भरत तिवारी एनकाउंटर: फेसबुक लाइव, बदलते पुलिस बयान और न्यायिक जाँच ने खड़े किए कई सवाल
भोजपुर के भरत तिवारी मुठभेड़ मामले में वायरल फेसबुक लाइव, पुलिस के बदलते बयान और चार पुलिसकर्मियों के निलंबन ने पूरे घटनाक्रम को विवादों के केंद्र में ला दिया है।
पटना/भोजपुर। बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर प्रखंड (थाना क्षेत्र) के बिलौटी गाँव के निवासी भरत तिवारी मुठभेड़ मामले ने पूरे राज्य की राजनीति, प्रशासनिक कार्यप्रणाली और पुलिस की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर बिहार पुलिस इसे आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई और वैध मुठभेड़ बता रही है, वहीं दूसरी ओर वायरल फेसबुक लाइव वीडियो, मृतक के परिजनों के आरोप और पुलिस के अलग-अलग बयानों ने इस पूरे मामले को संदिग्ध बना दिया है।
मौत से पहले की आखिरी इच्छा
मुठभेड़ में मारे गए भरत तिवारी का एक पुराना फेसबुक लाइव वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में भरत तिवारी अपनी मृत्यु के बाद अपने शरीर के अंग दान करने की इच्छा व्यक्त करते दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा था कि उनके शरीर को सबसे पहले भारतीय सेना को, फिर प्रशासन को और उसके बाद गरीब एवं असहाय लोगों के उपयोग के लिए दान कर दिया जाए। उन्होंने अपने मोबाइल फोन को लेकर भी विशेष चिंता व्यक्त की थी। उनका कहना था कि उनकी मृत्यु के बाद उनका मोबाइल परिवार के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के हाथ में नहीं जाना चाहिए क्योंकि भविष्य में वह एक महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हो सकता है। आज उनकी यह बात सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है, क्योंकि उनके समर्थकों और परिजनों का दावा है कि भरत तिवारी को अपनी जान पर खतरे का पूर्वाभास था।
क्या भरत तिवारी ने कर दिया था आत्मसमर्पण?
मामले में सबसे बड़ा विवाद उस फेसबुक लाइव वीडियो को लेकर है जिसमें कथित रूप से भरत तिवारी पुलिस के सामने हथियार फेंकते हुए दिखाई देते हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में यह दावा किया जा रहा है कि उन्होंने आत्मसमर्पण की इच्छा जताई थी और पुलिस अधिकारियों से अपनी माँगें माने जाने के बाद हथियार डाल दिया था। वीडियो के सामने आने के बाद लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि यदि भरत तिवारी ने वास्तव में हथियार डाल दिया था तो फिर उन पर गोली क्यों चलाई गई?
पुलिस की पहली कहानी और बाद की एफआईआर
मामले को लेकर विवाद उस समय और गहरा गया जब पुलिस की प्रारंभिक प्रेस रिलीज और बाद में दर्ज एफआईआर में अंतर दिखाई दिया। प्रारंभिक प्रेस रिलीज में कहा गया था कि जब पुलिसकर्मी भरत तिवारी की ओर बढ़ रहे थे, तब उन्होंने पुलिस दल को निशाना बनाकर गोलीबारी की, जिसके जवाब में पुलिस ने आत्मरक्षा में गोली चलाई। लेकिन बाद में दर्ज एफआईआर में एक अलग कहानी सामने आई। एफआईआर के अनुसार भरत तिवारी ने पहले हथियार फेंक दिया था, फिर जब पुलिसकर्मी उस हथियार को जब्त करने आगे बढ़े, तब उन्होंने दोबारा हथियार उठाकर पुलिस पर फायरिंग कर दी। इन दोनों बयानों में स्पष्ट अंतर होने के कारण लोगों ने पुलिस की कार्रवाई पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
सोशल मीडिया पर उठ रहे सवाल
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो देखने के बाद लोग लगातार यह सवाल पूछ रहे हैं-
· यदि भरत तिवारी पुलिस पर लगातार फायरिंग कर रहे थे तो वीडियो में ऐसा क्यों दिखाई नहीं देता?
· यदि उन्होंने हथियार फेंक दिया था तो पुलिसकर्मी उसे तत्काल कब्जे में क्यों नहीं ले पाए?
· यदि पूरी कार्रवाई वैधानिक और नियमानुसार थी तो चार पुलिसकर्मियों को निलंबित क्यों किया गया?
· क्या मुठभेड़ के बाद कहानी को बदलने का प्रयास किया गया?
यही प्रश्न आज पूरे बिहार और पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है।
चार पुलिसकर्मियों का निलंबन
घटना के बाद चार पुलिसकर्मियों के निलंबन की खबर सामने आई। यहीं से यह मामला और अधिक संवेदनशील हो गया। परिजनों और ग्रामीणों का कहना है कि यदि पुलिस की कार्रवाई पूरी तरह सही थी तो संबंधित पुलिसकर्मियों को निलंबित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? हालांकि प्रशासन की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया कि निलंबन का कारण क्या था और यह कार्रवाई किस स्तर की प्रारंभिक जाँच के आधार पर की गई।
भरत तिवारी कौन थे?
परिजनों के अनुसार भरत तिवारी एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय थे। उन्होंने स्नातक स्तर तक शिक्षा प्राप्त की थी और गरीबों तथा बाढ़ प्रभावित लोगों के पुनर्वास के मुद्दे को लेकर प्रशासन के समक्ष आवाज उठाते रहते थे। उनके छोटे भाई का दावा है कि भरत तिवारी किसी भी जरूरतमंद व्यक्ति की मदद के लिए हमेशा आगे रहते थे। बताया जाता है कि उन्होंने अपना निजी जीवन समाजसेवा को समर्पित कर दिया था और विवाह तक नहीं किया। हालांकि कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि वे मानसिक रूप से परेशान रहते थे। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है।
तीन एफआईआर और बढ़ता विवाद
घटना के बाद पुलिस द्वारा तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज किए जाने की बात सामने आई है। इनमें एक एफआईआर भरत तिवारी पर पुलिस पर फायरिंग करने को लेकर, दूसरी उनके परिवारजनों पर पुलिस कार्रवाई में सहयोग न करने को लेकर और तीसरी मुठभेड़ के बाद प्रदर्शन करने वालों पर दर्ज की गई है। परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने मृतक और उसके परिवार के खिलाफ मुकदमे दर्ज कर दिए, लेकिन उन पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध कोई प्राथमिकी नहीं दर्ज की गई जिनकी कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं।
न्यायिक जाँच की घोषणा
मामले के बढ़ते राजनीतिक और सामाजिक दबाव के बीच राज्य सरकार ने न्यायिक जाँच की घोषणा की है। बताया गया है कि मामले की जाँच उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में कराई जाएगी। हालांकि मृतक के परिजनों और समर्थकों का कहना है कि केवल जाँच की घोषणा पर्याप्त नहीं है, बल्कि दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी
भरत तिवारी मुठभेड़ मामले में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या यह वास्तव में पुलिस और एक आरोपी के बीच हुई वैध मुठभेड़ थी, या फिर परिस्थितियाँ कुछ और कहानी कह रही हैं?
वायरल वीडियो, बदलते आधिकारिक बयान, निलंबन की कार्रवाई और जनता के आक्रोश ने इस मामले को केवल एक पुलिस मुठभेड़ का मामला नहीं रहने दिया है, बल्कि यह अब पारदर्शिता, जवाबदेही और न्यायिक जाँच की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया है। फिलहाल पूरा मामला जाँच के अधीन है और अंतिम निष्कर्ष जाँच रिपोर्ट तथा उपलब्ध साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही सामने आ सकेगा।
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