DGP के सामने इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खोली पुलिस जाँच की पोल, कहा- “हम हकीकत जानते हैं”

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने DGP राजीव कृष्णा की मौजूदगी में पुलिस जाँच और कोर्ट आदेशों के अनुपालन पर सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा- “हम जमीनी हकीकत जानते हैं।”

Sep 1, 2026 - 21:00
 0
DGP के सामने इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खोली पुलिस जाँच की पोल, कहा- “हम हकीकत जानते हैं”
इलाहाबाद हाईकोर्ट में DGP राजीव कृष्णा तलब

कोर्ट ने पुलिस की जाँच की गुणवत्ता, CCTV रिकॉर्ड और आदेशों के अनुपालन पर जताई गंभीर नाराजगी; DGP राजीव कृष्णा से पूछा- कोर्ट तक समय पर पुलिस के निर्देश पहुँचाने के लिए क्या व्यवस्था है?

प्रयागराज। उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली और जाँच की गुणवत्ता को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को बेहद सख्त टिप्पणी की। पुष्पराज सिंह उर्फ बबलू बनाम स्टेट ऑफ यूपी मामले में पुलिस अधिकारियों द्वारा हाईकोर्ट के आदेशों के अनुपालन में कथित लापरवाही के मामले में तलब किए गए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) राजीव कृष्णा अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति समीर जैन की पीठ ने स्पष्ट किया कि मामला केवल एक मुकदमे या एक अधिकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि कई मामलों में पुलिस द्वारा अदालत के आदेशों का अनुपालन न करने और जाँच के ठीक तरीके से न किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

हम खराब तरीके से की गई जाँच के मामले देखते हैं

सुनवाई के दौरान DGP ने पुलिस की कार्यप्रणाली के पक्ष में conviction rate का हवाला दिया। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके सामने चिंता का विषय केवल conviction rate नहीं, बल्कि पुलिस द्वारा की जाने वाली जाँच की गुणवत्ता है। न्यायमूर्ति समीर जैन ने कहा कि अदालत के सामने लगातार ऐसी जाँच के मामले आते हैं जिन्हें ठीक तरीके से नहीं किया गया होता। कोर्ट ने conviction rate के आंकड़ों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि हाईकोर्ट के न्यायाधीश जमीनी हकीकत से परिचित हैं।

अदालत की टिप्पणी का सार यह था कि केवल आंकड़ों के आधार पर पुलिस जाँच की गुणवत्ता का आकलन नहीं किया जा सकता। न्यायिक प्रक्रिया के दौरान सामने आने वाली वास्तविक जाँच और रिकॉर्ड की स्थिति कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

कोर्ट के आदेशों के अनुपालन को लेकर भी सवाल

पीठ ने पुलिस अधिकारियों द्वारा हाईकोर्ट के आदेशों का समय पर अनुपालन नहीं किए जाने पर गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि समस्या किसी एक मामले तक सीमित नहीं है। कई मामलों में कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं होने और जाँच के “tainted” तरीके से किए जाने की स्थिति सामने आती है। कोर्ट ने इस संदर्भ में DGP से यह जानना चाहा कि पुलिस अधिकारियों को न्यायालय के आदेशों का प्रभावी और समयबद्ध तरीके से अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। DGP ने व्यवस्था में सुधार के लिए उठाए जा रहे कदमों और संबंधित समितियों का हवाला दिया तथा अदालत को भरोसा दिलाया कि व्यवस्था को बेहतर बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस पर कोर्ट ने अधिकारियों को समस्या का समाधान निकालने की जिम्मेदारी याद दिलाते हुए कहा कि अधिकारी सक्षम हैं और अदालत समस्याओं की ओर उनका ध्यान आकर्षित करेगी, जबकि उनका काम उन समस्याओं का समाधान निकालना है।

हलफनामे में फुटेज है, रिकॉर्ड बुलाने पर गायब

सुनवाई के दौरान अदालत ने CCTV फुटेज और पुलिस रिकॉर्ड की उपलब्धता को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि कई बार हलफनामे में यह बताया जाता है कि सभी रिकॉर्ड और सामग्री उपलब्ध हैं, लेकिन जब अदालत वास्तविक रिकॉर्ड तलब करती है तो CCTV फुटेज उपलब्ध नहीं होती। CCTV फुटेज आपराधिक मामलों में घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि के लिए महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य हो सकती है। ऐसे में अदालत द्वारा रिकॉर्ड में बताई गई सामग्री और वास्तविक रूप से उपलब्ध रिकॉर्ड के बीच अंतर को गंभीरता से लिया जाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Personal liberty के मामलों में तीन दिन में निर्देश देने पर जोर

अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में पुलिस की ओर से समय पर निर्देश नहीं मिलने की समस्या पर भी सवाल उठाया। न्यायमूर्ति समीर जैन ने कहा कि पहले पुलिस से निर्देश प्राप्त करने के लिए अदालत द्वारा 10 दिन तक का समय दिया जाता था, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा personal liberty से जुड़े मामलों में तीन दिन पर्याप्त बताए गए हैं। पीठ ने DGP से पूछा कि पुलिस की ओर से आवश्यक निर्देश और जानकारी समय पर अदालत तक पहुंचें, इसके लिए क्या प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। यह सवाल विशेष रूप से उन मामलों में महत्वपूर्ण है जहां आरोपी की जमानत याचिका लंबित रहती है और पुलिस की ओर से समय पर आवश्यक निर्देश अथवा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने के कारण न्यायिक कार्यवाही प्रभावित होती है।

आखिर DGP को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से क्यों बुलाया गया?

DGP की व्यक्तिगत पेशी की पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट की पिछली सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा अदालत के आदेशों के अनुपालन में कथित लापरवाही थी। इसी मामले में अदालत ने पहले राज्य को 16 जुलाई 2026 को एक विस्तृत counter-affidavit दाखिल करने का निर्देश दिया था। यह निर्देश 21 जून 2025 की CCTV फुटेज में दिखाई देने वाले समय और घटना के कथित समय के बीच विसंगति से संबंधित था। लेकिन निर्धारित निर्देश के बावजूद राज्य की ओर से counter-affidavit दाखिल नहीं किया गया। सुनवाई के दौरान अपर शासकीय अधिवक्ता डॉ. एसबी मौर्य ने अदालत को बताया था कि उन्होंने इस संबंध में दो बार पत्र भेजे थे, लेकिन इसके बावजूद counter-affidavit दाखिल नहीं किया गया। इस पर हाईकोर्ट ने राज्य की ओर से आदेश का पालन नहीं किए जाने को गंभीरता से लेते हुए इसे अदालत के प्रति “utter disrespect” बताया था।

पुलिस अधिकारी आदेशों का पालन करने में reluctant हैं

पिछली सुनवाई में अदालत ने यह भी कहा था कि हाईकोर्ट के आदेशों के अनुपालन में पुलिस अधिकारियों की अनिच्छा जैसी स्थिति अब बार-बार देखने को मिल रही है। पीठ ने चिंता जताई थी कि पुलिस अधिकारियों के इस रवैये के कारण हत्या के मामलों में जमानत याचिकाएं लंबे समय तक लंबित रह सकती हैं। इसी पृष्ठभूमि में अदालत ने उत्तर प्रदेश के DGP को व्यक्तिगत रूप से पेश होकर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया था कि पुलिस अधिकारी इन दिनों हाईकोर्ट के आदेशों का पालन करने में क्यों अनिच्छुक दिखाई दे रहे हैं।

DGP को कोर्ट की दो टूक, समस्या बताने पर समाधान निकालिए

मंगलवार की सुनवाई में DGP ने अदालत के समक्ष पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए उठाए जा रहे कदमों की जानकारी दी। उन्होंने संबंधित समितियों और सुधारात्मक प्रयासों का भी उल्लेख किया। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल व्यवस्थाओं और आंकड़ों का उल्लेख पर्याप्त नहीं है। अदालत ने अधिकारियों को उनकी जिम्मेदारी की याद दिलाते हुए कहा- आप सभी सक्षम अधिकारी हैं। हम आपको समस्याएँ बताएँगे और आप उनका समाधान निकालिए।

कोर्ट की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि न्यायपालिका पुलिस जाँच की गुणवत्ता, न्यायालय के आदेशों के अनुपालन और समय पर रिकॉर्ड उपलब्ध कराने को लेकर गंभीर है।

जाँच की गुणवत्ता पर बढ़ता न्यायिक फोकस

इस सुनवाई का महत्व इसलिए भी है क्योंकि अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली को केवल conviction rate जैसे आंकड़ों से नहीं, बल्कि वास्तविक जाँच प्रक्रिया और न्यायालय के सामने प्रस्तुत रिकॉर्ड के आधार पर देखने की जरूरत पर जोर दिया। CCTV फुटेज जैसे इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की उपलब्धता, पुलिस द्वारा समय पर निर्देश देना, अदालत के आदेशों का पालन करना और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में अनावश्यक देरी न होना, ये सभी न्यायिक प्रक्रिया के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

पुष्पराज सिंह उर्फ बबलू बनाम स्टेट ऑफ यूपी मामले में हुई सुनवाई ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि पुलिस जाँच और न्यायिक प्रक्रिया के बीच बेहतर समन्वय कैसे सुनिश्चित किया जाए तथा अदालत के आदेशों का समयबद्ध और प्रभावी अनुपालन कैसे कराया जाए। हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद अब निगाह इस बात पर रहेगी कि उत्तर प्रदेश पुलिस अदालत के समक्ष उठाई गई इन समस्याओं के समाधान के लिए किस प्रकार की संस्थागत व्यवस्था लागू करती है।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I