जब सत्ता सवालों से डरने लगे, तब लोकतंत्र खतरे में होता है

लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संवाद, जवाबदेही और नागरिक अधिकारों में निहित है। यह संपादकीय केंद्र सरकार की लोकतांत्रिक जवाबदेही, विरोध प्रदर्शनों के प्रति दृष्टिकोण और संवैधानिक मूल्यों के संदर्भ में एक प्रखर विपक्षी विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

Jul 24, 2026 - 10:27
Jul 24, 2026 - 11:28
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जब सत्ता सवालों से डरने लगे, तब लोकतंत्र खतरे में होता है
जब सत्ता सवालों से डरने लगे, तब लोकतंत्र खतरे में होता है

लोकतंत्र की असली परीक्षा विरोध को कुचलने में नहीं, बल्कि उसे सुनने में होती है

लोकतंत्र का सबसे बड़ा सौंदर्य यह नहीं कि हर नागरिक सरकार की प्रशंसा करे, बल्कि यह है कि वह बिना भय के सरकार से सवाल पूछ सके। संसद में बहुमत किसी सरकार को सत्ता देता है, लेकिन नैतिक वैधता उसे जनता का विश्वास देता है। यह विश्वास तब बनता है जब सत्ता आलोचना को दुश्मनी नहीं, बल्कि लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा माने।

हाल के वर्षों में भारत की राजनीति में एक खतरनाक प्रवृत्ति लगातार मजबूत होती दिखाई दे रही है। सरकार से असहमति रखने वाला हर व्यक्ति, हर छात्र, हर सामाजिक संगठन और हर आंदोलनकारी मानो पहले संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया जाता है। सत्ता की भाषा में असहमति धीरे-धीरे लोकतांत्रिक अधिकार नहीं, बल्कि ‘व्यवधान’ बनती जा रही है। यही लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

जब छात्र अपनी माँगों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं, तब यह केवल एक आंदोलन नहीं होता। वह व्यवस्था के प्रति युवाओं के विश्वास और अविश्वास का सार्वजनिक प्रदर्शन होता है। यदि किसी लोकतांत्रिक राष्ट्र में छात्रों को यह महसूस होने लगे कि उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है, तो यह केवल शिक्षा व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व की भी विफलता है।

सरकारें अकसर कानून-व्यवस्था का हवाला देकर कठोर पुलिस कार्रवाई का बचाव करती हैं। निस्संदेह राज्य का दायित्व है कि वह सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखे। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण सिद्धांत यह भी है कि राज्य की शक्ति संविधान द्वारा सीमित होती है। पुलिस लोकतांत्रिक राज्य का हथियार नहीं, बल्कि कानून लागू करने वाली संस्था है। उसका प्रत्येक कदम न्यायिक समीक्षा और सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में होना चाहिए।

यदि किसी प्रदर्शन के दौरान अत्यधिक बल प्रयोग, लाठीचार्ज या प्रदर्शनकारियों के साथ दुर्व्यवहार के आरोप सामने आते हैं, तो सरकार की पहली प्रतिक्रिया निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। लोकतंत्र में सरकार स्वयं अपने आचरण की अंतिम निर्णायक नहीं हो सकती। यदि सरकार हर आलोचना को राजनीतिक षड्यंत्र कहकर टालने लगे, तो नागरिकों का भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है।

आज का भारत केवल आर्थिक विकास या आधारभूत ढाँचे की परियोजनाओं से नहीं मापा जाएगा। आने वाली पीढ़ियाँ यह भी देखेंगी कि इस दौर में लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ कैसा व्यवहार हुआ। क्या नागरिक बिना भय के अपनी बात कह सकते थे? क्या विश्वविद्यालय स्वतंत्र विचार के केंद्र बने रहे? क्या विरोध प्रदर्शन को लोकतांत्रिक अधिकार माना गया या कानून-व्यवस्था की समस्या?

केंद्र सरकार ने अनेक बार ‘विश्वगुरु भारत’ की परिकल्पना प्रस्तुत की है। लेकिन कोई भी राष्ट्र केवल आर्थिक शक्ति से विश्वगुरु नहीं बनता। दुनिया उन देशों का सम्मान करती है जहाँ विचारों की स्वतंत्रता, संस्थाओं की निष्पक्षता और नागरिक अधिकार सुरक्षित हों। यदि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास कमजोर पड़ने लगे, तो आर्थिक उपलब्धियाँ भी उस कमी को नहीं भर सकतीं।

लोकतंत्र में सबसे अधिक शक्ति रखने वाली सरकार को सबसे अधिक धैर्य भी रखना चाहिए। दुर्भाग्य यह है कि आज राजनीतिक विमर्श में धैर्य की जगह आक्रामकता और संवाद की जगह प्रचार ने ले ली है। प्रेस कॉन्फ्रेंस की जगह एकतरफा संदेशों ने, और सार्वजनिक संवाद की जगह राजनीतिक अभियानों ने ले ली है। यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।

इतिहास गवाह है कि हर दौर में युवाओं ने परिवर्तन की शुरुआत की है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आपातकाल विरोधी संघर्ष तक छात्रों और युवाओं ने लोकतंत्र की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए जब युवा सड़कों पर उतरते हैं, तो किसी भी जिम्मेदार सरकार को पहले यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि आखिर उनकी बेचैनी का कारण क्या है। यदि सरकार केवल पुलिस बल के माध्यम से समस्या का समाधान खोजेगी, तो असंतोष दबेगा नहीं, बल्कि और गहरा होगा।

लोकतंत्र का अर्थ केवल पाँच वर्ष में एक बार मतदान करना नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है कि नागरिक हर दिन सरकार से जवाब माँग सकें। सरकारें जनता के प्रति उत्तरदायी होती हैं, जनता सरकार के प्रति नहीं। यदि यह संबंध उलटने लगे और नागरिकों को ही अपनी लोकतांत्रिक निष्ठा बार-बार साबित करनी पड़े, तो यह लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए गंभीर चेतावनी है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र सरकार राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन करने के बजाय लोकतांत्रिक परिपक्वता का प्रदर्शन करे। यदि किसी घटना को लेकर पूरे देश में बहस चल रही है, तो उसे प्रचार के माध्यम से दबाने के बजाय पारदर्शी जाँच, तथ्य और जवाबदेही के माध्यम से संबोधित किया जाना चाहिए। लोकतंत्र में विश्वास आदेश से नहीं, आचरण से पैदा होता है।

भारतीय संविधान ने कार्यपालिका को असीमित अधिकार नहीं दिए हैं। संविधान की आत्मा नागरिक की गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और न्याय में निहित है। कोई भी सरकार चाहे कितनी ही लोकप्रिय क्यों न हो, वह संविधान से बड़ी नहीं हो सकती। लोकप्रिय जनादेश सरकार को शासन का अधिकार देता है, संविधान उसे सीमाएँ भी निर्धारित करता है।

विपक्ष का दायित्व केवल चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि सरकार से कठिन प्रश्न पूछना भी है। यदि विपक्ष, मीडिया, विश्वविद्यालय और नागरिक समाज सभी एक साथ कमजोर किए जाएँ, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ना तय है। मजबूत लोकतंत्र वह है जिसमें मजबूत सरकार के साथ मजबूत विपक्ष भी मौजूद हो।

सत्ता को यह समझना होगा कि आलोचना राष्ट्रविरोध नहीं होती। सरकार और राष्ट्र एक ही चीज़ नहीं हैं। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन राष्ट्र और संविधान स्थायी रहते हैं। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का पहला दायित्व स्वयं की आलोचना को भी लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में स्वीकार करना है।

भारत का भविष्य केवल जीडीपी की वृद्धि दर से तय नहीं होगा। उसका भविष्य इस बात से तय होगा कि क्या देश का युवा बिना भय के सवाल पूछ सकता है, क्या पत्रकार बिना दबाव के लिख सकता है, क्या विश्वविद्यालय स्वतंत्र सोच का केंद्र बने रह सकते हैं और क्या नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात कह सकते हैं।

यदि इन प्रश्नों के उत्तर कमजोर पड़ते हैं, तो लोकतंत्र भी कमजोर पड़ता है। आज आवश्यकता किसी राजनीतिक विजय की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आत्ममंथन की है। केंद्र सरकार को यह समझना होगा कि सत्ता की सबसे बड़ी ताकत विरोध को दबाने में नहीं, बल्कि उसे सुनने में होती है। इतिहास उन सरकारों को अधिक सम्मान देता है जिन्होंने आलोचना को स्वीकार कर स्वयं को सुधारा, न कि उन सरकारों को जिन्होंने हर असहमति को शक्ति के प्रदर्शन से दबाने की कोशिश की।

लोकतंत्र का भविष्य संसद की दीवारों से कम और नागरिकों के विश्वास से अधिक तय होता है। यदि जनता को यह भरोसा रहे कि उसकी आवाज सुनी जाएगी, उसका अधिकार सुरक्षित रहेगा और सरकार उसके प्रति जवाबदेह रहेगी, तभी भारत दुनिया का सबसे बड़ा ही नहीं, सबसे परिपक्व लोकतंत्र भी कहलाएगा। यदि यह भरोसा टूटने लगे, तो सत्ता चाहे जितनी मजबूत दिखाई दे, लोकतंत्र भीतर से कमजोर होने लगता है। यही वह चेतावनी है जिसे हर सरकार वर्तमान हो या भविष्य की गंभीरता से समझने की आवश्यकता है।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I