सुसाइड नोट में IPS प्राची सिंह पर आरोप, विशाल सैनी केस में फिर उठी FIR और CBI जाँच की माँग
विशाल सैनी आत्महत्या मामले में UPHRC में नई शिकायत दायर। परिवार और शिकायतकर्ता संजय वर्मा ने IPS प्राची सिंह के खिलाफ FIR, स्वतंत्र जाँच और CBI जाँच की माँग दोहराई।
शिकायतकर्ता संजय वर्मा ने मानवाधिकार आयोग में लगाई गुहार, विभागीय क्लीन चिट पर उठाए सवाल
लखनऊ/अंबेडकर नगर। मार्च 2021 में लखनऊ में हुई संविदा कर्मी विशाल सैनी की आत्महत्या का मामला एक बार फिर चर्चा में है। उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग (UPHRC) में दायर एक विस्तृत शिकायत के माध्यम से शिकायतकर्ता संजय वर्मा ने तत्कालीन एडीसीपी (नॉर्थ) और वर्तमान में अंबेडकर नगर में तैनात IPS अधिकारी प्राची सिंह के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने तथा पूरे मामले की स्वतंत्र एजेंसी से जाँच कराने की माँग उठाई है। शिकायत के अनुसार विशाल सैनी उत्तर प्रदेश सचिवालय के भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग में संविदा पर कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में कार्यरत थे। परिवार का आरोप है कि 13 फरवरी 2021 को इंदिरा नगर क्षेत्र स्थित एक स्पा पार्लर पर हुई पुलिस छापेमारी के दौरान उन्हें कथित रूप से गलत तरीके से सेक्स रैकेट मामले में गिरफ्तार किया गया था, जबकि उनका उस गतिविधि से कोई संबंध नहीं था। परिजनों के अनुसार गिरफ्तारी, जेल और सामाजिक बदनामी के कारण विशाल गहरे मानसिक तनाव में चले गए। लगभग 20 दिन जेल में रहने के बाद जमानत पर रिहा हुए विशाल सैनी ने 10 मार्च 2021 की सुबह लखनऊ के रैदास मंदिर रेलवे क्रॉसिंग के पास ट्रेन के सामने कूदकर आत्महत्या कर ली।
सुसाइड नोट में लगाया था सीधा आरोप
मामले को सबसे अधिक संवेदनशील बनाने वाला पहलू मृतक द्वारा छोड़ा गया कथित सुसाइड नोट है। शिकायत में दावा किया गया है कि विशाल सैनी ने अपनी मृत्यु के लिए सीधे तौर पर IPS प्राची सिंह को जिम्मेदार ठहराया था। कथित सुसाइड नोट में लिखा गया था कि उन्हें झूठे सेक्स रैकेट मामले में फंसाकर उनका करियर और सामाजिक सम्मान नष्ट कर दिया गया। परिवार का कहना है कि यह सुसाइड नोट भारतीय साक्ष्य कानून के अंतर्गत मृत्युकालीन कथन (Dying Declaration) की श्रेणी में आता है और इसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
परिवार ने मांगी थी FIR और CBI जाँच
आत्महत्या के बाद विशाल सैनी के परिजनों ने अलीगंज थाने में IPS प्राची सिंह के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराने के लिए तहरीर दी थी। परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने उनकी शिकायत पर FIR दर्ज नहीं की। इसके बाद परिवार ने मामले की जाँच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराने की माँग उठाई थी। परिवार का तर्क रहा है कि जब मृतक ने अपने अंतिम पत्र में किसी अधिकारी का नाम लेकर आरोप लगाया है, तब मामले की स्वतंत्र जाँच आवश्यक है ताकि सच्चाई सामने आ सके।
पुलिस ने आरोपों को बताया था निराधार
दूसरी ओर लखनऊ पुलिस ने उस समय परिवार द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को निराधार बताया था। पुलिस का कहना था कि विशाल सैनी को स्पा पार्लर पर हुई छापेमारी के दौरान आपत्तिजनक परिस्थितियों में पकड़ा गया था और उनके विरुद्ध की गई कार्रवाई उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर की गई थी। पुलिस ने यह भी कहा था कि सुसाइड नोट में लगाए गए आरोपों के आधार पर कोई आपराधिक मामला दर्ज करने का आधार नहीं बनता और इसलिए FIR दर्ज नहीं की गई।
वरिष्ठ IPS अधिकारी ने भी उठाए थे सवाल
मामले ने उस समय तब और अधिक ध्यान आकर्षित किया जब पूर्व वरिष्ठ IPS अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने सार्वजनिक रूप से पुलिस की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाए थे। उन्होंने कहा था कि यदि किसी व्यक्ति ने आत्महत्या से पूर्व किसी अधिकारी का नाम लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं तो उन आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच होना आवश्यक है।
मानवाधिकार आयोग में नई शिकायत
अब शिकायतकर्ता संजय वर्मा ने उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग के समक्ष प्रस्तुत शिकायत में कहा है कि विभागीय स्तर पर दी गई कथित क्लीन चिट पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। शिकायत में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया है कि स्वेच्छा से लिखा गया मृत्युकालीन कथन अत्यंत महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जाता है। शिकायतकर्ता ने आयोग से माँग की है कि मामले का स्वतः संज्ञान लेकर मूल केस डायरी, छापेमारी से जुड़े डिजिटल साक्ष्य, CCTV फुटेज और अन्य अभिलेख तलब किए जाएं तथा किसी स्वतंत्र या न्यायिक एजेंसी से जाँच कराई जाए।
अब आयोग के निर्णय पर नजर
विशाल सैनी आत्महत्या प्रकरण में एक पक्ष पुलिस कार्रवाई को विधिसम्मत बताता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे कथित पुलिस उत्पीड़न और न्याय से वंचित किए जाने का मामला मानता है। ऐसे में अब सभी की निगाहें उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग पर टिकी हैं कि वह इस बहुचर्चित मामले में क्या रुख अपनाता है और शिकायत में उठाए गए सवालों पर क्या कार्रवाई करता है।
(नोट: इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप शिकायतकर्ता एवं मृतक के परिजनों द्वारा लगाए गए हैं। इन आरोपों की अंतिम सत्यता का निर्धारण सक्षम न्यायिक अथवा वैधानिक जाँच के बाद ही संभव होगा।)
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