क्या लोकतंत्र सचमुच सिकुड़ रहा है?
पेपर लीक, जंतर-मंतर आंदोलन, शिक्षा व्यवस्था, लोकतंत्र और युवाओं के भविष्य पर आधारित एक गंभीर, विचारोत्तेजक संपादकीय। क्या भारत की परीक्षा प्रणाली और लोकतांत्रिक संस्थाएँ कठिन प्रश्नों के सामने हैं?
पेपर लीक से जंतर-मंतर तक उठते सवाल और जवाबदेही की चुनौती
भारत का लोकतंत्र केवल चुनावों से जीवित नहीं रहता। उसकी वास्तविक शक्ति नागरिकों के विश्वास, संस्थाओं की विश्वसनीयता और असहमति के सम्मान में निहित होती है। जब लाखों युवा वर्षों की तैयारी के बाद परीक्षा में बैठते हैं, तब वे केवल प्रश्नपत्र नहीं हल कर रहे होते; वे अपने भविष्य, अपने परिवार की आशाओं और संविधान द्वारा प्रदत्त समान अवसर के अधिकार की परीक्षा भी दे रहे होते हैं। इसी कारण जब लगातार प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, भर्ती में विलंब और चयन प्रक्रिया पर प्रश्न उठते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं रह जाती। यह लोकतंत्र की उस मूल प्रतिज्ञा को चुनौती देती है कि प्रत्येक नागरिक को समान अवसर मिलेगा। दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन ने इसी असंतोष को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। आंदोलन के समर्थन में दिए गए भाषणों ने कई तीखे राजनीतिक आरोप लगाए, लेकिन उनसे भी अधिक महत्वपूर्ण वे प्रश्न हैं जो लोकतंत्र और शासन व्यवस्था के सामने खड़े होते हैं।
पहला प्रश्न क्या पेपर लीक केवल अपराध है या व्यवस्था का संकट?
सरकारें अकसर पेपर लीक को कुछ व्यक्तियों की साजिश या तकनीकी विफलता बताकर सीमित कर देती हैं।
लेकिन क्या सचमुच यह इतना सरल है? यदि बार-बार अलग-अलग राज्यों और संस्थाओं में परीक्षाएँ प्रभावित होती हैं, तो क्या यह केवल संयोग है? यदि लाखों युवाओं को बार-बार परीक्षा देनी पड़ती है, तो इसकी आर्थिक, मानसिक और सामाजिक कीमत कौन चुकाता है? एक छात्र केवल परीक्षा शुल्क नहीं देता। वह वर्षों का समय देता है। परिवार की बचत लगती है। रोजगार टलता है। आत्मविश्वास टूटता है। यदि परीक्षा व्यवस्था ही अविश्वसनीय हो जाए तो संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है?
दूसरा प्रश्न- क्या शिक्षा अवसर का माध्यम है या बाजार का उत्पाद?
आंदोलन के मंच से शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण पर गंभीर टिप्पणी की गई। यह प्रश्न नया नहीं है। देश में निजी शिक्षण संस्थानों की संख्या बढ़ी है। कोचिंग उद्योग हजारों करोड़ रुपये का बाजार बन चुका है। उच्च शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है। यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग की पहुँच में रह जाए, तो सामाजिक न्याय की अवधारणा कहाँ खड़ी होगी? क्या शिक्षा प्रतिभा का अधिकार है या क्रय शक्ति का?
तीसरा प्रश्न- क्या लोकतंत्र में विरोध की जगह सचमुच छोटी हो रही है?
मंच से योगेंद्र यादव ने कहा कि आज जंतर-मंतर छोटा नहीं हुआ है, लोकतंत्र छोटा हो रहा है। यह एक राजनीतिक वक्तव्य है। इससे सहमत या असहमत हुआ जा सकता है। किंतु इससे उत्पन्न प्रश्न अत्यंत गंभीर है। लोकतंत्र केवल संसद नहीं है। लोकतंत्र नागरिक समाज भी है। लोकतंत्र सड़क भी है। लोकतंत्र संवाद भी है। यदि नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध के अवसर सीमित महसूस होते हैं, तो शासन और समाज दोनों के लिए आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है। दूसरी ओर यह भी उतना ही सत्य है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना भी राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है। इसलिए चुनौती संतुलन की है, ऐसा संतुलन जिसमें नागरिकों का विरोध का अधिकार और सार्वजनिक सुरक्षा, दोनों सुरक्षित रहें।
चौथा प्रश्न- क्या युवाओं का विश्वास टूट रहा है?
किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसके युवा होते हैं। लेकिन आज लाखों प्रतियोगी छात्र स्वयं से पूछ रहे हैं-
क्या मेहनत पर्याप्त है? क्या चयन केवल योग्यता से होगा? क्या परीक्षा समय पर होगी? क्या परिणाम समय पर आएँगे? जब ये प्रश्न बढ़ते हैं तो केवल नौकरी का संकट नहीं पैदा होता। लोकतंत्र में विश्वास भी प्रभावित होता है।
लोकतंत्र की असली परीक्षा
लोकतंत्र का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होता कि सत्ता कितनी मजबूत है। लोकतंत्र की असली परीक्षा इस बात से होती है कि असहमति कितनी सुरक्षित है। क्या विरोध करने वाला नागरिक भयमुक्त है? क्या आलोचना को राष्ट्र-विरोध नहीं माना जाता? क्या सरकार अपने आलोचकों को सुनती है? क्या विपक्ष रचनात्मक भूमिका निभा रहा है? क्या नागरिक समाज स्वतंत्र है? ये प्रश्न किसी एक सरकार के नहीं हैं। ये हर लोकतांत्रिक व्यवस्था के स्थायी प्रश्न हैं।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा
केवल विरोध पर्याप्त नहीं। समाधान भी आवश्यक हैं। सरकार, न्यायपालिका, संसद और समाज मिलकर कुछ ठोस कदम उठा सकते हैं- राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा सुरक्षा प्राधिकरण की स्थापना। डिजिटल प्रश्नपत्र सुरक्षा प्रणाली। पेपर लीक मामलों की समयबद्ध विशेष अदालतों में सुनवाई। दोषियों पर कठोर आर्थिक दंड और आजीवन प्रतिबंध। परीक्षा एजेंसियों की स्वतंत्र जवाबदेही। भर्ती कैलेंडर का कानूनी पालन। परीक्षा रद्द होने पर अभ्यर्थियों के आर्थिक नुकसान की भरपाई पर विचार।
राजनीति बनाम जनआंदोलन
जंतर-मंतर के मंच से यह भी कहा गया कि आंदोलन का नेतृत्व जनता के हाथ में रहना चाहिए। यह विचार लोकतांत्रिक आंदोलनों के इतिहास में महत्वपूर्ण रहा है। इतिहास बताता है कि जब जनआंदोलन पूरी तरह राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का उपकरण बन जाते हैं, तो मूल मुद्दे अकसर पीछे छूट जाते हैं। दूसरी ओर लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की भूमिका भी अनिवार्य है। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि राजनीति हो या न हो। प्रश्न यह है कि क्या राजनीति जनता के मुद्दों के प्रति उत्तरदायी है?
लोकतंत्र केवल सरकार नहीं, समाज भी है
हम अकसर लोकतंत्र की सारी जिम्मेदारी सरकार पर डाल देते हैं। लेकिन लोकतंत्र नागरिकों से भी बनता है।
यदि समाज भ्रष्टाचार को स्वीकार करेगा...
यदि परीक्षा में नकल को सामान्य समझेगा...
यदि रिश्वत को सुविधा मानेगा...
यदि योग्यता से अधिक प्रभाव को महत्व देगा...
तो केवल सरकार बदलने से व्यवस्था नहीं बदलेगी। लोकतंत्र नागरिक चरित्र से भी निर्मित होता है।
सबसे बड़ा प्रश्न- युवाओं का भविष्य किसके भरोसे?
भारत विश्व का सबसे युवा देश कहलाता है। लेकिन यदि यही युवा बार-बार निराश होंगे... यदि उनकी परीक्षाएँ बार-बार विवादों में आएँगी... यदि भर्ती वर्षों तक अटकी रहेगी... यदि अवसरों पर विश्वास कम होगा... तो इसका प्रभाव केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहेगा। यह सामाजिक असंतोष, आर्थिक अनिश्चितता और संस्थागत अविश्वास को भी जन्म दे सकता है।
निष्कर्ष
जंतर-मंतर का आंदोलन समाप्त होगा। अनशन भी समाप्त होगा। राजनीतिक भाषण भी समय के साथ इतिहास का हिस्सा बन जाएंगे। लेकिन वे प्रश्न नहीं समाप्त होंगे जो आज देश का युवा पूछ रहा है- क्या मेरी मेहनत सुरक्षित है? क्या मेरी परीक्षा निष्पक्ष होगी? क्या मेरी योग्यता का सम्मान होगा? क्या लोकतंत्र में मेरी आवाज़ सुनी जाएगी? सरकार के लिए भी यह अवसर है कि वह केवल आरोपों का उत्तर न दे, बल्कि पारदर्शी सुधारों के माध्यम से विश्वास बहाल करे। विपक्ष के लिए भी यह अवसर है कि वह केवल आलोचना न करे, बल्कि रचनात्मक विकल्प प्रस्तुत करे। और समाज के लिए भी यह समय है कि वह युवाओं की इस बेचैनी को केवल राजनीतिक शोर समझकर अनसुना न करे। क्योंकि जिस दिन एक पीढ़ी अपने भविष्य पर से विश्वास खो देती है, उस दिन केवल एक परीक्षा नहीं हारती- पूरा लोकतंत्र कठिन प्रश्नों के कटघरे में खड़ा हो जाता है।
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