स्वातंत्र्य-ज्वाला के अमर पुरोधा : वीर सावरकर

वीर विनायक दामोदर सावरकर के जीवन, क्रांतिकारी संघर्ष, कालापानी की यातनाओं, साहित्यिक योगदान और राष्ट्रवादी चिंतन पर आधारित विस्तृत संपादकीय। जानिए क्यों सावरकर भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के अमर शलाका पुरुष माने जाते हैं।

May 28, 2026 - 15:19
May 28, 2026 - 15:21
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स्वातंत्र्य-ज्वाला के अमर पुरोधा : वीर सावरकर
वीर सावरकर जयंती पर विशेष

राष्ट्रवाद, त्याग, कालापानी की गाथा और वीर सावरकर

पराधीन भारत की वेदना से कराहते उस युग में, जब अंग्रेजी साम्राज्यवाद अपनी शक्ति के चरम पर था और भारतीय जनमानस भय, निराशा तथा दासता की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब एक ऐसा व्यक्तित्व उदित हुआ जिसने अपने विचारों, लेखनी और साहस से पूरे राष्ट्र में स्वाधीनता की अग्नि प्रज्वलित कर दी। वह व्यक्तित्व था- वीर विनायक दामोदर सावरकर।

वीर सावरकर केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान की वह ज्वाला थे, जिसने गुलामी की अंधेरी सुरंग में प्रकाश का मार्ग दिखाया। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि यदि आत्मा में राष्ट्रभक्ति का तेज हो, तो साम्राज्य की सबसे कठोर दीवारें भी उसे पराजित नहीं कर सकतीं।

ज्वाला बनकर देश में, जिसने चेतन फूँक।
बेड़ी से टकरा उठा, उसका सिंह स्वरूप॥
कालापानी काँप उठा, सुन आज़ादी-गान।
वीर सावरकर नाम है, भारत की पहचान॥

28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर गाँव में जन्मे सावरकर बचपन से ही असाधारण प्रतिभा, तेजस्विता और साहस के धनी थे। उनके बालमन पर छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप और गुरु गोविंद सिंह जैसे राष्ट्रनायकों के चरित्र का गहरा प्रभाव था। किशोरावस्था में ही उन्होंने यह निश्चय कर लिया था कि वे भारतमाता को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करेंगे।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा के समय ही देश में अंग्रेजी अत्याचारों और विभाजनकारी नीतियों के प्रति जनाक्रोश बढ़ रहा था। सावरकर ने युवाओं को संगठित करने के उद्देश्य से ‘मित्र मेला’ नामक संगठन की स्थापना की। यह केवल एक सांस्कृतिक समूह नहीं था, बल्कि युवाओं में राष्ट्रप्रेम, संगठन-शक्ति और क्रांतिकारी चेतना का संचार करने वाला आंदोलन था। आगे चलकर यही संगठन ‘अभिनव भारत’ के रूप में विकसित हुआ, जिसने अनेक क्रांतिकारियों को प्रेरित किया।

सावरकर का व्यक्तित्व बहुआयामी था। सामान्य जन उन्हें केवल क्रांतिकारी के रूप में जानते हैं, किंतु वे उच्चकोटि के साहित्यकार, इतिहासकार और चिंतक भी थे। उनकी लेखनी में ओज, तर्क और राष्ट्रप्रेम का अद्भुत संगम दिखाई देता है। उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि राष्ट्रजागरण का शस्त्र बनाया।

जब वे कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड पहुँचे, तब वहाँ का ‘इंडिया हाउस’ भारतीय क्रांतिकारियों का केंद्र बन गया। श्यामजी कृष्ण वर्मा के नेतृत्व में स्थापित यह स्थान सावरकर के कारण स्वतंत्रता-संग्राम की क्रांतिकारी प्रयोगशाला बन गया। वहाँ उन्होंने भारतीय युवाओं में स्वाधीनता के प्रति नई चेतना जगाई। उस समय जब अधिकांश भारतीय नेता अंग्रेजों से सुधारों और रियायतों की अपेक्षा कर रहे थे, तब सावरकर निर्भीक स्वर में ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ की बात कर रहे थे।

उनकी महान कृति The Indian War of Independence 1857 भारतीय इतिहास-लेखन में मील का पत्थर सिद्ध हुई। अंग्रेज इतिहासकार 1857 की घटना को केवल ‘सिपाही विद्रोह’ कहकर सीमित करना चाहते थे, किंतु सावरकर ने ऐतिहासिक प्रमाणों और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के आधार पर सिद्ध किया कि वह भारत का प्रथम स्वातंत्र्य समर था। उनकी यह पुस्तक ब्रिटिश सरकार को इतनी भयावह लगी कि प्रकाशित होने से पहले ही उस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। किंतु प्रतिबंध भी विचारों की उड़ान को रोक नहीं सका और यह पुस्तक गुप्त रूप से भारत पहुँचकर क्रांतिकारियों की प्रेरणा बन गई।

वीर सावरकर के जीवन का सबसे रोमांचकारी प्रसंग फ्रांस के मार्सेई बंदरगाह का है। अंग्रेज उन्हें जलपोत से भारत ला रहे थे। हथकड़ियों और पहरे के बीच भी उनके भीतर स्वतंत्रता की ज्वाला धधक रही थी। उन्होंने जलपोत के शौचालय की खिड़की से समुद्र में छलांग लगा दी और तैरकर फ्रांसीसी तट तक पहुँच गए। यद्यपि बाद में उन्हें पुनः गिरफ्तार कर लिया गया, किंतु यह घटना विश्व इतिहास में साहस और आत्मविश्वास की अनुपम मिसाल बन गई।

इसके बाद उन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, कुल मिलाकर पचास वर्षों का दंड। उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया गया, जिसे ‘कालापानी’ कहा जाता था। वहाँ की अमानवीय यातनाएँ सुनकर ही मन सिहर उठता है। कैदियों को बैलों की तरह कोल्हू में जोता जाता था, नारियल कूटने और कठोर श्रम के लिए विवश किया जाता था। किंतु इन यातनाओं के बीच भी सावरकर का आत्मबल अडिग रहा।

जब उन्हें लिखने के लिए कागज़-कलम नहीं दी गई, तब उन्होंने जेल की दीवारों पर कीलों और पत्थरों से कविताएँ लिखीं। वे उन्हें स्मरण कर लेते और अन्य कैदियों को कंठस्थ कराते, ताकि उनकी रचनाएँ जीवित रह सकें। यह केवल साहित्य-सृजन नहीं था, बल्कि आत्मबल और विचारों की अमरता का प्रतीक था।

बेड़ी बाँध न पाई जिसको, झुका न कारागार।
पत्थर पर लिख दी कथा, बन अमर हुंकार॥
कालकोठरी हार गई, टूटा हर अवरोध।
सावरकर के तेज से, जाग उठा जनबोध॥

सावरकर केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थे। वे सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता के भी प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अस्पृश्यता, जातिगत ऊँच-नीच और सामाजिक भेदभाव का कठोर विरोध किया। उनका मानना था कि जो समाज अपने ही लोगों को छूने से घृणा करता है, वह कभी सशक्त राष्ट्र नहीं बन सकता।

इसी भावना से उन्होंने महाराष्ट्र में ‘पतित पावन मंदिर’ की स्थापना की, जहाँ सभी जातियों के लोगों के लिए प्रवेश के द्वार खोले गए। उस समय यह कदम सामाजिक क्रांति से कम नहीं था। उन्होंने हिंदू समाज में संगठन और आत्मसम्मान की आवश्यकता पर बल दिया और समाज को आंतरिक दुर्बलताओं से मुक्त करने का आह्वान किया।

सावरकर का राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का व्यापक दर्शन था। वे मानते थे कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमाओं का नाम नहीं, बल्कि साझा इतिहास, संस्कृति, परंपरा और आत्मगौरव की जीवंत अनुभूति है। उनकी दृष्टि में स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि मानसिक दासता से मुक्ति भी थी।

आज जब हम स्वतंत्र भारत में साँस ले रहे हैं, तब यह स्मरण रखना आवश्यक है कि यह स्वतंत्रता असंख्य बलिदानों का परिणाम है। वीर सावरकर जैसे महापुरुषों ने अपने यौवन, सुख, परिवार और जीवन तक को राष्ट्रहित में समर्पित कर दिया। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्रप्रेम केवल भाषणों और नारों से सिद्ध नहीं होता, बल्कि त्याग, तपस्या और संघर्ष की कठोर साधना से सिद्ध होता है।

आज की युवा पीढ़ी के लिए सावरकर का जीवन अत्यंत प्रेरणादायी है। उनके भीतर अदम्य आत्मविश्वास, संगठन-शक्ति, बौद्धिक तेज और राष्ट्रहित के प्रति पूर्ण समर्पण था। वे विपरीत परिस्थितियों में भी कभी निराश नहीं हुए। कालापानी की अंधेरी कोठरी में भी उनका मन स्वतंत्र भारत का स्वप्न देख रहा था।

तप, त्यागों की दीपशिखा, अमर रहे बलिदान।
सावरकर के तेज से, जगमग हिंदुस्तान॥
जब तक नभ में सूर्य है, गूँजेगा यह नाम।
वीरों की उस भूमि को, शत-शत मेरा प्रणाम॥

वीर सावरकर की जयंती केवल एक स्मृति-दिवस नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना को पुनर्जीवित करने का अवसर है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि स्वतंत्रता का मूल्य क्या होता है और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने वाले व्यक्तित्व किस प्रकार इतिहास में अमर हो जाते हैं।

सचमुच, जब-जब भारत की स्वतंत्रता, स्वाभिमान और क्रांति का इतिहास लिखा जाएगा, वीर विनायक दामोदर सावरकर का नाम स्वर्णाक्षरों में सदैव आलोकित रहेगा। वे भारतीय राष्ट्रवाद की उस अमर अग्निशिखा के प्रतीक हैं, जिसकी ज्योति युगों तक आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी।

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शांति सोनी शांति सोनी समकालीन हिंदी विमर्श की सजग शिक्षिका, विचारक एवं लेखिका हैं। वे निरंतर सामाजिक, शैक्षिक और समसामयिक विषयों पर गंभीर लेखन करती रहती हैं। उनकी लेखनी में संवेदना, वैचारिक स्पष्टता और समाज के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती है। वर्तमान में वे शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, महमंद में अध्यापन कार्य से जुड़ी हैं तथा शिक्षा और साहित्य दोनों क्षेत्रों में सक्रिय योगदान दे रही हैं।