NSA हिरासत पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी: आकृति चौधरी की नजरबंदी रद्द, राज्य पर ₹5 लाख जुर्माना

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा श्रमिक प्रदर्शन मामले में आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द कर दी। कोर्ट ने कार्रवाई को ‘मनमाना और अस्पष्ट’ बताया। वकीलों के अनुसार राज्य पर ₹5 लाख जुर्माना भी लगाया गया।

Sep 3, 2026 - 07:34
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NSA हिरासत पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी: आकृति चौधरी की नजरबंदी रद्द, राज्य पर ₹5 लाख जुर्माना
आकृति चौधरी के ख़िलाफ़ 11 FIR दर्ज की गई हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने NSA के इस्तेमाल पर उठाए गंभीर सवाल

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा श्रमिक विरोध-प्रदर्शन से जुड़े मामले में करीब पांच महीने से जेल में बंद 25 वर्षीय आकृति चौधरी को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत की गई निरोधात्मक कार्रवाई को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने बुधवार को आकृति चौधरी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर अपना आदेश सुनाया। अदालत ने NSA के तहत उनकी हिरासत को मनमाना और अस्पष्ट’ (arbitrary and vague) करार देते हुए निरोध को रद्द कर दिया। पीठ ने अदालत में ही अपना आदेश सुनाया, जबकि आदेश की विस्तृत प्रति अभी जारी होना बाकी है। अदालत के फैसले के बाद यदि किसी अन्य मामले में उनकी गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है, तो आकृति चौधरी की रिहाई का रास्ता साफ हो गया है।

राज्य पर ₹5 लाख का जुर्माना

आकृति चौधरी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस के अनुसार हाईकोर्ट ने अवैध हिरासत के लिए राज्य पर ₹5 लाख का जुर्माना लगाया है। एक अन्य अधिवक्ता मानिक गुप्ता ने बताया कि अदालत ने यह भी संकेत दिया कि जुर्माने की राशि उन अधिकारियों से वसूल की जा सकती है, जिन्होंने हिरासत को मंजूरी देने की प्रक्रिया में भूमिका निभाई थी। इसमें जिला मजिस्ट्रेट से लेकर थाना प्रभारी (SHO) तक के अधिकारी शामिल हो सकते हैं। हालांकि, राज्य की ओर से पेश अपर शासकीय अधिवक्ता नितेश कुमार श्रीवास्तव ने हिरासत रद्द किए जाने की पुष्टि की, लेकिन मुआवजे अथवा अदालत की अन्य टिप्पणियों पर कोई विस्तृत टिप्पणी नहीं की। अदालत के आदेश की आधिकारिक विस्तृत प्रति सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि जुर्माने, क्षतिपूर्ति और अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही को लेकर अंतिम आदेश में क्या निर्देश दिए गए हैं।

कौन हैं आकृति चौधरी?

आकृति चौधरी 25 वर्षीय दिल्ली विश्वविद्यालय स्नातक हैं और मूल रूप से पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की रहने वाली हैं। उन्हें नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए श्रमिकों के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। उन्हें शुरुआत में 11 अप्रैल 2026 को हिरासत में लिया गया था। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 13 मई 2026 को उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम लागू किया। तब से वह गौतम बुद्ध नगर की कासना जेल में बंद थीं। आकृति ने अपनी निरोधात्मक हिरासत को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की थी।

11 FIR में नाम, छह मामलों में जमानत लंबित

आकृति चौधरी का नाम पुलिस ने कुल 11 FIRs में दर्ज किया है। इन मामलों में हत्या के प्रयास, मृत्यु या गंभीर चोट पहुंचाने के इरादे से किए गए कृत्य, जीवन या व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालने तथा आपराधिक साजिश जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। आकृति की ओर से नोएडा की अदालत में पैरवी कर रहे अधिवक्ता रजनीश यादव के अनुसार, उन्हें पांच मामलों में जमानत मिल चुकी है, जबकि छह अन्य FIRs में उनकी जमानत याचिकाओं पर अभी सुनवाई होनी बाकी है। इस स्थिति में NSA के तहत निरोध को रद्द करने का हाईकोर्ट का फैसला उनके लिए महत्वपूर्ण कानूनी राहत माना जा रहा है।

सरकार का आरोप हिंसक आंदोलन की रणनीतिबनाई

NSA लगाने के समय उत्तर प्रदेश सरकार ने आकृति चौधरी पर गंभीर आरोप लगाए थे। पुलिस के अनुसार, आकृति उन लोगों में शामिल थीं जो ऐसी विचारधारा के समर्थक थे, जो अपने उद्देश्यों को हिंसक तरीकों से हासिल करने में विश्वास करती है। सरकार ने दावा किया था कि आकृति ने दिल्ली के करावल नगर में एक सह-आरोपी द्वारा संचालित पुस्तकालय में भाग लिया और वहां प्रस्तावित हिंसक आंदोलन के लिए रणनीति तैयार की। NSA की कार्रवाई के समर्थन में सरकार ने कथित तौर पर एक पुस्तक की बरामदगी का भी उल्लेख किया था। पुलिस ने ‘Great Martyrs of the Indian Revolution’ नामक पुस्तक को विवादास्पद साहित्य बताया था। हालांकि, आकृति की ओर से पेश वकीलों ने इन आरोपों को चुनौती दी।

यह गरीब मजदूरों के बच्चों के लिए लाइब्रेरी का उद्घाटन था

आकृति चौधरी के वकील मानिक गुप्ता ने The Indian Express से बातचीत में राज्य के साजिशवाले दावे पर सवाल उठाया। गुप्ता के अनुसार अभियोजन पक्ष का कहना था कि पूरी घटना की योजना करावल नगर में बनाई गई थी, जबकि बचाव पक्ष का तर्क था कि वहां गरीब मजदूरों के बच्चों के लिए एक लाइब्रेरी का उद्घाटन हुआ था। यही अंतर इस मामले में राज्य के आरोपों और बचाव पक्ष की दलीलों के बीच एक महत्वपूर्ण विवाद का केंद्र रहा।

हिंसा के आरोपों पर भी अदालत ने मांगे थे ठोस साक्ष्य

इससे पहले की सुनवाई में भी हाईकोर्ट ने राज्य से पूछा था कि उसके पास ऐसा कौन-सा वीडियो या अन्य ठोस साक्ष्य है, जिससे यह साबित हो सके कि आकृति चौधरी ने प्रदर्शनकारियों को पथराव अथवा वाहनों में आग लगाने के लिए उकसाया था। राज्य ने वीडियो साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए समय मांगा था, लेकिन अदालत ने अतिरिक्त समय देने से इनकार कर दिया था। अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया था कि आकृति पहले ही लगभग पांच महीने जेल में बिता चुकी थीं। पिछली सुनवाई में अदालत ने राज्य से यह भी पूछा था कि रिकॉर्ड में कहां यह दर्ज है कि आकृति ने लोगों को बुलाकर उनसे पत्थर फेंकने के लिए कहा था। जब राज्य ने चार्जशीट दाखिल होने की बात कही, तो अदालत ने यह जानना चाहा था कि चार्जशीट में किन गवाहों ने आकृति का नाम लिया है और क्या वीडियोग्राफी में उनकी कथित भूमिका दिखाई देती है।

गिरफ्तारी और BNSS नोटिस के क्रम पर भी सवाल

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने आकृति की गिरफ्तारी और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत जारी नोटिस के क्रम पर भी गंभीर सवाल उठाए थे। राज्य के अनुसार आकृति को 12 अप्रैल 2026 को सुबह 10:56 बजे गिरफ्तार किया गया था और BNSS की धारा 130 के तहत नोटिस जारी किया गया था। जब अदालत ने पूछा कि क्या इससे पहले धारा 126 के तहत नोटिस दिया गया था, तो राज्य ने स्वीकार किया कि ऐसा कोई नोटिस नहीं दिया गया था। इसके बाद अदालत ने जनरल डायरी (GD) में दर्ज घटनाक्रम का परीक्षण किया और इस बात पर सवाल उठाया कि कहीं गिरफ्तारी के बाद नोटिस तो तैयार नहीं किया गया।

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने सुनवाई के दौरान कहा: "130 बीएनएसएस के तहत नोटिस के अनुसार, अगर वह बयान देने को तैयार होती, तो उसे गिरफ्तार नहीं किया जाता। अब इसमे जीडी एंट्री देखिये, उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा, फिर नोटिस बनाया जाएगा।" अदालत ने यह भी सवाल उठाया था कि यदि नोटिस पहले दिया गया होता तो रिकॉर्ड में उसका क्रम क्या होता।

‘11 को हिंसा नहीं थी, हिंसा गिरफ्तारी के बाद हुई

अदालत ने प्रदर्शन और हिंसा की टाइमलाइन को लेकर भी राज्य के दावे की जांच की।

राज्य की ओर से बताया गया कि 11 अप्रैल को प्रदर्शन के लिए लोग एकत्र हुए थे। इस पर न्यायमूर्ति श्रीधरन ने घटनाओं के क्रम की ओर संकेत करते हुए कहा: यानी 11 को कोई हिंसा नहीं थी। जो भी हिंसा हुई है, वह उसकी गिरफ्तारी के बाद हुई है। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण रही क्योंकि अदालत यह जांच रही थी कि आकृति चौधरी को कथित हिंसा से जोड़ने के लिए राज्य के पास प्रत्यक्ष और विश्वसनीय सामग्री कितनी मजबूत है।

पुलिस ने पहले बताया था मजबूत इलेक्ट्रॉनिक और वीडियोग्राफिक साक्ष्य

आकृति चौधरी और एक्टिविस्ट/पत्रकार सत्यम वर्मा के खिलाफ NSA लगाए जाने के समय गौतम बुद्ध नगर पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह ने दावा किया था कि पुलिस के पास उनके और अन्य गिरफ्तार लोगों के खिलाफ मजबूत इलेक्ट्रॉनिक और वीडियोग्राफिक साक्ष्य मौजूद हैं।

अब हाईकोर्ट द्वारा NSA हिरासत रद्द किए जाने के बाद इस मामले में राज्य द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और निरोध के आधार को लेकर न्यायिक जांच का महत्व और बढ़ गया है। हालांकि, अंतिम कानूनी निष्कर्ष अदालत के विस्तृत आदेश के सामने आने के बाद ही स्पष्ट होंगे।

पिता ने कहा मुझे न्यायपालिका पर भरोसा था

फैसले के बाद आकृति चौधरी के पिता अरुण चौधरी ने कहा कि उन्हें विश्वास था कि उनकी बेटी ने कुछ गलत नहीं किया है। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी गरीब लोगों के लिए आवाज उठाती रही है और आगे भी उनके लिए लड़ती रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि वह अपनी बेटी का पूरा समर्थन करेंगे।

अरुण चौधरी ने न्यायपालिका में अपने विश्वास का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें भरोसा था कि एक दिन उनकी बेटी को न्याय मिलेगा और बुधवार को वह दिन आ गया।

विस्तृत आदेश से साफ होगी अदालत की कानूनी रीजनिंग

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला केवल एक व्यक्ति की हिरासत तक सीमित नहीं है। इसमें NSA के तहत निरोध के आधार, प्रशासनिक संतुष्टि, गिरफ्तारी की प्रक्रिया, BNSS के तहत नोटिस, उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक एवं वीडियोग्राफिक साक्ष्य तथा निरोधात्मक कार्रवाई की वैधता जैसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न जुड़े हैं।

फिलहाल पीठ ने हिरासत को रद्द कर दिया है और कथित रूप से ₹5 लाख का जुर्माना भी लगाया है। हालांकि, आदेश की विस्तृत प्रति उपलब्ध होने के बाद ही यह पूरी तरह स्पष्ट होगा कि अदालत ने किन विशिष्ट तथ्यों और कानूनी आधारों पर NSA detention को रद्द किया और अधिकारियों की जवाबदेही के संबंध में क्या अंतिम निर्देश दिए हैं।

आकृति चौधरी के लिए फिलहाल यह फैसला करीब पांच महीने की हिरासत के बाद एक बड़ी न्यायिक राहत के रूप में सामने आया है।

 

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I