न्याय की रीढ़ और लोकतंत्र की आत्मा
भारतीय लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनावों में नहीं, बल्कि उन संस्थाओं की स्वतंत्रता में होती है जिन्हें संविधान ने नागरिक अधिकारों की रक्षा का दायित्व सौंपा है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता, जनमत का दबाव, युवाओं की बेचैनी, मीडिया की भूमिका और विपक्ष की कमजोरी इन सबके बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि संस्थाओं की अंतिम निष्ठा सत्ता के प्रति होगी या संविधान के प्रति?
जब संस्थाएँ सत्ता से नहीं, संविधान से अपना संबंध तय करती हैं
लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है। चुनाव लोकतंत्र का प्रवेश-द्वार हो सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा उन संस्थाओं के भीतर होती है जिन्हें सत्ता से प्रश्न पूछने, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने और बहुमत की शक्ति पर संवैधानिक मर्यादा लगाने का दायित्व सौंपा गया है। संसद, न्यायपालिका, मीडिया, प्रशासन और नागरिक समाज इन सभी की स्वतंत्रता और पारस्परिक संतुलन ही लोकतंत्र को लोकतंत्र बनाए रखता है।
न्यायाधीश का साहस व्यक्ति का नहीं, संस्था का प्रश्न है
न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि न्यायाधीश जनमत के प्रति पूरी तरह असंवेदनशील हो जाए। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि न्यायिक निर्णय लोकप्रियता के दबाव में लिए जाएँ। एक न्यायाधीश के सामने संविधान होता है, कानून होता है, न्यायिक दृष्टांत होते हैं, तथ्य होते हैं और अंततः उसकी अंतरात्मा होती है। जनमत इन सबके बाहर मौजूद सामाजिक वातावरण हो सकता है, लेकिन वह न्याय का विकल्प नहीं हो सकता।
जब सत्ता और न्यायपालिका आमने-सामने दिखाई देने लगें
आज यह चर्चा का मुख्य विषय बना हुआ है कि न्यायपालिका में अतुल श्रीधरन जैसे न्यायधीशों के संभावित स्थानांतरण, संवेदनशील मामलों के आवंटन और प्रशासनिक दबाव जैसी आशंकाएँ हमेशा उनके ऊपर बनी रहती हैं। इन आशंकाओं को प्रमाणित तथ्य मान लेना उचित नहीं होगा। लेकिन लोकतंत्र में इन आशंकाओं का पैदा होना भी अपने आप में गंभीर विषय है। क्योंकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल वास्तविक हस्तक्षेप से नहीं, हस्तक्षेप की विश्वसनीय आशंका से भी प्रभावित होती है। यदि किसी न्यायाधीश के बारे में यह धारणा बनने लगे कि उसके निर्णयों के कारण उसका स्थानांतरण हो सकता है, उसका रोस्टर बदला जा सकता है अथवा उसे संवेदनशील मामलों से दूर किया जा सकता है, तो संस्था की सार्वजनिक विश्वसनीयता पर प्रश्न उठता है— चाहे अंततः ऐसा कुछ हुआ हो या नहीं। लोकतंत्र में संस्थागत प्रक्रियाएँ केवल निष्पक्ष होनी नहीं चाहिएं; उन्हें निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए। यही कारण है कि न्यायिक प्रशासन में पारदर्शिता, रोस्टर की संस्थागत निष्पक्षता और स्थानांतरण की प्रक्रिया की विश्वसनीयता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
न्यायपालिका का असली संकट 'कमजोर जज' नहीं, कमजोर संस्थागत विश्वास है
आज यह मुख्य विषय चर्चा में है कि न्यायपालिका के भीतर मौलिक अधिकारों को लेकर बेचैनी दिखाई दे रही है और कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने भी सार्वजनिक रूप से न्यायपालिका की भूमिका पर प्रश्न उठाए हैं। इस चिंता को गंभीरता से समझने की जरूरत है। किसी लोकतंत्र में न्यायपालिका की सबसे बड़ी पूँजी उसके पास मौजूद भवन, पद या अधिकार नहीं होते। उसकी सबसे बड़ी पूँजी होती है जनविश्वास। जब नागरिक अदालत में जाता है, तो उसके पास अकसर सत्ता के बराबर संसाधन नहीं होते। वह अदालत में इसलिए जाता है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि वहाँ उसकी बात सुनी जाएगी। एक गरीब नागरिक, किसी अल्पसंख्यक समुदाय का व्यक्ति, कोई राजनीतिक कार्यकर्ता, कोई पत्रकार, कोई कैदी, कोई सरकारी कर्मचारी अथवा राज्य की कार्रवाई से प्रभावित सामान्य नागरिक इन सभी के लिए अदालत अंतिम आशा हो सकती है। इसलिए न्यायपालिका की साख में गिरावट का अर्थ केवल एक संस्था की प्रतिष्ठा में गिरावट नहीं है। इसका अर्थ है कि नागरिक और संविधान के बीच मौजूद सुरक्षा-कवच कमजोर पड़ रहा है।
मौलिक अधिकारों की रक्षा लोकप्रियता का विषय नहीं
व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता, विधि के समक्ष संरक्षण और मनमानी राज्य-कार्रवाई से सुरक्षा ये अधिकार इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हैं कि वे लोकप्रिय हैं। वे इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि संविधान ने उन्हें नागरिक के अधिकार के रूप में स्वीकार किया है। यही लोकतंत्र और बहुमतवाद में अंतर है। बहुमत सरकार बना सकता है; लेकिन बहुमत संविधान को निरस्त नहीं कर सकता। बहुमत कानून बना सकता है; लेकिन कानून भी संविधान की कसौटी से ऊपर नहीं हो सकता। और राज्य के पास पुलिस, प्रशासन और दंडात्मक शक्ति हो सकती है; लेकिन नागरिक की स्वतंत्रता उस शक्ति के सामने निरंकुश रूप से समर्पित नहीं हो सकती। इसलिए न्यायपालिका का काम सरकार को हर मामले में रोकना नहीं है। उसका काम यह सुनिश्चित करना है कि सरकार भी कानून के भीतर रहे। यह distinction जितना स्पष्ट होगा, उतनी ही स्वस्थ न्यायिक व्यवस्था बनेगी।
जनमत की शक्ति और उसका खतरा
आज एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है— जनमत और युवा आंदोलन। जब समाज में व्यापक असंतोष पैदा होता है और युवा बड़ी संख्या में सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होते हैं, तो उसका प्रभाव संस्थाओं पर भी पड़ता है। यह लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। सड़क का लोकतंत्र और संस्थागत लोकतंत्र एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शन, जनमत, पत्रकारिता, नागरिक अभियान और सार्वजनिक विमर्श सत्ता को यह बताते हैं कि समाज किन प्रश्नों से बेचैन है। लेकिन यहाँ भी एक सीमा है। जनमत न्याय का स्रोत नहीं, न्याय पर निगरानी रखने वाला सामाजिक वातावरण है। यदि अदालतें भीड़ की पसंद के अनुसार निर्णय देने लगें तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी। आज भीड़ किसी के पक्ष में हो सकती है, कल उसी भीड़ का रुख किसी दूसरे के विरूद्ध हो सकता है। संविधान इसलिए बनाया गया है कि नागरिक अधिकारों की रक्षा भीड़ की मनःस्थिति पर निर्भर न रहे।
युवाओं का असंतोष लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं— चेतावनी है
आज का युवा केवल रोजगार या शिक्षा की बात नहीं कर रहा। वह संस्थाओं की विश्वसनीयता, पारदर्शिता, अवसर की समानता और भविष्य की सुरक्षा के प्रश्न भी पूछ रहा है। जब युवा यह पूछता है कि व्यवस्था उसके लिए कितनी न्यायपूर्ण है, तो उसे केवल राजनीतिक विरोध समझना भूल होगी। यह एक पीढ़ीगत प्रश्न भी है। युवा उस व्यवस्था को स्वीकार करने में संकोच करेगा जिसमें उसे दिखाई दे कि कानून अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग गति से चलता है, संस्थाएँ समान रूप से जवाबदेह नहीं हैं और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता केवल भाषणों तक सीमित है। इसलिए युवाओं की बेचैनी को दबाने की बजाय उसे समझना लोकतांत्रिक शासन की जिम्मेदारी है।
मीडिया: चौथा स्तंभ या सत्ता का प्रतिध्वनि-कक्ष?
न्यायपालिका के साथ-साथ मीडिया की भूमिका भी इस पूरे विमर्श में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
विपक्ष की कमजोरी भी लोकतांत्रिक संकट का हिस्सा है
विपक्षी दलों की कमजोरी, नेतृत्व के अत्यधिक केंद्रीकरण और स्थानीय संगठनात्मक निष्क्रियता पर भी आज चर्चा आज जोरों पर है। यह आलोचना केवल विपक्ष की चुनावी रणनीति का प्रश्न नहीं है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष सरकार को हटाने के लिए ही जरूरी नहीं होता। वह सरकार को जवाबदेह बनाए रखने के लिए भी जरूरी होता है। यदि विपक्ष कमजोर है, मीडिया कमजोर है, नागरिक समाज निष्क्रिय है और संस्थाओं पर भी जनता का विश्वास कम हो रहा है, तो सत्ता के सामने संतुलनकारी शक्तियाँ घटने लगती हैं। लेकिन विपक्ष की मजबूती का अर्थ केवल किसी एक नेता की लोकप्रियता नहीं है। वास्तविक विपक्ष वह है जिसके पास स्थानीय स्तर पर सक्रिय संगठन हो, वैकल्पिक नीतियाँ हों, सक्षम दूसरी पंक्ति का नेतृत्व हो, जनता के स्थानीय प्रश्नों से जुड़ाव हो, और सत्ता की आलोचना के साथ स्वयं की जवाबदेही स्वीकार करने का साहस हो। लोकतंत्र में केवल सरकार बदलना पर्याप्त नहीं है; राजनीतिक संस्कृति बदलना भी जरूरी है।
सबसे बड़ा सवाल: क्या संस्थाएँ व्यक्ति-निर्भर होती जा रही हैं?
आज की स्थिति में एक और असहज प्रश्न निकलता है। यदि किसी एक न्यायाधीश को इसलिए असाधारण माना जा रहा है क्योंकि वह संवैधानिक साहस दिखाता है, यदि किसी एक पत्रकार को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह सत्ता से प्रश्न पूछता है, यदि किसी एक राजनीतिक नेता के कार्यक्रम से ही किसी दल में ऊर्जा आती है, तो क्या हमारी संस्थाएँ व्यक्ति-निर्भर होती जा रही हैं? लोकतंत्र को नायकों की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं को नायक-निर्भर नहीं होना चाहिए। एक मजबूत न्यायपालिका ऐसी होनी चाहिए जिसमें न्यायिक स्वतंत्रता किसी एक जज के साहस पर निर्भर न हो। एक मजबूत मीडिया ऐसा होना चाहिए जिसमें स्वतंत्र पत्रकारिता किसी एक पत्रकार की व्यक्तिगत बहादुरी पर निर्भर न हो। एक मजबूत विपक्ष ऐसा होना चाहिए जो एक व्यक्ति की अनुपस्थिति में भी सक्रिय रहे। और एक मजबूत प्रशासन ऐसा होना चाहिए जिसमें अधिकारी सरकार के आदेश का पालन करते हुए भी संविधान और कानून की सीमाओं को न भूलें।
लोकतंत्र की अगली लड़ाई संस्थाओं को बचाने की है
भारत का लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और हारने से तय नहीं होगा। उसकी असली परीक्षा तब होगी जब सरकार शक्तिशाली हो और नागरिक कमजोर। बहुमत आक्रामक हो और अल्पमत असुरक्षित। मीडिया पर दबाव हो और सत्य असुविधाजनक। प्रशासन के सामने राजनीतिक निर्देश हो और कानून दूसरी दिशा में खड़ा हो। और न्यायाधीश के सामने सत्ता तथा संविधान के बीच कोई कठिन प्रश्न आ खड़ा हो। ऐसे क्षणों में लोकतंत्र को भाषण नहीं, संस्थागत साहस चाहिए। इसलिए न्यायपालिका से अपेक्षा है कि वह सरकार की विरोधी नहीं, संविधान की प्रहरी बने। मीडिया से अपेक्षा है कि वह विपक्ष का प्रवक्ता नहीं, जनता का विश्वसनीय सूचना-स्रोत बने। विपक्ष से अपेक्षा है कि वह केवल सत्ता पाने की आकांक्षा न रखे, बल्कि सत्ता को जवाबदेह बनाने का संस्थागत दायित्व निभाए। प्रशासन से अपेक्षा है कि वह राजनीतिक सत्ता के प्रति उत्तरदायी होते हुए भी कानून के शासन के प्रति सर्वोच्च निष्ठा बनाए रखे। और नागरिक समाज से अपेक्षा है कि वह असहमति को देशद्रोह और आलोचना को शत्रुता समझने की भूल न करे। अंततः सवाल किसी एक जज, किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल का नहीं है। सवाल यह है कि भारत में अंतिम निष्ठा किसके प्रति होगी- व्यक्ति के प्रति, दल के प्रति, सत्ता के प्रति, भीड़ के प्रति या संविधान के प्रति? इस प्रश्न का उत्तर ही आने वाले वर्षों में भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय करेगा। क्योंकि लोकतंत्र तब तक जीवित नहीं रहता जब तक चुनाव होते रहते हैं। लोकतंत्र तब जीवित रहता है जब सत्ता बदल सकती है, नागरिक सवाल पूछ सकता है, पत्रकार असहमति लिख सकता है, विपक्ष सरकार को चुनौती दे सकता है और न्यायाधीश बिना भय के संविधान के पक्ष में खड़ा हो सकता है। और शायद इसी अर्थ में आज की सबसे बड़ी आवश्यकता किसी नए नायक की नहीं, बल्कि ऐसी संस्थाओं की है जिनमें हर व्यक्ति अपने दायित्व का निर्वहन इतनी ईमानदारी से करे कि किसी एक व्यक्ति को नायक बनने की आवश्यकता ही न पड़े।
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