुनाव के समय घोषणापत्र जारी करता है। उम्मीदवार अनेक वादे करते हैं। जनता उन वादों पर विश्वास करके सत्ता सौंपती है। लेकिन चुनाव समाप्त होते ही अधिकांश वादे राजनीतिक भाषणों के संग्रहालय में रख दिए जाते हैं।

यही वह प्रश्न है जिसे इस संवाद में सबसे प्रमुख रूप से उठाया गया है- जो कहा गया, क्या उसे पूरा किया गया?

यदि नागरिक अपने प्रतिनिधियों से पाँच वर्ष बाद यह भी न पूछ सके कि आपने क्या किया, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे प्रतिनिधिक शासन से राजनीतिक एकाधिकार में बदलने लगता है।

क्या लोकतंत्र में प्रश्न पूछना अपराध है?

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। प्रश्न पूछना लोकतंत्र का अपराध नहीं, बल्कि उसका प्राण है। इतिहास गवाह है- सत्ता हमेशा प्रश्नों से असहज रही है। लेकिन समाज हमेशा प्रश्न पूछने वालों के कारण आगे बढ़ा है। कबीर ने प्रश्न पूछा। महात्मा गांधी ने प्रश्न पूछा। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने प्रश्न पूछा। जयप्रकाश नारायण ने प्रश्न पूछा। किसी भी लोकतंत्र में सरकार से प्रश्न करना सरकार विरोध नहीं होता; बल्कि लोकतंत्र के प्रति निष्ठा का प्रमाण होता है।

व्यक्ति नहीं, विचार महत्वपूर्ण हैं

किसी भी सार्वजनिक घटना में सबसे बड़ा खतरा व्यक्तिपूजा है। जब कोई व्यक्ति किसी आंदोलन का चेहरा बन जाता है तो समाज उसके विचारों की जगह उसके व्यक्तित्व की पूजा करने लगता है। इतिहास बताता है-

विचार अमर होते हैं। व्यक्ति नहीं। यदि कोई व्यक्ति लोकतांत्रिक जवाबदेही, पारदर्शिता और समानता की बात करता है, तो उन विचारों पर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन यदि किसी व्यक्ति के जीवन, मृत्यु या उससे जुड़ी घटनाओं के संबंध में तथ्य विवादित हों, तो बिना स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच के निष्कर्ष निकालना लोकतांत्रिक मर्यादा के अनुरूप नहीं होगा।

जाति की राजनीति बनाम नागरिक की राजनीति

संवाद में सबसे महत्वपूर्ण विचारों में एक यह है कि समाज को जातियों में बाँटकर राजनीति करने की प्रवृत्ति लोकतंत्र को कमजोर करती है। यह विचार नया नहीं है। भारतीय संविधान भी नागरिक को केवल नागरिक मानता है। मतदाता की पहचान उसकी जाति नहीं, उसकी नागरिकता है। दुर्भाग्य से चुनावों में आज भी जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा अकसर विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य से अधिक प्रभावशाली मुद्दे बन जाते हैं। यदि मतदाता जाति से ऊपर उठकर केवल कार्य और नीति के आधार पर मतदान करे, तो राजनीति का चरित्र स्वतः बदल सकता है।

लोकतंत्र का सबसे कमजोर पक्ष- भूलने वाली जनता

भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी शक्ति जनता है। और सबसे बड़ी कमजोरी भी जनता ही बन जाती है। क्यों?

क्योंकि जनता चुनाव के समय पिछले वादे भूल जाती है। कोई भी राजनीतिक दल यदि पिछले पाँच वर्षों का सामाजिक लेखा-जोखा देने को बाध्य हो जाए, तो लोकतंत्र कहीं अधिक उत्तरदायी बन सकता है। विकसित लोकतंत्रों में राजनीतिक रिपोर्ट कार्ड सामान्य बात है। भारत में अभी भी चुनावी विमर्श भावनाओं और नारों पर अधिक आधारित दिखाई देता है।

क्या नई राजनीति की आवश्यकता है?

‘नई राजनीति’ का अर्थ नया दल नहीं होता। नई राजनीति का अर्थ है- पारदर्शिता, जवाबदेही, संवैधानिकता, नागरिक सहभागिता, सार्वजनिक संवाद यदि पुराने राजनीतिक दल भी इन सिद्धांतों को अपनाएँ, तो वही नई राजनीति बन सकते हैं। समस्या केवल दलों की नहीं, राजनीतिक संस्कृति की है।

पुलिस, कानून और नागरिक अधिकार

संवाद में पुलिस कार्रवाई और कथित मुठभेड़ को लेकर भी अनेक गंभीर आरोप लगाए गए हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे किसी भी आरोप की सत्यता का निर्धारण केवल निष्पक्ष जाँच, न्यायिक प्रक्रिया, साक्ष्यों और न्यायालयों के माध्यम से ही होना चाहिए। किसी भी व्यक्ति का जीवन और स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित है। इसी प्रकार पुलिस और राज्य के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की भी निष्पक्ष जाँच आवश्यक है। लोकतंत्र में न्याय प्रक्रिया का स्थान भीड़ या भावनाओं से ऊपर होता है।

भ्रष्टाचार केवल आर्थिक समस्या नहीं

संवाद में भ्रष्टाचार को जन्म से मृत्यु तक नागरिक के जीवन से जोड़कर देखा गया है। यह अतिशयोक्ति हो सकती है, लेकिन संदेश महत्वपूर्ण है। भ्रष्टाचार केवल रिश्वत नहीं है। भ्रष्टाचार है- अवसरों की असमानता, व्यवस्था की अपारदर्शिता, जवाबदेही का अभाव, संस्थाओं का राजनीतिक दुरुपयोग। जब नागरिक व्यवस्था पर विश्वास खो देता है, तब लोकतंत्र का नैतिक आधार कमजोर होने लगता है।

युवाओं के लिए सबसे बड़ा संदेश

आज भारत विश्व का सबसे युवा देश है। लेकिन प्रश्न यह है- क्या युवाओं की ऊर्जा केवल सोशल मीडिया तक सीमित हो रही है? या वह लोकतांत्रिक भागीदारी में भी दिखाई दे रही है? युवाओं को चाहिए-  पंचायत बैठकों में जाएँ। नगर निकायों की कार्यवाही समझें। आरटीआई का प्रयोग करें। जनसुनवाई में भाग लें। स्थानीय बजट पढ़ें। प्रतिनिधियों से प्रश्न करें। शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से अपनी बात रखें। यही लोकतंत्र को मजबूत करने का मार्ग है।

क्रांति का अर्थ क्या है?

क्रांति केवल हथियार नहीं। क्रांति विचार भी होती है। क्रांति मतदान भी है। क्रांति सूचना का अधिकार भी है। क्रांति जनहित याचिका भी है। क्रांति संविधान पढ़ना भी है। यदि नागरिक संविधान के भीतर रहकर व्यवस्था सुधार की दिशा में कार्य करता है, तो वही लोकतांत्रिक परिवर्तन की सबसे मजबूत नींव है।

सबसे बड़ी श्रद्धांजलि क्या हो सकती है?

किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति या आंदोलन के प्रति वास्तविक सम्मान केवल भावनात्मक नारों से नहीं होता। यदि किसी व्यक्ति ने लोकतांत्रिक जवाबदेही, जनहित या व्यवस्था सुधार का प्रश्न उठाया हो, तो उसकी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी- तथ्यों पर आधारित सार्वजनिक बहस, लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान, हिंसा से दूरी, संविधानसम्मत संघर्ष और नागरिक जिम्मेदारी।

निष्कर्ष

भारत का लोकतंत्र अभी भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक प्रयोगों में से एक है। उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसकी जनता है। लेकिन जनता तभी शक्तिशाली होगी जब वह प्रश्न पूछेगी। उत्तर माँगेगी। वादों का हिसाब लेगी। जाति से ऊपर उठकर नीति को देखेगी। और संविधान को अपना सर्वोच्च राजनीतिक दस्तावेज़ मानेगी। किसी भी घटना, व्यक्ति या आंदोलन के बारे में अंतिम निष्कर्ष तथ्यों और निष्पक्ष जाँच के आधार पर ही बनने चाहिए। परंतु यदि इस पूरे विमर्श से एक स्थायी संदेश लिया जाए, तो वह यही है कि लोकतंत्र केवल सत्ता बदलने का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता को निरंतर जवाबदेह बनाए रखने की व्यवस्था है। जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझेगा, जब चुनाव केवल भावनाओं का नहीं बल्कि कार्यों का मूल्यांकन बनेंगे, और जब हर प्रतिनिधि से पूछा जाएगा- ‘जो वादा किया था, उसका क्या हुआ? तभी लोकतंत्र अपनी वास्तविक परिपक्वता की ओर बढ़ेगा। यही प्रश्न भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की सबसे बड़ी कसौटी भी है और सबसे बड़ी आशा भी।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I