विद्यासागर विश्वविद्यालय में प्रेमचंद जयंती पर विचार गोष्ठी आयोजित
विद्यासागर विश्वविद्यालय में प्रेमचंद जयंती पर ‘प्रेमचंद का साहित्य : शिक्षा और नई पीढ़ी’ विषयक परिचर्चा आयोजित हुई। वक्ताओं ने प्रेमचंद के शिक्षा-दर्शन, सामाजिक चेतना और युवाओं के लिए उनकी प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार रखे।
मिदनापुर, 31 जुलाई 2026। विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा प्रेमचंद जयंती के अवसर पर ‘प्रेमचंद का साहित्य : शिक्षा और नई पीढ़ी’ विषय पर एक विचारोत्तेजक परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने प्रेमचंद के साहित्य, शिक्षा-दर्शन और समकालीन समाज में उनकी प्रासंगिकता पर अपने विचार साझा किए।
कार्यक्रम का शुभारंभ स्वागत वक्तव्य से हुआ। हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रमोद कुमार प्रसाद ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य प्रत्येक युग में समाज को शिक्षित करने वाला साहित्य है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने अपने लेखन के माध्यम से नैतिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदनाओं को प्रतिष्ठित किया, जो आज भी नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक हैं।
विभाग की शोधार्थी रिया श्रीवास्तव ने कहा कि प्रेमचंद शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि प्रयोजनीयता और मानवीय संवेदना से जोड़कर देखते हैं। मदन साह ने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों और उसकी गिरती गुणवत्ता पर चिंता व्यक्त की।
गायत्री वाल्मीकि ने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य नई पीढ़ी में सहृदयता, मानवीय मूल्यों और प्रगतिशील चिंतन का विकास करना है। वहीं श्रद्धा उपाध्याय ने कहा कि प्रेमचंद को समझने के लिए पुस्तकों के साथ-साथ आधुनिक डिजिटल माध्यमों और तकनीकी उपकरणों का भी प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिए।
नेहा चौबे ने अपने वक्तव्य में कहा कि प्रेमचंद ने सामान्य जनजीवन के संघर्षों को साहित्य का केंद्र बनाया और उनके पात्र आज भी सामाजिक यथार्थ के प्रतिनिधि प्रतीत होते हैं। टीना परवीन ने प्रेमचंद और तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों पर आधारित अपनी स्वरचित कविता का प्रभावशाली पाठ किया।
श्रीकांत द्विवेदी ने कहा कि प्रेमचंद के शिक्षा संबंधी विचार शिशु, किशोर, युवा और विश्वविद्यालय स्तर तक समान रूप से प्रासंगिक हैं। उनका साहित्य जीवन की समग्रता का सशक्त आख्यान प्रस्तुत करता है।
अपने संबोधन में डॉ. संजय जायसवाल ने कहा कि प्रेमचंद औपनिवेशिक शिक्षा मॉडल के आलोचक थे। वे शिक्षा को चरित्र निर्माण, समाज निर्माण और राष्ट्र निर्माण का आधार मानते थे। उनके अनुसार सही शिक्षा व्यक्ति को स्वार्थी नहीं, बल्कि संवेदनशील, विचारशील और परोपकारी बनाती है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद शिक्षा को लोकतंत्रीकरण, उपनिवेशवाद से मुक्ति, जातिगत असमानताओं के प्रतिरोध तथा वैश्विक भाईचारे से जोड़कर देखते हैं।
कार्यक्रम के प्रधान वक्ता डॉ. दामोदर मिश्र ने प्रेमचंद को आधुनिक हिंदी साहित्य का "मुकुटविहीन सम्राट" बताते हुए कहा कि उनके साहित्य में निहित यथार्थ को समझे बिना अपने समय की वास्तविकताओं को नहीं समझा जा सकता। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की आत्मा आज के युवाओं में बसती है और उनके अनुसार शिक्षा का अंतिम उद्देश्य जनसेवा होना चाहिए।
इस अवसर पर विभाग के विद्यार्थियों सलोनी शर्मा, रम्भा कुमारी, काजल ठाकुर, प्रिया मिश्रा, ज्योति कुमारी सिंह, सानिया परवीन, मुस्कान परवीन, नीतू शर्मा, निसार अहमद अंसारी, बिट्टी कौर, मनीषा राय, नाज परवीन, पूजा कुमारी राम, सुमन कुमारी, पींशु ठाकुर तथा टी. दिव्यांशी ने कार्यक्रम के सफल आयोजन में विशेष सहयोग दिया।
कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी सुषमा कुमारी ने किया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य शिक्षा की मूलभूत अवधारणाओं की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है, हमारी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करता है तथा आज की युवा पीढ़ी को दिशाहीन होने से बचाने की प्रेरणा देता है।
परिचर्चा ने यह संदेश दिया कि प्रेमचंद का साहित्य केवल साहित्यिक धरोहर नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, सामाजिक चेतना और शिक्षा के लोकतांत्रिक स्वरूप का जीवंत दस्तावेज़ है, जिसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है।
What's Your Reaction?

