झूठी एफआईआर, फर्जी शिकायत और झूठी गवाही पर सख्ती की माँग
झूठी एफआईआर और फर्जी शिकायतों पर सख्ती की माँग वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया। चार सप्ताह में जवाब तलब, दंड प्रावधानों के सार्वजनिक प्रदर्शन और अंडरटेकिंग व्यवस्था का सुझाव।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व राज्यों को जारी किया नोटिस, चार सप्ताह में जवाब तलब
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत में झूठे आपराधिक मुकदमों और फर्जी शिकायतों के कथित बढ़ते मामलों को लेकर एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है। न्यायालय ने चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब माँगा है कि झूठी एफआईआर, फर्जी जांच, झूठी गवाही और झूठे हलफनामों को रोकने के लिए वर्तमान विधिक ढांचे में कौन-कौन से एहतियाती उपाय उपलब्ध हैं तथा उनके प्रभावी क्रियान्वयन की स्थिति क्या है। याचिकाकर्ता अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने अदालत के समक्ष यह तर्क रखा कि देश में लंबित लगभग पाँच करोड़ मामलों में एक बड़ा हिस्सा ऐसे मामलों का है जिनमें शिकायतों की सत्यता संदिग्ध है। उनका कहना है कि दुर्भावनापूर्ण मुकदमों के कारण न्यायालयों पर बोझ बढ़ रहा है और निर्दोष नागरिकों का जीवन, प्रतिष्ठा तथा स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है।
याचिका के प्रमुख बिंदु
याचिका में निम्न प्रमुख सुझाव दिए गए हैं -
1. अनिवार्य डिस्प्ले बोर्ड
प्रत्येक थाना, न्यायालय परिसर, तहसील, नगर निगम, विश्वविद्यालय, स्कूल एवं कॉलेज में एक स्थायी बोर्ड लगाया जाए जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा हो कि झूठी शिकायत, झूठी गवाही और झूठा हलफनामा दंडनीय अपराध है तथा उसके लिए कितनी सजा का प्रावधान है।
2. लिखित अंडरटेकिंग की व्यवस्था
शिकायतकर्ता, गवाह और हलफनामा दाखिल करने वाले से यह लिखित घोषणा ली जाए कि उन्हें ज्ञात है कि झूठी सूचना देने पर दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है।
3. परजरी (Perjury) प्रक्रिया में सुधार
वर्तमान व्यवस्था में झूठी गवाही के मामलों में न्यायाधीश को स्वयं शिकायतकर्ता बनना पड़ता है, जिससे व्यवहारिक कठिनाइयाँ आती हैं। याचिका में इस प्रक्रिया को सरल और प्रभावी बनाने की माँग की गई है।
4. कानूनी संशोधन का प्रस्ताव
याचिका के साथ एक प्रस्तावित विधेयक का प्रारूप भी संलग्न किया गया है, जिसमें झूठे मामलों को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखते हुए कठोर दंड का प्रावधान सुझाया गया है।
वर्तमान कानूनी स्थिति
हाल में लागू नई आपराधिक संहिताओं में झूठी सूचना, झूठी गवाही और मिथ्या साक्ष्य के संबंध में दंडात्मक प्रावधान मौजूद हैं। पूर्ववर्ती कानूनों में भी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं के तहत झूठी शिकायत और मिथ्या साक्ष्य को अपराध माना गया था। किंतु याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है तथा जन-जागरूकता का अभाव है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि झूठी शिकायतों पर अंकुश लगाने की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता, परंतु यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वास्तविक पीड़ितों की शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया भयमुक्त रहे।
जटिल और संवेदनशील मुद्दा
यह विषय कई दृष्टियों से संवेदनशील है। उदाहरणार्थ -
- घरेलू हिंसा, यौन अपराध या चारदीवारी के भीतर घटित घटनाओं में साक्ष्य जुटाने की प्रकृति भिन्न होती है।
- यदि दंडात्मक प्रावधान अत्यधिक कठोर बनाए गए तो वास्तविक शिकायतकर्ता भयवश न्याय की राह से पीछे हट सकते हैं।
- न्यायालयों को संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए झूठे मामलों पर रोक और वास्तविक पीड़ितों की सुरक्षा दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
याचिका में सिंगापुर, जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों की दंड व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि वहां झूठी शिकायत और झूठी गवाही को गंभीर अपराध माना जाता है, जिसके कारण ऐसे मामलों की संख्या कम है।
आगे क्या?
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। सरकारों के जवाब के बाद न्यायालय इस विषय पर विस्तृत सुनवाई करेगा। संभव है कि अदालत इस मुद्दे पर व्यापक दिशा-निर्देश जारी करे या विधायी सुधार का संकेत दे। यदि याचिका में सुझाए गए उपाय लागू होते हैं तो न्यायिक प्रणाली पर बोझ कम करने और निर्दोष नागरिकों को राहत देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा। वहीं, विशेषज्ञ यह भी रेखांकित कर रहे हैं कि किसी भी नए प्रावधान को लागू करते समय न्याय तक समान और सुरक्षित पहुंच की संवैधानिक गारंटी का ध्यान रखना अनिवार्य होगा।
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