सूचना का प्रहरी या प्रक्रिया का किला? सूचना आयुक्त राकेश कुमार की कार्यशैली पर उठते गंभीर सवाल
सूचना आयुक्त राकेश कुमार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल। क्या उत्तर प्रदेश सूचना आयोग सूचना दिलाने के बजाय तकनीकी निस्तारण केंद्र बनता जा रहा है?
उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग में सूचना आयुक्त राकेश कुमार के समक्ष पारित कुछ आदेशों, लंबित अपीलों की सुनवाई प्रक्रिया तथा आवेदकों की शिकायतों ने आयोग की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। आरोप हैं कि नागरिकों द्वारा मांगी गई सूचनाओं के मूल प्रश्नों पर विचार करने के बजाय तकनीकी आधारों को प्राथमिकता दी जा रही है, कारणयुक्त आदेशों का अभाव है, तथा सूचना उपलब्ध कराने की संवैधानिक भावना कमजोर पड़ रही है। यह मामला किसी एक आवेदक तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि उस व्यापक संकट की ओर संकेत करता है जहाँ सूचना आयोग जैसी संस्था से भी नागरिकों का भरोसा डगमगाने लगे।
सूचना आयोग का उद्देश्य क्या है?
सूचना आयोग किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में वह मंच है जहाँ नागरिक तब पहुँचता है जब विभाग सूचना देने से इनकार कर दे, टालमटोल करे, या अधूरी सूचना दे। यानी आयोग नागरिक और प्रशासन के बीच अंतिम वैधानिक मंच है। पारदर्शिता का प्रहरी है। जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली संस्था है। लेकिन जब उसी संस्था की कार्यशैली पर सवाल उठने लगें, तो चिंता स्वाभाविक है।
राकेश कुमार के आदेशों पर विवाद क्यों?
सूचना आयुक्त राकेश कुमार से जुड़े कुछ मामलों में आवेदकों ने आरोप लगाए हैं कि सूचना के मूल मुद्दों पर पर्याप्त विचार नहीं हुआ, तकनीकी कारणों से अपीलें खारिज की गईं, आदेशों में अपेक्षित स्पष्टता नहीं रही, मांगी गई सूचना की प्रकृति और जनहित को कम महत्व दिया गया। कुछ प्रकरणों में आवेदकों का कहना है कि वे पुलिस प्रशासन, शिकायतों पर कार्रवाई, एफआईआर, CCTV रिकॉर्ड, गिरफ्तारी प्रक्रिया और अधिकारियों की जवाबदेही जैसी गंभीर सूचनाएँ मांग रहे थे, लेकिन सुनवाई का फोकस आवेदन की तकनीकी संरचना पर चला गया।
जब सवाल गंभीर हों और जवाब तकनीकी
एक प्रमुख शिकायत यह रही कि नागरिक प्रशासनिक जवाबदेही पूछ रहा था, लेकिन व्यवस्था शब्द गिन रही थी। यदि कोई आवेदक यह जानना चाहता है शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई?, कौन अधिकारी जिम्मेदार था?, FIR पर क्या प्रगति हुई?, CCTV रिकॉर्ड सुरक्षित है या नहीं?, किन आदेशों पर गिरफ्तारी हुई? तो अपेक्षा होती है कि आयोग मूल सूचना उपलब्ध कराने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाए। लेकिन, यदि ऐसे मामलों में केवल प्रक्रियात्मक या तकनीकी बिंदुओं पर निस्तारण हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
देरी, लंबित मामले और नागरिक की थकान
RTI कानून समयबद्ध सूचना का अधिकार देता है। लेकिन जब अपीलें महीनों लंबित रहें, आदेशों की प्रतिलिपि देर से मिले, बार-बार अनुस्मारक भेजने पड़ें, सुनवाई के बाद भी स्पष्ट राहत न मिले, तो नागरिक का भरोसा टूटता है। कई आवेदक यह अनुभव साझा करते हैं कि सूचना मांगने के बाद वास्तविक लड़ाई विभाग से नहीं, प्रक्रिया से शुरू होती है।
आयोग की विश्वसनीयता पर असर
यदि सूचना आयोग के प्रति यह धारणा बने कि नागरिक की बात कम सुनी जाती है, प्रशासनिक सुविधा अधिक देखी जाती है, सूचना देने की जगह अपील निस्तारण प्राथमिकता है, तो इसका सीधा असर संस्था की साख पर पड़ता है। सूचना आयोग का अस्तित्व सिर्फ फाइल बंद करने के लिए नहीं, बल्कि सूचना दिलाने के लिए है।
क्या कारणयुक्त आदेश पर्याप्त हैं?
कानूनी सिद्धांत कहता है कि हर निर्णय reasoned होना चाहिए अर्थात क्या तथ्य थे, क्या कानून लागू हुआ, क्यों निर्णय लिया गया, आवेदक की आपत्तियों पर क्या विचार हुआ। यदि आदेश संक्षिप्त, अस्पष्ट या सतही प्रतीत हों, तो अपीलकर्ता में असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।
संवैधानिक परिप्रेक्ष्य
सूचना का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा अधिकार माना जाता है। यानी सूचना सिर्फ कागज़ नहीं, लोकतंत्र की ऑक्सीजन है। जब सूचना रोकी जाती है तो भ्रष्टाचार छिपता है, जवाबदेही घटती है, नागरिक निर्बल होता है, सत्ता मजबूत होती है, इसलिए सूचना आयोग की भूमिका सामान्य प्रशासनिक संस्था से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
क्या सुधार आवश्यक हैं?
1. नागरिक-अनुकूल दृष्टिकोण: तकनीकी कमियों के बावजूद जनहित मामलों में सहायता आधारित रुख अपनाया जाए।
2. कारणयुक्त विस्तृत आदेश: हर आदेश में तथ्य, तर्क और कानून स्पष्ट हों।
3. समयबद्ध अनुपालन: आदेश पारित होने के बाद सूचना वास्तविक रूप से मिले।
4. डिजिटल पारदर्शिता: सभी आदेश, सुनवाई तिथि, अनुपालन स्थिति सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध हो।
5. प्रदर्शन ऑडिट: कितने मामलों में सूचना मिली, कितनों में सिर्फ निस्तारण हुआ, यह सार्वजनिक हो।
सूचना आयोग यदि नागरिक को राहत देने के बजाय प्रक्रिया का किला बन जाए, तो लोकतंत्र में दरार पड़ती है। नागरिक आयोग के पास इसलिए नहीं जाता कि उसे और निराशा मिले। वह वहाँ इसलिए जाता है कि उसे न्याय मिले, जवाब मिले, और व्यवस्था जवाबदेह बने। सूचना आयुक्त राकेश कुमार की कार्यशैली पर उठ रहे सवाल केवल व्यक्तिगत आलोचना नहीं हैं; वे पूरे सूचना तंत्र के स्वास्थ्य का संकेत हैं। यदि आयोग जनता का विश्वास खो देता है, तो RTI कानून की शक्ति कमजोर पड़ जाती है। अब समय है कि सूचना आयोग स्वयं को पुनः नागरिकों के प्रति उत्तरदायी सिद्ध करे।
What's Your Reaction?

