क्या गणराज्य अपने युवाओं की आवाज सुन रहा है?
शिक्षा से रोजगार, परीक्षा से संसद और सड़क से लोकतंत्र तक भारतीय युवाओं के सामने टूटते भरोसे के सवाल गंभीर हैं। क्या संविधान के समानता, अवसर, गरिमा और अभिव्यक्ति के वादे वास्तव में युवा नागरिकों के जीवन तक पहुँच रहे हैं? यह संपादकीय शिक्षा, बेरोजगारी, परीक्षा व्यवस्था, छात्र आंदोलनों, राज्य की जवाबदेही और लोकतांत्रिक असहमति के माध्यम से इसी सवाल की पड़ताल करता है।
शिक्षा से रोजगार, परीक्षा से संसद और सड़क से लोकतंत्र तक टूटते भरोसे की कहानी
भारत की स्वतंत्रता को आठ दशक पूरे हो चुके हैं। यह अवसर केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी है। आज जब हम स्वतंत्रता, लोकतंत्र और संविधान की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, तब एक असहज प्रश्न हमारे सामने खड़ा है- क्या भारतीय गणराज्य ने अपने नागरिकों, विशेषकर युवाओं से किए गए वादों को वास्तव में उनके जीवन तक पहुँचाया है?
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है। लोकतंत्र तब जीवंत होता है जब नागरिक को समान अवसर मिले, उसकी मेहनत का सम्मान हो, संस्थाओं पर उसका भरोसा बना रहे और असहमति व्यक्त करने पर उसे शत्रु न समझा जाए। संविधान ने भारत को केवल शासन की एक प्रणाली नहीं दी; उसने एक ऐसी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था का सपना रखा जिसमें समानता, गरिमा, स्वतंत्रता, अवसर और न्याय सामान्य नागरिक के जीवन का हिस्सा बनें। लेकिन आज का युवा जिस रास्ते से गुजर रहा है, वह इन संवैधानिक वादों की कठिन परीक्षा ले रहा है। उसकी यात्रा एक कक्षा से शुरू होती है। वह परीक्षा कक्ष में प्रवेश करता है, फिर रोजगार की तलाश में निकलता है और अंततः सम्मानजनक जीवन की आकांक्षा करता है। यदि इन संस्थागत पड़ावों पर उसे निराशा मिलती है, तो उसकी आवाज सड़क पर सुनाई देती है। इसलिए छात्र आंदोलन को केवल सड़क पर दिखाई देने वाली भीड़ के रूप में देखना गंभीर भूल होगी। विरोध कहानी की शुरुआत नहीं, बल्कि उस कहानी का वह बिंदु है जहाँ भीतर जमा असंतोष दिखाई देने लगता है।
शिक्षा का वादा और परिवार की बढ़ती कीमत
भारत में शिक्षा लंबे समय से सामाजिक गतिशीलता का सबसे महत्वपूर्ण साधन रही है। एक सामान्य भारतीय परिवार की आकांक्षा रही है बच्चा पढ़ेगा, डिग्री हासिल करेगा, नौकरी पाएगा और परिवार की आर्थिक-सामाजिक स्थिति बदलेगा। माता-पिता अपनी बचत लगाते हैं, बच्चे वर्षों तक मेहनत करते हैं और परिवार भविष्य की उम्मीद में वर्तमान की अनेक जरूरतों को टाल देता है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था में सार्वजनिक क्षमता के कमजोर होने के साथ इस सामाजिक समझौते की कीमत लगातार परिवारों पर बढ़ती जा रही है। सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी, निजी शिक्षा का विस्तार और उच्च शिक्षा तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की बढ़ती लागत ने शिक्षा को केवल अधिकार या सार्वजनिक सेवा का प्रश्न नहीं रहने दिया है; वह परिवार के बजट का भारी बोझ बनती जा रही है। स्कूल की फीस से लेकर कोचिंग, परिवहन, हॉस्टल और कॉलेज की फीस तक परिवार शिक्षा में निवेश करता है। कई परिवार शिक्षा ऋण लेते हैं। समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब इस निवेश के बदले रोजगार की कोई सुनिश्चित राह दिखाई नहीं देती। यहीं असमानता का नया रूप सामने आता है। जिसके पास संसाधन हैं, वह बेहतर विद्यालय, बेहतर कोचिंग और बेहतर तैयारी खरीद सकता है। जिसके पास संसाधन सीमित हैं, उसके लिए वही प्रतियोगिता कहीं अधिक कठिन हो जाती है। शिक्षा अवसरों की समानता का माध्यम बनने के बजाय यदि आर्थिक क्षमता की परीक्षा बनने लगे तो संविधान का समान अवसर वाला वादा कमजोर पड़ता है।
डिग्री बढ़ी, रोजगार का भरोसा क्यों नहीं?
भारत ने उच्च शिक्षा का विस्तार किया है। बड़ी संख्या में युवा स्नातक और उससे आगे की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। लेकिन शिक्षा से रोजगार तक पहुँचने वाला पुल कमजोर दिखाई देता है। प्रस्तुत आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में graduates हर वर्ष श्रम बाजार में प्रवेश करते हैं, लेकिन उनके अनुपात में पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं हो पाता। यह केवल बेरोजगारी का आंकड़ा नहीं है। इसके पीछे लाखों परिवारों की कहानी है। एक युवा ने वर्षों तक पढ़ाई की। परिवार ने खर्च किया। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में समय लगाया। शायद नौकरी के अवसर की उम्मीद में किसी अन्य रोजगार को भी छोड़ा। लेकिन जब शिक्षा पूरी होने के बाद भी रोजगार नहीं मिलता, तब असफलता केवल व्यक्ति की नहीं रहती। वह परिवार की आर्थिक योजना, सामाजिक अपेक्षा और भविष्य की पूरी कल्पना को प्रभावित करती है। और इसलिए रोजगार की संख्या से आगे बढ़कर हमें रोजगार की गुणवत्ता पर भी सवाल करना होगा। यदि किसी व्यक्ति के पास इतना अस्थिर काम हो कि वह शिक्षा ऋण न चुका सके, माता-पिता की सहायता न कर सके, घर का किराया न दे सके या भविष्य की योजना न बना सके, तो केवल उसे ;employed’ कह देना उसकी वास्तविक स्थिति का पूरा चित्र नहीं देता।
परीक्षा में गड़बड़ी केवल एक प्रश्नपत्र की चोरी नहीं
भारत में प्रतियोगी परीक्षा केवल परीक्षा नहीं रह गई है। लाखों युवाओं के लिए यह सामाजिक और आर्थिक उन्नति का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता है। सरकारी नौकरी उनके लिए नियमित वेतन, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक भविष्य का पर्याय बन जाती है। इसलिए जब किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर प्रश्न उठता है, तो नुकसान केवल उस परीक्षा तक सीमित नहीं रहता। वह merit पर भरोसे को चोट पहुँचाता है। एक छात्र वर्षों तक पढ़ता है। परिवार कोचिंग पर पैसा खर्च करता है। कई बार एक या दो वर्ष केवल परीक्षा की तैयारी में लग जाते हैं। ऐसे में उसका विश्वास होता है कि प्रतियोगिता कठिन जरूर है, लेकिन निष्पक्ष है। यदि उसे यह लगे कि परीक्षा पहले से किसी और के लिए आसान बना दी गई थी, तो उसका प्रश्न केवल यह नहीं रहता कि प्रश्नपत्र किसने लीक किया। उसका बड़ा प्रश्न होता है- “क्या जिस व्यवस्था पर मैंने अपना भविष्य भरोसे में दिया, वह मेरे साथ निष्पक्ष है?” यही वह क्षण है जब प्रशासनिक विफलता राजनीतिक अविश्वास में बदलती है।
जब संस्थाओं पर भरोसा टूटता है, सड़क भरती है
किसी भी लोकतंत्र के लिए यह समझना आवश्यक है कि protest अचानक पैदा नहीं होता। वह अकसर लंबे समय तक अनसुनी शिकायतों, असफल संस्थागत प्रक्रियाओं और टूटते विश्वास का परिणाम होता है। यदि छात्र को विश्वविद्यालय में न्याय नहीं मिलता, परीक्षा में पारदर्शिता पर संदेह होता है, नौकरी नहीं मिलती और शिकायत करने पर भी जवाब नहीं मिलता, तो अंततः वह सार्वजनिक स्थान पर अपनी आवाज उठाता है। यहीं लोकतंत्र की दूसरी कसौटी सामने आती है- राज्य उस आवाज के साथ क्या करता है?
विरोध करने वाले हर व्यक्ति को सही मान लेना लोकतंत्र नहीं है। लेकिन हर विरोध को कानून-व्यवस्था की समस्या मान लेना भी लोकतंत्र नहीं है। राज्य को हिंसा रोकने का अधिकार है। सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है। लेकिन शांतिपूर्ण सभा, अभिव्यक्ति और असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल तत्व हैं। नियमन आवश्यक हो सकता है, पर नियमन को प्रतिबंध का पर्याय नहीं बनाया जा सकता।
पुलिस कार्रवाई में सबसे जरूरी प्रश्न- जवाबदेही किसकी?
जब किसी प्रदर्शन में पुलिस बल का प्रयोग होता है और नागरिक घायल होते हैं, तब लोकतंत्र में एक गंभीर प्रश्न उठता है- जवाबदेही किसकी होगी? केवल मैदान में मौजूद पुलिसकर्मी को देखकर पूरी जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती। हमें पूछना होगा- आदेश किसने दिया? किसने अनुमति दी? किसने निगरानी की? अधिकारियों को क्या निर्देश दिए गए? जमीन पर उन निर्देशों की व्याख्या कैसे हुई? और क्या बल का इस्तेमाल कानून द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर था? यह प्रश्न किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। यह प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न है। और यदि किसी नागरिक को पुलिस कार्रवाई में गंभीर चोट लगती है, तो उसकी शिकायत दर्ज करना राज्य की न्यूनतम जिम्मेदारी होनी चाहिए। किसी सामान्य नागरिक को अपनी FIR दर्ज कराने के लिए किसी बड़े राजनीतिक चेहरे की आवश्यकता पड़े, तो यह केवल पुलिस व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि न्याय तक समान पहुँच पर सवाल है।
लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं, आवश्यकता है
भारत के लोकतंत्र की शक्ति उसकी विविधता में है। यहाँ सहमति जितनी महत्वपूर्ण है, असहमति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। संविधान निर्माण के दौरान मतभेदों को दर्ज किया गया। बहस हुई। आलोचना हुई। अलग-अलग विचारों को सुना गया। यही संसदीय लोकतंत्र की आत्मा है। आज यदि संसद में आलोचना असुविधाजनक लगने लगे और सड़क पर विरोध को केवल व्यवधान माना जाने लगे, तो हमें यह सोचना चाहिए कि कहीं लोकतंत्र की संस्थाएँ नागरिक संवाद की जगह केवल राजनीतिक प्रबंधन का माध्यम तो नहीं बन रही हैं। सत्ता का काम केवल अपनी बात कहना नहीं है। लोकतांत्रिक सत्ता की असली परीक्षा यह है कि वह विरोध की आवाज कितनी धैर्यपूर्वक सुनती है।
परिसीमन का सवाल, प्रतिनिधित्व किसका और किस कीमत पर?
युवा और रोजगार के प्रश्नों के साथ परिसीमन का मुद्दा पहली नजर में अलग दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में यह भी नागरिक की आवाज और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा हुआ है।
भारत को अपने युवाओं से डरना नहीं चाहिए
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। लेकिन युवा आबादी अपने आप demographic dividend नहीं बनती। उसे शिक्षा, कौशल, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक भागीदारी के अवसर चाहिए। यदि युवा शिक्षित तो हो जाए लेकिन रोजगार न मिले, रोजगार मिले तो सुरक्षित न हो, परीक्षा दे तो निष्पक्षता पर भरोसा न रहे और विरोध करे तो उसकी आवाज सुनी न जाए, तो demographic dividend असंतोष में बदल सकता है। इसलिए आज सरकारों के सामने केवल रोजगार पैदा करने का नहीं, बल्कि विश्वास पैदा करने का प्रश्न भी है।
विश्वास तब बनेगा जब परीक्षा निष्पक्ष होगी।
विश्वास तब बनेगा जब शिकायत सुनी जाएगी।
विश्वास तब बनेगा जब पुलिस जवाबदेह होगी।
विश्वास तब बनेगा जब संसद में बहस होगी।
विश्वास तब बनेगा जब असहमति को देश-विरोध के चश्मे से नहीं देखा जाएगा। और विश्वास तब बनेगा जब हर युवा को लगेगा कि उसकी मेहनत का भविष्य उसकी आर्थिक हैसियत, राजनीतिक संपर्क या किसी व्यवस्था की अनियमितता से तय नहीं होगा।
अंततः प्रश्न सरकार से नहीं, पूरे गणराज्य से है
भारत ने स्वतंत्रता के समय एक सपना देखा था। संविधान ने उस सपने को संस्थागत रूप दिया। लेकिन संविधान की सफलता उसके पन्नों में नहीं, नागरिकों के जीवन में दिखाई देती है। यदि एक युवा कक्षा से निकलकर परीक्षा तक पहुँचता है, लेकिन परीक्षा की निष्पक्षता पर भरोसा खो देता है; परीक्षा से रोजगार तक पहुँचता है, लेकिन रोजगार उसे सम्मानजनक जीवन नहीं देता; और जब वह अपनी शिकायत लेकर सड़क पर आता है तो उसे सुनने के बजाय केवल नियंत्रित किया जाता है, तो हमें रुककर पूछना होगा कि समस्या केवल उस युवा में है या उस व्यवस्था में भी जिसने उसे वहाँ तक पहुँचाया? आज भारत को अपने युवाओं से केवल अनुशासन की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उसे उनकी आवाज सुनने की क्षमता भी विकसित करनी होगी। लोकतंत्र की असली ताकत यह नहीं कि सरकार कितनी शक्तिशाली है। असली ताकत यह है कि नागरिक कितना निर्भय होकर सरकार से प्रश्न पूछ सकता है। इसलिए आज सबसे जरूरी प्रश्न यही है-
What's Your Reaction?

