विश्व हिंदी परिषद की अंतरराष्ट्रीय काव्य गोष्ठी संपन्न

विश्व हिंदी परिषद की अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन काव्य गोष्ठी में भारत, अमेरिका, कनाडा, नीदरलैंड, चीन सहित अनेक देशों के साहित्यकारों ने हिंदी, नारी शक्ति, पर्यावरण संरक्षण और विश्व शांति पर काव्य पाठ कर वैश्विक सांस्कृतिक एकता का संदेश दिया।

Jun 29, 2026 - 21:37
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विश्व हिंदी परिषद की अंतरराष्ट्रीय काव्य गोष्ठी संपन्न
विश्व हिंदी परिषद की अंतरराष्ट्रीय काव्य गोष्ठी संपन्न

लखनऊ/नई दिल्ली, 29 जून। विश्व हिंदी परिषद के तत्वावधान में 27 जून 2026, शनिवार को भारतीय समयानुसार रात्रि 8 बजे आयोजित अंतरराष्ट्रीय आभासी काव्य गोष्ठी में भारत सहित अमेरिका, कनाडा, नीदरलैंड, चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कतर, कुवैत और अन्य देशों के साहित्यकारों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता कर हिंदी की वैश्विक प्रतिष्ठा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। लगभग दो घंटे से अधिक समय तक चले इस आयोजन में हिंदी भाषा, नारी शक्ति, पर्यावरण संरक्षण और विश्व शांति जैसे समसामयिक विषयों पर कवियों ने अपनी प्रभावशाली एवं भावपूर्ण रचनाओं का पाठ किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ अमेरिका से जुड़ीं श्रीमती कादम्बरी शंकर 'आदेश' द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ। उन्होंने माँ के विविध स्वरूपों का भावपूर्ण वर्णन करते हुए वातावरण को आध्यात्मिक गरिमा से भर दिया। इसके पश्चात नीदरलैंड से डॉ. ऋतु 'ननन' पांडे ने पिता के संघर्ष, त्याग और समर्पण पर आधारित अपनी मार्मिक कविता प्रस्तुत कर श्रोताओं को भावुक कर दिया।

कनाडा से डॉ. स्नेहा ठाकुर ने नारी शक्ति पर अपनी ओजस्वी रचना प्रस्तुत करते हुए कहा, "नारी हूँ, पुरुष और पुरुषार्थ को जन्म देती हूँ।" वहीं चीन से डॉ. विवेक मणि त्रिपाठी ने नारी की तुलना समुद्र की लहरों से करते हुए कहा कि नारी कभी रुकती नहीं, बल्कि समाज को निरंतर आगे बढ़ाती रहती है।

प्रख्यात साहित्यकार श्री मृदुल कीर्ति ने 'नारी और धरती' विषय पर अपनी कविता में नारी को धरती के समान धैर्य, सहनशीलता और सृजन का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि नारी युगों से महापुरुषों को जन्म देती आई है और स्वयं अनगिनत कष्ट सहकर भी स्नेह एवं संवेदना का संचार करती रहती है।

इंदौर से डॉ. अशोक भार्गव ने 'मेरी अलौकिक भाषा हिंदी' शीर्षक से कविता सुनाते हुए हिंदी के वैश्विक विस्तार का उल्लेख किया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि विश्व की प्रमुख भाषाओं में अपना स्थान बना चुकी हिंदी शीघ्र ही सर्वोच्च स्थान प्राप्त करेगी। उनकी पंक्तियाँ"हिंदी के अश्वमेध का घोड़ा दौड़ रहा है, जो थे आगे उन्हें पीछे छोड़ रहा है"श्रोताओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं।

विश्व हिंदी परिषद की मनोनीत अध्यक्ष अमेरिका निवासी डॉ. दुर्गा सिन्हा 'उदार' ने विश्व शांति पर आधारित अपनी रचना में युद्ध, आतंक और हिंसा से मुक्त विश्व की कल्पना प्रस्तुत करते हुए आत्ममंथन और आत्मचिंतन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आज शस्त्रों से अधिक शास्त्रों तथा प्रेम, सद्भाव और भाईचारे की आवश्यकता है।

नागपुर से श्री कृष्ण कुमार द्विवेदी ने संघर्ष और धैर्य का संदेश देते हुए अपनी प्रेरक रचना "मिलेगी मंज़िल मगर धीरे-धीरे" सुनाई। इटावा से श्री प्रशांत ने हिंदी भाषा की वैश्विक उपयोगिता पर संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली विचार व्यक्त किए।

समयाभाव के बावजूद अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं एवं विचारों से आयोजन को समृद्ध बनाया। इनमें उड़ीसा से डॉ. मनीष कुमार पांडेय, कुवैत से डॉ. आरती परिख, महाराष्ट्र से डॉ. बालकृष्ण महाजन एवं पुरुषोत्तम कुंडे, पश्चिमी चंपारण से डॉ. शिप्रा मिश्रा, पश्चिम बंगाल से श्वेता गुप्ता 'श्वेतांबरी', छत्तीसगढ़ से डॉ. संगीता सिंह 'बनाफर', गुवाहाटी से विनय कुमार 'बुद्ध', मधुबनी से विजय कुमार यादव, उड़ीसा से विक्रमादित्य सिंह, हरियाणा से दिलबाग सिंह 'अकेला', उत्तराखंड से अर्चना त्यागी तथा नूंह (मेवात) से डॉ. कासम खान आजाद प्रमुख रूप से शामिल रहे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्व हिंदी परिषद के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. विपिन कुमार ने की। उन्होंने सभी रचनाकारों की अभिव्यक्तियों की सराहना करते हुए विश्वभर में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए परिषद द्वारा संचालित अभियानों की जानकारी दी। उन्होंने विशेष रूप से बच्चों को हिंदी भाषा सीखने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यक्रम का सफल संचालन राष्ट्रीय संपर्क समन्वयक डॉ. नन्दकिशोर साह ने किया। उन्होंने कुशल संयोजन के साथ अधिकांश प्रतिभागियों को अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया। अंत में सभी प्रतिभागियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम के विधिवत समापन की घोषणा की गई।

यह अंतरराष्ट्रीय काव्य गोष्ठी केवल काव्य पाठ तक सीमित नहीं रही, बल्कि हिंदी भाषा के वैश्विक विस्तार, सांस्कृतिक संवाद, नारी सम्मान और विश्व शांति के संदेश को विश्वभर के साहित्यकारों तक पहुँचाने का एक प्रभावशाली मंच सिद्ध हुई।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I