सीता का पुनराख्यान: पितृसत्तात्मक इतिहास-बोध और नारी चेतना

प्रो. नंदिनी साहू की कृति ‘सीता’ का नव-इतिहासवादी एवं स्त्रीवादी दृष्टि से विश्लेषण, जिसमें पितृसत्ता, स्त्री स्वायत्तता और मिथक के पुनर्पाठ का गंभीर विमर्श प्रस्तुत है।

Jul 8, 2026 - 22:00
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सीता का पुनराख्यान: पितृसत्तात्मक इतिहास-बोध और नारी चेतना
प्रो. नंदिनी साहू की कृति ‘सीता’ की समीक्षा

सीता का पुनराख्यान: पितृसत्तात्मक इतिहास-बोध और नारी चेतना का नव-इतिहासवादी विमर्श

हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल की कुलपति प्रोफेसर नंदिनी साहू द्वारा रचित कविता सीता लंबी कथा-शैली में लिखी गई एक महत्वपूर्ण कृति है। कवयित्री-विचारक के रूप में उनके भीतर लंबे समय से एक ऐसी उत्कृष्ट कृति आकार ले रही थी, जो भारतीय महाकाव्य परंपरा को एक नई दृष्टि से देखने का अवसर प्रदान करे। जब उन्हें विश्वास हो गया कि उनके विचारों को पूर्ण अभिव्यक्ति मिल चुकी है, तब यह कृति सामने आई।

सीता किसी भी रूप में रामायण का पुनर्कथन नहीं है, बल्कि महाकाव्य की नायिका सीता के काव्यात्मक संस्मरण के रूप में प्रथम-पुरुष (First-person) आख्यान में लिखी गई रचना है। यह नंदिनी साहू के व्यक्तिगत वैचारिक विश्वासों तथा उनके गतिशील चिंतन का सहज और स्वाभाविक परिणाम है।

प्रोफेसर नंदिनी साहू की कृति सीता तथा इस समीक्षा का मूल भाव पौराणिक आख्यानों का विखंडन और स्त्री स्वायत्तता (Autonomy) की खोज है। इसके प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं-

परंपरागत छवि को चुनौती

पारंपरिक रूप से सीता को आज्ञाकारिता, पवित्रता और मूक त्याग के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। यह रचना इस स्थापित छवि को चुनौती देती है और स्पष्ट करती है कि सीता की पहचान स्वयं उनके द्वारा नहीं, बल्कि पुरुष-प्रधान समाज, राम तथा राजनीतिक सत्ता द्वारा निर्मित की गई थी। जैसा कि सीता स्वयं कहती हैं-

मेरा जीवन एक ऐसा ग्रंथ बन गया, जिसकी व्याख्या दूसरों ने की।

नैतिक परीक्षाओं का लैंगिक स्वरूप

समाज में नैतिक नियम स्त्री और पुरुष के लिए समान नहीं रहे हैं। जहाँ पुरुषों के अधिकार और सम्मान को सहज रूप से वैध ठहराया जाता है, वहीं स्त्रियों से निरंतर सहनशीलता, त्याग और मौन की अपेक्षा की जाती है। इस दृष्टि से अग्नि-परीक्षा न्याय की कसौटी नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक निगरानी और नियंत्रण का एक माध्यम बनकर सामने आती है।

मौन का पुनर्गठन

इस कविता में मौन केवल आत्मसमर्पण या कमजोरी का प्रतीक नहीं है। यहाँ मौन को आंतरिक शक्ति, सहनशीलता और नैतिक प्रतिरोध के सशक्त रूप में प्रस्तुत किया गया है।

पर्यावरण-नारीवाद (Eco-Feminism)

कविता का एक महत्वपूर्ण आधार सीता का प्रकृति और धरती के साथ गहरा संबंध है। अयोध्या की कठोर सामाजिक व्यवस्था के विपरीत प्रकृति एक ऐसे संसार का निर्माण करती है जहाँ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है। वहाँ सीता को सहज स्वीकृति, संरक्षण और आत्मीयता प्राप्त होती है।

महिमामंडन की राजनीति का विरोध

पौराणिक ग्रंथों में महिलाओं के कष्टों और बलिदानों का जो अत्यधिक महिमामंडन किया गया है, यह रचना उसके पीछे छिपी सत्ता-राजनीति को उजागर करती है। यह महिमामंडन स्त्री को एक जीवित मनुष्य के बजाय मात्र एक प्रतीक में बदल देता है, जिससे उसकी स्वायत्तता और व्यक्तित्व दोनों प्रभावित होते हैं।

रचना का साहित्यिक एवं सामाजिक उद्देश्य

इस लंबी कविता तथा इसके आलोचनात्मक विश्लेषण का उद्देश्य व्यापक, वैचारिक और परिवर्तनकारी है।

इतिहास की चयनात्मकता को उजागर करना

इसका प्रमुख उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि इतिहास और महाकाव्य पूर्णतः निष्पक्ष नहीं होते, बल्कि वे पितृसत्तात्मक सत्ता, राजकीय संरक्षण और धार्मिक संस्थाओं के प्रभाव में निर्मित होते हैं। यह पुरुष-लिखित इतिहास को चुनौती देता है, जिसने स्त्रियों की स्वायत्तता के लिए सीमित स्थान छोड़ा।

दबे हुए ज्ञान (Subjugated Knowledge) का पुनर्जीवन

मिशेल फूको के दबा हुआ ज्ञान (Subjugated Knowledge) के सिद्धांत के अनुसार इतिहास के प्रमुख संस्करणों ने जिन आवाज़ों, पीड़ाओं और प्रश्नों को हाशिए पर धकेल दिया, उन्हें सीता के प्रथम-पुरुष आख्यान के माध्यम से पुनः सामने लाना इस कृति का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

मिथक का गत्यात्मक पुनर्मूल्यांकन

यह रचना मिथकों को स्थिर अथवा अपरिवर्तनीय पवित्र ग्रंथ मानने के बजाय उन्हें एक गतिशील, बहस योग्य और जीवंत सांस्कृतिक स्मृति के रूप में प्रस्तुत करती है। यह पाठकों को सोचने के लिए प्रेरित करती है कि सदियों पुरानी व्याख्याएँ वास्तव में किन हितों की पूर्ति करती रही हैं।

समकालीन स्त्री-विमर्श से संवाद

यद्यपि यह कृति पौराणिक पात्र सीता पर आधारित है, फिर भी इसका उद्देश्य समकालीन समाज में हाशिए पर स्थित महिलाओं की पहचान, स्वायत्तता और संघर्षों को सामने लाना है। यह स्थापित करती है कि सीता की पीड़ा और उनका संघर्ष किसी एक युग तक सीमित नहीं, बल्कि प्रत्येक काल की स्त्रियों के अनुभवों से जुड़ा हुआ है।

सौंदर्यबोध के बजाय वैचारिक जागृति

कविता का उद्देश्य केवल काव्यात्मक आनंद प्रदान करना नहीं है, बल्कि ऐसे सजग और आलोचनात्मक पाठक का निर्माण करना है, जो पौराणिक आख्यानों को आँख मूँदकर स्वीकार करने के बजाय उन पर तार्किक, ऐतिहासिक और वैचारिक प्रश्न उठा सके।

निष्कर्ष

संक्षेप में कहा जाए तो यह आलोचनात्मक विमर्श स्पष्ट करता है कि यह कृति केवल रामायण का रचनात्मक पुनर्कथन नहीं, बल्कि एक अत्यंत साहसिक संशोधनवादी हस्तक्षेप है। इसका मूल स्वर स्त्री चेतना के उभार, पितृसत्तात्मक मानदंडों के विखंडन और स्त्री-अस्तित्व की पुनर्स्थापना में निहित है। यह इतिहास और साहित्य को अधिक समतामूलक, समावेशी और न्यायपूर्ण दृष्टि से देखने का आग्रह करती है, ताकि भविष्य में परंपरा की यांत्रिक पुनरावृत्ति के स्थान पर संवाद, समानता और प्रगतिशील चिंतन के नए मार्ग प्रशस्त हो सकें। 

समीक्षक: डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I