मुक्तांचल के 50वें अंक का लोकार्पण एवं 'साहित्यिक अड्डा' संपन्न
हावड़ा में मुक्तांचल पत्रिका के स्वर्णिम 50वें अंक ‘कलकत्ता से कोलकाता’ का भव्य लोकार्पण संपन्न हुआ। डॉ. शंभुनाथ, डॉ. अमरनाथ सहित अनेक साहित्यकारों ने कोलकाता की साहित्यिक विरासत, सांस्कृतिक परिवर्तन और हिंदी साहित्य पर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए।
कोलकाता के साहित्यकारों ने कोलकाता की सांस्कृतिक विरासत, हिंदी साहित्य और समकालीन चुनौतियों पर रखे विचार
हावड़ा, 12 जुलाई। विद्यार्थी मंच एवं मुक्तांचल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 'मुक्तांचल' के 50वें (स्वर्णिम) अंक का लोकार्पण समारोह एवं साहित्यिक अड्डा हावड़ा में संपन्न हुआ। ‘कलकत्ता से कोलकाता’ विषय पर केंद्रित इस विशेष अंक के विमोचन के अवसर पर कोलकाता के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, आलोचकों, शिक्षाविदों, रंगकर्मियों, पत्रकारों एवं युवा रचनाकारों ने साहित्य, संस्कृति, इतिहास और समाज के विविध आयामों पर गंभीर विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुक्तांचल की संपादक एवं विद्यार्थी मंच की अध्यक्ष डॉ. मीरा सिन्हा के स्वागत वक्तव्य से हुआ। उन्होंने कहा कि कलकत्ता से कोलकाता पर आधारित इस विशेष अंक में देश और काल की यात्रा है, बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से 21वीं सदी के प्रथमार्थ तक के समय में इस महानगर ने कई तेवर बदलें हैं। निरंतर प्रवाहित होने वाली समय की नदी आज भी साहित्य-संस्कृति और कला को जीवंत कर रही है। दो सदियों के बीच की संक्रांति की डोर थामे, अतीत और वर्तमान की विविध गतिविधियों, व्यक्तित्वों तथा उनसे जुड़े कृतित्वों को समेटने का एक सार्थक प्रयास है मुक्तांचल का यह विशेष अंक ‘कलकत्ता से कोलकाता’।
साहित्यिक विरासत को जीवित रखने का प्रयास
प्रख्यात विचारक व आलोचक डॉ. शंभुनाथ ने मुक्तांचल की निरंतरता की सराहना करते हुए कहा कि किसी साहित्यिक पत्रिका का पचास अंकों तक लगातार प्रकाशित होना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने सिन्हा बाड़ी की ऐतिहासिक साहित्यिक परंपरा, हावड़ा के साहित्यिक आंदोलनों, आपातकाल विरोधी सम्मेलनों, जन-सांस्कृतिक अभियानों और हिंदी साहित्य के संघर्षशील इतिहास को याद करते हुए कहा कि हावड़ा केवल एक शहर नहीं, बल्कि साहित्यिक प्रतिरोध की भूमि रहा है। उन्होंने कहा कि मोबाइल युग में लोग जुड़े अवश्य हैं, लेकिन रिश्ते कमजोर हुए हैं। ऐसे साहित्यिक आयोजन संवाद और आत्मीयता को पुनर्जीवित करते हैं।
कोलकाता की बदलती सांस्कृतिक चेतना पर चिंता
प्रसिद्ध आलोचक डॉ. अमरनाथ ने अपने वक्तव्य में कोलकाता की सांस्कृतिक यात्रा को स्मरण करते हुए कहा कि जिस बंगाल को कभी सांस्कृतिक नेतृत्व के लिए जाना जाता था, वहाँ आज सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों में तेजी से परिवर्तन दिखाई देता है। उन्होंने मुक्तांचल के वर्तमान स्वरूप की विशेष सराहना करते हुए कहा कि प्रारंभिक अंकों की तुलना में आज पत्रिका अत्यंत परिपक्व, गंभीर और संग्रहणीय बन चुकी है। उन्होंने डॉ. मीरा सिन्हा के समर्पण और संपादकीय दृष्टि की मुक्तकंठ से प्रशंसा की।
'हर व्यक्ति का अपना कलकत्ता'
डॉ. अमित कुमार ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना-अपना कलकत्ता होता है। किसी के लिए यह संघर्ष का शहर है, किसी के लिए संस्कृति का, किसी के लिए बाजार का और किसी के लिए मानवीय संवेदनाओं का नगर। उन्होंने कहा कि यह शहर केवल भूगोल नहीं, बल्कि विचार, प्रतिरोध और सांस्कृतिक विविधता का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने मुक्तांचल के आगामी विशेषांकों की योजनाओं की भी सराहना की और इसे गंभीर संपादकीय अनुशासन का उदाहरण बताया।
साहित्यिक स्मृतियों का साझा मंच
कार्यक्रम में डॉ. पंकज साहा, महेश जायसवाल, मृत्युंजय श्रीवास्तव, डॉ. चित्रा माली, शर्मीला जालान, सुरेश शॉ, प्रकाश अग्रवाल, डॉ. विजया सिंह, जितेंद्र जितांशु, मीनाक्षी सांगनेरिया, विनय जायसवाल तथा दिव्या प्रसाद सहित अनेक वक्ताओं ने कोलकाता के साहित्यिक इतिहास, स्त्री विमर्श, सांस्कृतिक परिवर्तन, रंगमंच, पत्रकारिता, हिंदी साहित्य, सामाजिक चेतना तथा शहर की बदलती पहचान पर अपने अनुभव साझा किए। वक्ताओं ने इस बात पर विशेष बल दिया कि कोलकाता आज भी भारतीय बहुलतावादी संस्कृति, लोकतांत्रिक विमर्श और साहित्यिक संवाद का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है, यद्यपि समकालीन चुनौतियाँ लगातार सामने हैं।
वरिष्ठ कथाकार, शिक्षाक एवं विद्यार्थियों ने बाँधा समां
वरिष्ठ ग़ज़लकार सेराज ख़ान बातिश ने समकालीन सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों पर आधारित नई ग़ज़लों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। विद्यार्थी मंच के सचिव व शिक्षक विवेक लाल ने अरुण कमल की चर्चित कविता ‘जाऊँगा मैं जाऊँगा कोलकाता जाऊँगा’ का सस्वर पाठ कर सामाजिक अन्याय के विरूद्ध प्रतिरोध का संदेश दिया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने भी अपनी सृजनात्मक प्रतिभा का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। रागिनी पांडेय एवं स्वराज पांडेय ने कैलाश गौतम की रचनाओं का पाठ किया। सुकन्या तिवारी, राव्या श्रीवास्तव ने शिवमंगल सिंह 'सुमन' की कविताओं का प्रभावशाली पाठ किया। रोहित शर्मा ने अपनी स्वरचित कविता प्रस्तुत की।
‘अंत नहीं, अंतिम नहीं, कुछ भी’ का भव्य लोकार्पण
इस अवसर पर गाथा प्रकाशन से प्रकाशित चौथे तार सप्तक के वरिष्ठ कवि राजकुमार कुंभज के नवीन कविता-संग्रह ‘अंत नहीं, अंतिम नहीं, कुछ भी’ का लोकार्पण किया गया। उपस्थित साहित्यकारों ने इसे समकालीन हिंदी कविता में मानवीय संवेदना और जनपक्षधर चेतना का महत्वपूर्ण हस्ताक्षर बताते हुए इसका स्वागत किया।
अतिथियों ने दी शुभकामनाएँ
इस अवसर पर वरिष्ठ समाजसेवी व साहित्यप्रेमी रामनिवास द्विवेदी ने डॉ. मीरा सिन्हा के साहित्यिक समर्पण और निरंतर सक्रियता की सराहना करते हुए कहा कि मुक्तांचल जैसी पत्रिका साहित्यिक संस्कृति को नई ऊर्जा प्रदान कर रही है।
कार्यक्रम का सफल संचालन विद्यार्थी मंच के उप-सचिव विनोद यादव ने किया। अंत में मुक्तांचल के प्रबंध संपादक सुशील कुमार पांडेय ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, विद्यार्थियों एवं उपस्थित साहित्यप्रेमियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यकार, शोधार्थी, पत्रकार, रंगकर्मी एवं साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।
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