शब्दभूमि द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों पर व्यापक विमर्श

‘हिंदी पत्रकारिता : द्विशताब्दी की यात्रा, चुनौतियाँ और भविष्य’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में डिजिटल मीडिया, ट्रोल संस्कृति, भाषा संकट, नैतिकता, स्त्री विमर्श और पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर देशभर के विद्वानों ने गंभीर विचार रखे।

May 26, 2026 - 09:02
May 26, 2026 - 09:56
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शब्दभूमि द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों पर व्यापक विमर्श
संगोष्ठी में उपस्थित विद्वान वक्तागण

कोलकाता, 24 मई 2026। शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा आयोजित राष्ट्रीय ऑनलाइन संगोष्ठी हिंदी पत्रकारिता : द्विशताब्दी की यात्रा, चुनौतियाँ और भविष्यमें देशभर के साहित्यकारों, शोधार्थियों, पत्रकारों, प्राध्यापकों और बुद्धिजीवियों ने हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों की ऐतिहासिक भूमिका, भाषा संकट, डिजिटल मीडिया, ट्रोल संस्कृति, सामाजिक सरोकार, स्त्री विमर्श, नैतिकता, जनजागरण और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर विचार व्यक्त किए। संगोष्ठी के दौरान डिजिटल ट्रोलिंग और ऑनलाइन व्यवधानों के बावजूद कार्यक्रम निर्बाध रूप से जारी रहा, जिसे प्रतिभागियों ने पत्रकारिता की लोकतांत्रिक चेतना और प्रतिरोध की शक्ति का प्रतीक बताया।

शब्दभूमि प्रकाशन : साहित्यिक सहकारिता और वैचारिक संवाद का मंच

कार्यक्रम की शुरुआत शब्दभूमि प्रकाशनके परिचय से हुई, जिसमें संस्था को एक सहकारी साहित्यिक उपक्रम बताया गया जो नए और स्थापित दोनों प्रकार के रचनाकारों को मंच प्रदान करता है। संस्था ने स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य व्यावसायिकता नहीं बल्कि साहित्य का संवर्धन, संरक्षण और प्रसारण है। कविता, कहानी, आलोचना, संस्मरण, शोध और वैचारिक लेखन जैसी विविध विधाओं को प्रोत्साहित करते हुए संस्था साहित्यिक संवाद और सांस्कृतिक विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए सक्रिय है।

पत्रकारिता : सूचना नहीं, सामाजिक चेतना का माध्यम

संगोष्ठी की संचालिका गायत्री उपाध्याय ने कहा कि पत्रकारिता केवल समाचारों का संकलन नहीं बल्कि समाज की वैचारिक दिशा तय करने वाला बौद्धिक उपकरण है। उन्होंने उदंत मार्तंडसे लेकर डिजिटल मीडिया तक हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिंदी पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आंदोलन, सामाजिक सुधार और लोकतांत्रिक चेतना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने डिजिटल मीडिया के दौर में कॉपी-पेस्ट संस्कृति, एल्गोरिद्मिक नियंत्रण, भाषाई प्रदूषण, साहित्यिक चोरी और सतही लेखन जैसी चुनौतियों पर चिंता व्यक्त की।

वक्ताओं के मुख्य वक्तव्य

आशीष अम्बर : हिंदी पत्रकारिता का भविष्य और नवाचार

बिहार के दरभंगा से जुड़े आशीष अम्बर को हिंदी पत्रकारिता का भविष्य और नवाचारविषय पर आमंत्रित किया गया। उन्होंने अपने विचारों में हिंदी पत्रकारिता के भविष्य को डिजिटल नवाचार, वैकल्पिक मीडिया और जनसहभागिता से जोड़ते हुए कहा कि नई तकनीकें पत्रकारिता को अधिक लोकतांत्रिक बना रही हैं।
उनके अनुसार पत्रकारिता को तकनीकी बदलावों के साथ चलते हुए अपनी वैचारिक विश्वसनीयता और सामाजिक प्रतिबद्धता बनाए रखनी होगी।

डॉ. बी. मल्लिका : हिंदी पत्रकारिता जनसंचार और जागरूकता का माध्यम

तमिलनाडु के गांधीग्राम ग्रामीण संस्थान की डॉ. बी. मल्लिका ने हिंदी पत्रकारिता को भारत की बहुसंख्यक जनता तक पहुँचने वाला प्रभावी जनसंचार माध्यम बताया। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर डिजिटल युग तक हिंदी पत्रकारिता की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि पत्रकारिता समाज में परिवर्तन, शिक्षा और जनजागरण का कार्य करती रही है। उन्होंने फेक न्यूज़’, ‘येलो जर्नलिज्मऔर भाषाई अवनति को गंभीर चुनौती बताया।

शोभा नागप्पा माली : प्रिंट मीडिया से डिजिटल मीडिया की ओर संक्रमण

मुंबई की शोधार्थी शोभा नागप्पा माली ने कहा कि पत्रकारिता का स्वरूप तकनीक के साथ तेजी से बदल रहा है। उन्होंने कहा कि डिजिटल मीडिया ने सूचना को त्वरित और लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन साथ ही फेक न्यूज़और सूचना की विश्वसनीयता का संकट भी बढ़ा है। उनके अनुसार भविष्य में प्रिंट और डिजिटल मीडिया एक-दूसरे के पूरक बनेंगे।

डॉ. श्वेत प्रकाश : पोस्ट-ट्रुथ, ट्रोल संस्कृति और मीडिया की विश्वसनीयता

बक्सर, बिहार के डॉ. श्वेत प्रकाश ने सत्योत्तर काल में हिंदी मीडिया : ट्रोल संस्कृति के चक्रव्यूह में फँसी विश्वसनीयताविषय पर तीखा वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय पोस्ट-ट्रुथका समय है जहाँ तथ्यों की जगह भावनात्मक प्रचार और पूर्वाग्रहों ने ले ली है। उन्होंने सोशल मीडिया एल्गोरिद्म, संगठित ट्रोल सेनाओं और कॉरपोरेट मीडिया संरचनाओं को लोकतांत्रिक विमर्श के लिए खतरनाक बताया। उनके अनुसार पत्रकारिता का भविष्य तकनीक पर नहीं बल्कि सच बोलने के नैतिक साहस पर निर्भर करेगा।

राहुल भीवा हतागले : समाज सुधार और हिंदी पत्रकारिता

महाराष्ट्र के राहुल भीवा हतागले ने हिंदी पत्रकारिता को समाज सुधार और जनजागरण का सशक्त माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता ने बाल विवाह, स्त्री शोषण, अस्पृश्यता और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जनचेतना जगाने का कार्य किया। उन्होंने भारतेंदु हरिश्चंद्र, गणेश शंकर विद्यार्थी और बाबूराव विष्णु पराडकर के योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया।

डॉ. कमलिनी पशीने : भाषा और वैचारिकता का विकास

भोपाल की डॉ. कमलिनी पशीने ने हिंदी पत्रकारिता की 200 वर्षों की यात्रा को विभिन्न कालखंडों में विभाजित करते हुए भाषा और वैचारिकता के विकास का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता ने हिंदी भाषा को संपर्क भाषा से वैश्विक भाषा बनने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उन्होंने भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, स्वतंत्रता आंदोलन और डिजिटल युग में भाषा के बदलते स्वरूप पर विस्तार से चर्चा की।

संजय प्रियंवद : सोशल मीडिया और पत्रकारिता की बदलती दिशा

झारखंड के गोड्डा कॉलेज से जुड़े संजय प्रियंवद ने कहा कि आज हिंदी पत्रकारिता सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों के गहरे प्रभाव में है। उन्होंने कहा कि डिजिटल माध्यमों ने अभिव्यक्ति को जनसुलभ बनाया है, लेकिन इसके साथ सतही विमर्श और त्वरित प्रतिक्रियावादी संस्कृति भी बढ़ी है। उनके अनुसार पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती उसकी विश्वसनीयता को बचाए रखना है।

प्रो. निलोफर राशिद शेख : पत्रकारिता में नैतिकता और मूल्यबोध

प्रो. निलोफर राशिद शेख ने हिंदी पत्रकारिता में नैतिकता और मूल्यबोध की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता केवल समाचार देने का माध्यम नहीं बल्कि समाज को मानवीय संवेदनाओं और लोकतांत्रिक विवेक से जोड़ने का कार्य भी करती है। उन्होंने डिजिटल युग में सनसनी, बाजारवाद और उपभोगवादी पत्रकारिता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भाषा की गरिमा और सामाजिक उत्तरदायित्व की रक्षा पत्रकारिता का मूल दायित्व है।

शांति सोनी : स्त्री दृष्टि और संवेदनशील पत्रकारिता

शांति सोनी ने हिंदी पत्रकारिता में स्त्री दृष्टि और संवेदनशील विमर्शों की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि डिजिटल मीडिया ने महिलाओं, दलितों और हाशिए के समुदायों को अभिव्यक्ति का मंच दिया है, लेकिन ऑनलाइन हिंसा और ट्रोलिंग भी बढ़ी है। उन्होंने पत्रकारिता को संवेदना और प्रतिरोध की भाषाबताते हुए कहा कि पत्रकारिता को उपेक्षित समुदायों की आवाज़ बनना होगा।

मुकेश राम : ग्रामीण समाज, जनपक्षधरता और मीडिया

मुकेश राम ने हिंदी पत्रकारिता में ग्रामीण समाज, श्रमजीवी वर्ग और जनपक्षधरता के प्रश्नों को केंद्र में रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा आज शहरी और बाजार केंद्रित होता जा रहा है, जबकि गाँव, किसान, मजदूर और वंचित समुदायों के प्रश्न हाशिए पर चले गए हैं।
उनके अनुसार हिंदी पत्रकारिता की वास्तविक शक्ति उसकी जनपक्षधरता और सामाजिक सरोकारों में निहित है।

रूपा कुमारी : नई पीढ़ी, डिजिटल अभिव्यक्ति और भाषा का संकट

रूपा कुमारी ने नई पीढ़ी और डिजिटल मीडिया के संबंध पर विचार रखते हुए कहा कि सोशल मीडिया ने युवाओं को अभिव्यक्ति का नया मंच दिया है, लेकिन भाषा की शुद्धता, गंभीर अध्ययन और वैचारिक अनुशासन के सामने नई चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता और साहित्य को युवाओं के बीच संवाद, अध्ययन संस्कृति और आलोचनात्मक चेतना को पुनर्जीवित करने की दिशा में कार्य करना होगा।

डिजिटल ट्रोलिंग और अभद्र व्यवधान बना चर्चा का केंद्र

कार्यक्रम के दौरान कुछ अज्ञात लोगों ने ज़ूम मीटिंग में अभद्र टिप्पणियाँ और गालियाँ देकर व्यवधान उत्पन्न किया। आयोजकों ने इसे सुनियोजित डिजिटल हमला बताया। इसके बावजूद प्रतिभागियों और आयोजकों ने कार्यक्रम जारी रखा और कहा कि पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के अवसर पर वे पीछे नहीं हटेंगे।
इस घटना ने ट्रोल संस्कृति, साइबर सुरक्षा और डिजिटल लोकतंत्र के संकट को वास्तविक रूप में संगोष्ठी के भीतर उपस्थित कर दिया।

लोकतांत्रिक चेतना और साहित्यिक प्रतिरोध का मंच बनी संगोष्ठी

संगोष्ठी में देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े प्रतिभागियों ने हिंदी पत्रकारिता को लोकतांत्रिक चेतना, सामाजिक परिवर्तन, भाषा संघर्ष और वैचारिक प्रतिरोध का माध्यम बताया। कार्यक्रम ने यह स्पष्ट किया कि हिंदी पत्रकारिता की दो सौ वर्षों की यात्रा केवल तकनीकी विकास की कहानी नहीं बल्कि समाज, लोकतंत्र, भाषा और मानवीय मूल्यों की निरंतर चलने वाली ऐतिहासिक प्रक्रिया है।

 

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जान्हवी पाण्डेय जान्हवी पाण्डेय, पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार में दर्शन स्नातक चतुर्थ सेमेस्टर की छात्रा हैं।