'सेवासदन' स्त्री की पराधीनता और स्वाधीनता के द्वंद्व का आख्यान : डॉ. संजय जायसवाल

रानी बिड़ला गर्ल्स कॉलेज, कोलकाता के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित विशेष व्याख्यान में विद्यासागर विश्वविद्यालय के डॉ. संजय कुमार जायसवाल ने 'सेवासदन' को हिंदी का पहला बड़ा यथार्थवादी उपन्यास बताते हुए नारी विमर्श और सामाजिक यथार्थ के संदर्भ में इसकी व्याख्या की।

Jun 29, 2026 - 23:03
Jun 29, 2026 - 23:04
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'सेवासदन' स्त्री की पराधीनता और स्वाधीनता के द्वंद्व का आख्यान : डॉ. संजय जायसवाल
डॉ. संजय जायसवाल का व्याख्यान

रानी बिड़ला गर्ल्स कॉलेज के हिंदी विभाग द्वारा 'सेवासदन का मूल्यांकन' विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन

कोलकाता, 29 जून। प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान रानी बिड़ला गर्ल्स कॉलेज, कोलकाता के हिंदी विभाग द्वारा 'सेवासदन का मूल्यांकन' विषय पर एक विशेष ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में विद्यासागर विश्वविद्यालय, मिदनापुर के हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार जायसवाल ने अपने विचार व्यक्त किए। अपने व्याख्यान में डॉ. संजय कुमार जायसवाल ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद का 'सेवासदन' हिंदी का पहला बड़ा यथार्थवादी उपन्यास है, जिसने न केवल तत्कालीन उपन्यास परंपरा को नई दिशा दी, बल्कि हिंदी साहित्य को तिलिस्मी और मनोरंजनप्रधान कथानकों से निकालकर सामाजिक यथार्थ और जनजीवन की समस्याओं से जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया। उन्होंने कहा कि 'सेवासदन' भारतीय समाज में व्याप्त सामाजिक विषमताओं, मध्यवर्गीय पाखंड, स्त्री की दयनीय स्थिति और नैतिक मूल्यों के विघटन का सशक्त दस्तावेज है। यह उपन्यास केवल साहित्यिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के स्तर पर भी एक युगांतरकारी कृति है।

नारी विमर्श की दृष्टि से 'सेवासदन' का विश्लेषण

डॉ. जायसवाल ने 'सेवासदन' का विश्लेषण विशेष रूप से नारी विमर्श के परिप्रेक्ष्य में करते हुए कहा कि यह उपन्यास स्त्री की पराधीनता और स्वाधीनता के बीच चल रहे अंतर्द्वंद्व का अत्यंत प्रभावशाली आख्यान प्रस्तुत करता है। प्रेमचंद ने स्त्री जीवन के उन प्रश्नों को केंद्र में रखा, जिन्हें उस समय समाज खुलकर स्वीकार करने को तैयार नहीं था।

उन्होंने विस्तार से बताया कि उपन्यास में वेश्यावृत्ति की सामाजिक समस्या, दहेज प्रथा, बेमेल विवाह, सामंती मानसिकता, समाज के दोहरे नैतिक मानदंड, धार्मिक पाखंड और स्त्री की गरिमा जैसे विषय अत्यंत संवेदनशीलता के साथ चित्रित किए गए हैं। साथ ही प्रेमचंद ने आदर्शवादी समाधान प्रस्तुत करते हुए सामाजिक सुधार की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि 'सेवासदन' आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि स्त्री की स्वतंत्रता, सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा के प्रश्न आज भी भारतीय समाज के सामने चुनौती बने हुए हैं।

विद्यार्थियों ने जाना 'सेवासदन' का सामाजिक और साहित्यिक महत्व

व्याख्यान के दौरान विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने प्रेमचंद के साहित्य, नारी विमर्श तथा हिंदी उपन्यास की विकास यात्रा से जुड़े अनेक प्रश्न पूछे, जिनका डॉ. जायसवाल ने विस्तारपूर्वक उत्तर दिया। कार्यक्रम ने विद्यार्थियों को 'सेवासदन' के साहित्यिक, सामाजिक और वैचारिक पक्षों को नई दृष्टि से समझने का अवसर प्रदान किया।

सफल आयोजन में विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका

कार्यक्रम को सफल बनाने में हिंदी विभाग की शिक्षिका डॉ. विजया सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कार्यक्रम का प्रभावी संचालन हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. मंटू दास ने किया, जबकि अंत में डॉ. पुष्पा तिवारी ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों एवं विद्यार्थियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। इस व्याख्यान ने प्रेमचंद के साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता तथा स्त्री विमर्श के संदर्भ में 'सेवासदन' की वैचारिक शक्ति को पुनः रेखांकित किया।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I