लोकतंत्र पर बाबूराज का साया

भारतीय नौकरशाही, आईएएस-आईपीएस व्यवस्था, राजनीतिक गठजोड़, विशेषज्ञता के अभाव और प्रशासनिक सुधारों पर आधारित विस्तृत संपादकीय।

Jun 24, 2026 - 04:48
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लोकतंत्र पर बाबूराज का साया
लोकतंत्र पर बाबूराज का साया

क्या आईएएस-आईपीएस व्यवस्था पुनर्विचार की माँग करती है?

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इस लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता की संप्रभुता और निर्वाचित सरकारें मानी जाती हैं। लेकिन क्या वास्तव में सत्ता जनता के प्रतिनिधियों के हाथ में है? या फिर देश का वास्तविक नियंत्रण एक ऐसे प्रशासनिक ढांचे के हाथों में केंद्रित हो गया है जिसकी जड़ें औपनिवेशिक शासन में हैं? आज यह प्रश्न पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) को लंबे समय तक राष्ट्र निर्माण के स्तंभों के रूप में देखा गया। इन सेवाओं के अधिकारियों ने देश के प्रशासन, कानून-व्यवस्था और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन समय के साथ इन संस्थाओं के भीतर विकसित हुई शक्ति-संरचना, विशेषाधिकार और जवाबदेही की कमी ने गंभीर चिंताएं पैदा की हैं।

औपनिवेशिक विरासत की छाया

भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की जड़ें ब्रिटिश शासन की इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस) में हैं। उस समय जिला कलेक्टर का मुख्य कार्य जनता की सेवा नहीं बल्कि राजस्व वसूली और साम्राज्य की सुरक्षा था। पुलिस व्यवस्था का उद्देश्य नागरिक अधिकारों की रक्षा नहीं बल्कि विद्रोह को दबाना था। स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माताओं ने इस प्रशासनिक ढांचे को पूरी तरह समाप्त नहीं किया। उन्होंने इसे राष्ट्र निर्माण के लिए उपयोगी मानते हुए नए रूप में स्वीकार किया। प्रारंभिक दशकों में कई अधिकारी अत्यंत ईमानदार, विद्वान और समर्पित थे। उन्होंने संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखी। लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलती गईं।

सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण

आज एक जिला अधिकारी या पुलिस अधीक्षक के पास व्यापक प्रशासनिक अधिकार होते हैं। भूमि, कानून-व्यवस्था, विकास योजनाएं, लाइसेंस, राजस्व, खनन, उद्योग, स्थानीय प्रशासन सभी क्षेत्रों में नौकरशाही की निर्णायक भूमिका बनी हुई है। समस्या अधिकारों के अस्तित्व में नहीं बल्कि उनके केंद्रीकरण में है। जब निर्णय लेने की शक्ति सीमित समूह के हाथों में केंद्रित हो जाती है और जवाबदेही कमजोर हो जाती है, तब भ्रष्टाचार, मनमानी और अहंकार की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। लोकतंत्र में शक्ति का विकेंद्रीकरण आवश्यक माना जाता है, लेकिन भारतीय प्रशासनिक ढांचा कई बार इसके विपरीत दिखाई देता है।

राजनीतिक-ब्यूरोक्रेटिक गठजोड़

1970 के दशक के बाद राजनीति और नौकरशाही के बीच एक नया संबंध विकसित हुआ। राजनीतिक नेतृत्व को वफादार प्रशासन चाहिए था और अधिकारियों को स्थिर शक्ति-संरचना। इस गठजोड़ का परिणाम यह हुआ कि कई स्थानों पर प्रशासनिक निष्पक्षता प्रभावित हुई। स्थानांतरण, पदस्थापन और पदोन्नति राजनीतिक समीकरणों से जुड़ने लगी। नौकरशाही का एक वर्ग सत्ता के साथ सामंजस्य स्थापित करने में अधिक रुचि लेने लगा, जबकि राजनीतिक नेतृत्व भी प्रशासनिक तंत्र पर अत्यधिक निर्भर होता गया। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए स्वस्थ नहीं मानी जा सकती।

विशेषज्ञता बनाम सामान्य प्रशासन

एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या एक सामान्य प्रशासनिक अधिकारी हर क्षेत्र का विशेषज्ञ हो सकता है? कृषि, स्वास्थ्य, रक्षा, ऊर्जा, डिजिटल तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अंतरराष्ट्रीय संबंध, आतंकवाद-रोधी रणनीति, पर्यावरण, साइबर सुरक्षा ये सभी अत्यधिक विशेषज्ञता वाले क्षेत्र हैं। फिर भी भारत में अकसर सामान्य प्रशासनिक पृष्ठभूमि वाले अधिकारियों को इन जटिल विभागों का नेतृत्व सौंप दिया जाता है। विश्व के अनेक देशों में नीति निर्माण में विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों और पेशेवरों की बड़ी भूमिका होती है। भारत में भी लेटरल एंट्री जैसे प्रयास इसी आवश्यकता को ध्यान में रखकर शुरू किए गए। हालांकि इन प्रयासों को संस्थागत रूप से पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका।

जवाबदेही का संकट

लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी संस्था की शक्ति जितनी अधिक हो, उसकी जवाबदेही भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। लेकिन भारतीय नौकरशाही के संदर्भ में कई बार यह आरोप लगाया जाता है कि अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई करना अत्यंत कठिन है। विभागीय जांच वर्षों तक चलती रहती है। निलंबन के बाद पुनः बहाली के अनेक उदाहरण सामने आते रहे हैं। यदि भ्रष्टाचार या दुरुपयोग के मामलों में दंड की संभावना कम हो, तो संस्थागत सुधार भी कठिन हो जाते हैं। जवाबदेही की व्यवस्था केवल राजनीतिक नेतृत्व पर ही लागू नहीं होनी चाहिए; प्रशासनिक नेतृत्व पर भी समान रूप से लागू होनी चाहिए।

पुलिस व्यवस्था की चुनौतियां

पुलिस व्यवस्था को लेकर आम नागरिकों में भय, दूरी और अविश्वास की भावना अभी भी दिखाई देती है। कई मामलों में पुलिस पर राजनीतिक दबाव, झूठे मुकदमे, अनावश्यक शक्ति प्रयोग या पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि हजारों ईमानदार और समर्पित पुलिस अधिकारी भी देश की सेवा कर रहे हैं, लेकिन संस्थागत सुधारों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। पुलिस सुधारों पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं, लेकिन उनका पूर्ण क्रियान्वयन आज भी चुनौती बना हुआ है।

परीक्षा प्रणाली पर भी प्रश्न

संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में गिनी जाती है। लेकिन समय-समय पर इस परीक्षा की प्रकृति को लेकर भी बहस होती रही है। क्या वर्तमान परीक्षा वास्तव में नेतृत्व क्षमता, निर्णय क्षमता, नैतिकता, संवाद कौशल, टीम वर्क और विशेषज्ञता का मूल्यांकन करती है? या फिर यह अत्यधिक सूचना-आधारित और रटंत प्रणाली की ओर झुक गई है? यदि प्रशासन को 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना करना है तो चयन प्रक्रिया में भी नए मानदंडों पर विचार करना होगा।

सुधारों की दिशा क्या हो?

सुधार का अर्थ संस्थाओं को कमजोर करना नहीं होता। भारत को सक्षम, ईमानदार और पेशेवर सिविल सेवाओं की आवश्यकता है। लेकिन इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदमों पर विचार किया जा सकता है- विशेषज्ञों की भागीदारी बढ़ाई जाए। लेटरल एंट्री को संस्थागत स्वरूप दिया जाए। अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन प्रणाली विकसित की जाए। पुलिस सुधारों को लागू किया जाए। स्थानीय निकायों और राज्यों को अधिक अधिकार दिए जाएं। नागरिक सेवाओं में तकनीकी पारदर्शिता बढ़ाई जाए। प्रशिक्षण में लोकतांत्रिक संवेदनशीलता और जनसंपर्क को महत्व दिया जाए।

निष्कर्ष

भारतीय नौकरशाही ने राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अनेक ईमानदार और उत्कृष्ट अधिकारी आज भी देश की सेवा कर रहे हैं। लेकिन संस्थाओं का मूल्यांकन व्यक्तियों के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी संरचना और कार्यप्रणाली के आधार पर किया जाता है। यदि किसी व्यवस्था में शक्ति अधिक और जवाबदेही कम हो जाए तो सुधार की आवश्यकता स्वाभाविक है। भारत 21वीं सदी का राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है। ऐसे समय में प्रशासनिक ढांचे को भी नई आवश्यकताओं के अनुरूप ढालना होगा। लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास होती है और प्रशासन का उद्देश्य जनता की सेवा है, शासन करना नहीं। बाबूराज से लोकराज की यात्रा ही वास्तविक प्रशासनिक सुधार का मार्ग हो सकती है।

 

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I