RTI कानून पर संकट: मुख्य सूचना आयुक्त से इस्तीफे की माँग
उत्तर प्रदेश में RTI उल्लंघनों पर दंडात्मक कार्रवाई में गिरावट को लेकर मुख्य सूचना आयुक्त से इस्तीफे की माँग। पारदर्शिता और जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल।
उत्तर प्रदेश में सूचना के अधिकार (RTI) कानून के क्रियान्वयन को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है। संजय कुमार वर्मा नामक नागरिक द्वारा मुख्य सूचना आयुक्त को भेजे गए एक पत्र में आयोग की कार्यप्रणाली पर सीधे सवाल खड़े किए हैं और नैतिक आधार पर इस्तीफे की माँग की गई है।
दंडात्मक कार्रवाई में आई गिरावट
पत्र में उल्लेख किया गया है कि कुछ वर्ष पूर्व तक सूचना आयोग द्वारा RTI उल्लंघन के मामलों में सख्त रुख अपनाया जाता था। लगभग 500 मामलों में दंड (जुर्माना) लगाए गए। इससे लोक सूचना अधिकारियों में जवाबदेही बनी रहती थी। लेकिन, वर्तमान स्थिति इसके बिलकुल विपरीत बताई जा रही है। अब कई मामलों में स्पष्ट उल्लंघन के बावजूद दंडात्मक कार्रवाई नहीं हो रही है। जहाँ जुर्माना अपेक्षित है, वहाँ भी आयोग मौन दिखाई दे रहा है।
राज्य सूचना आयोग में हिटलरशाही
आज उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग में बैठे मुख्य सूचना आयुक्त राजकुमार विश्वकर्मा हों या सूचना आयुक्त राकेश कुमार हों ये अपीलार्थी को ही अपने अवैधानिक कार्रवाईयों से परेशान करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इनकी हिटलरशाही अपने चरम पर है। एक प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक रहे हैं और दूसरे महाशय न्यायिक अधिकारी रहे हैं।
RTI की आत्मा पर खतरा?
RTI Act, 2005 का मूल उद्देश्य है: पारदर्शिता, जवाबदेही है। आज उत्तर प्रदेश में RTI Act अपनी अंतिम साँसें गिन रहा है।
नागरिकों को सूचना का अधिकार
लेकिन जब दंडात्मक प्रावधानों का उपयोग ही न हो, तो लोक सूचना अधिकारियों की जवाबदेही समाप्त हो सकती है। नागरिकों का कानून पर विश्वास कम हो सकता है। पारदर्शिता की पूरी व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है।
इस्तीफे की माँग क्यों?
संजय कुमार वर्मा ने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से कहा है कि वर्तमान स्थिति ‘अत्यंत चिंताजनक’ है। सूचना आयोग अपनी मूल भूमिका निभाने में कमजोर पड़ता दिख रहा है। ऐसे में मुख्य सूचना आयुक्त को नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए और इसी आधार पर उन्होंने इस्तीफे पर विचार करने का आग्रह किया है।
बड़ा सवाल: क्या RTI केवल कागज़ी कानून बनता जा रहा है?
यह मामला केवल एक व्यक्ति का पत्र नहीं, बल्कि एक व्यापक चिंता को दर्शाता है: क्या सूचना आयोग अपनी सख्ती खो चुका है? क्या दंडात्मक व्यवस्था निष्प्रभावी हो रही है? क्या RTI व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर की जा रही है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो RTI जैसे मजबूत लोकतांत्रिक उपकरण की प्रभावशीलता पर गंभीर असर पड़ेगा। यह मुद्दा अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक पारदर्शिता और जनता के अधिकारों का प्रश्न बन चुका है।
अब देखना होगा:
✔ क्या सूचना आयोग इस पर स्पष्टीकरण देगा?
✔ क्या दंडात्मक कार्रवाई को फिर से प्रभावी बनाया जाएगा?
✔ या यह माँग भी अन्य शिकायतों की तरह अनसुनी रह जाएगी?
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