न्याय नहीं, तारीखों का गणराज्य: क्या भारत मुकदमेबाजी के दलदल में फँस चुका है?

भारत में 5 करोड़ लंबित मुकदमे केवल न्यायिक समस्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था के लिए बड़ा संकट हैं।

Jun 2, 2026 - 08:20
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न्याय नहीं, तारीखों का गणराज्य: क्या भारत मुकदमेबाजी के दलदल में फँस चुका है?
न्याय नहीं, तारीखों का गणराज्य

न्याय नहीं, तारीखों का गणराज्य: मुकदमों का संकट

भारत में पाँच करोड़ से अधिक लंबित मुकदमे केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और सामाजिक न्याय के लिए गंभीर संकट बन चुके हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनवाई को संक्षिप्त और प्रभावी बनाने के लिए जारी नई प्रक्रिया (SOP) न्यायिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन असली प्रश्न यह है कि मुकदमे कम कैसे हों? जब पुलिस, प्रशासन, कानून और न्यायिक प्रक्रिया स्वयं मुकदमे पैदा करने वाली संरचना का हिस्सा बन जाएँ, तब केवल अदालतों की गति बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। आवश्यकता न्यायिक पारदर्शिता, पुलिस सुधार, एआई आधारित निगरानी और झूठे मुकदमों पर कठोर दंड की है।

क्या भारत मुकदमेबाजी के दलदल में फँस चुका है?

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि संविधान प्रत्येक नागरिक को न्याय का अधिकार देता है, लेकिन न्याय की राह में खड़ी व्यवस्था स्वयं सबसे बड़ी बाधा बनती जा रही है। आज देश की अदालतों में पाँच करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। यदि प्रत्येक मुकदमे से औसतन पाँच लोगों का परिवार प्रभावित माना जाए, तो लगभग 50 करोड़ भारतीय प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मुकदमेबाजी की पीड़ा झेल रहे हैं। यह संख्या केवल आँकड़ा नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय त्रासदी है।

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई की प्रक्रिया को अधिक संक्षिप्त और केंद्रित बनाने की पहल की है। वकीलों को सीमित पृष्ठों की सिनॉप्सिस देने, सुनवाई के लिए समय-सीमा निर्धारित करने और अनावश्यक लंबी बहसों को नियंत्रित करने जैसे कदम स्वागतयोग्य हैं। किंतु प्रश्न यह है कि क्या इससे न्याय व्यवस्था की जड़ समस्या हल हो जाएगी?

सचाई यह है कि भारत की समस्या केवल ‘पेंडेंसी’ नहीं है, बल्कि ‘मुकदमेबाजी की संस्कृति’ है। हमने ऐसा समाज निर्मित कर लिया है जहाँ विवादों के समाधान की बजाय मुकदमे दायर करना, एफआईआर करवाना, धाराएँ बढ़वाना, नाम जोड़वाना या हटवाना एक समानांतर उद्योग का रूप ले चुका है। न्याय का उद्देश्य विवाद समाप्त करना था, लेकिन व्यवस्था ने विवादों को ही जीविका का साधन बना दिया है।

सबसे चिंताजनक स्थिति जिला अदालतों की है, जहाँ देश के अधिकांश मुकदमे लंबित हैं। वहाँ तारीखें अधिक हैं, सुनवाई कम। अनेक मामलों में गवाह उपस्थित नहीं होते, पुलिस अधूरी या अनावश्यक रूप से विस्तृत चार्जशीट दाखिल करती है, और न्यायाधीशों पर कार्यभार इतना अधिक होता है कि एक मुकदमे की वास्तविक सुनवाई वर्षों तक प्रारंभ ही नहीं हो पाती। परिणामस्वरूप न्याय प्रक्रिया स्वयं दंड में बदल जाती है। इसका सामाजिक प्रभाव अत्यंत भयावह है। भूमि विवादों से उत्पन्न शत्रुताएँ पीढ़ियों तक चलती हैं। परिवार आर्थिक रूप से टूट जाते हैं। निर्दोष लोग वर्षों जेलों में बंद रहते हैं। मुकदमों की लंबी अवधि भ्रष्टाचार को जन्म देती है क्योंकि लोग न्याय की प्रतीक्षा करने की बजाय समझौते, दबाव और रिश्वत के रास्ते खोजने लगते हैं। थानों और तहसीलों के बाहर पैदा हुई यह समानांतर व्यवस्था लोकतंत्र की आत्मा को खोखला कर रही है। ऐसे समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एक क्रांतिकारी उपकरण बन सकती है। यदि प्रत्येक अदालत की कार्यवाही का स्वचालित ट्रांसक्रिप्ट तैयार हो, तो जनता यह देख सकेगी कि किसी मुकदमे में वास्तव में क्या हुआ। कितनी बार सुनवाई हुई? कितनी बार केवल तारीख मिली? किस पक्ष ने देरी की? यह पारदर्शिता न्यायिक जवाबदेही की नई संस्कृति विकसित कर सकती है। आज लाइव स्ट्रीमिंग से अधिक आवश्यकता न्यायिक कार्यवाहियों के विश्वसनीय डिजिटल रिकॉर्ड की है। लेकिन तकनीक अकेले समाधान नहीं है। पुलिस सुधारों के बिना न्यायिक सुधार अधूरे रहेंगे। जब तक झूठी एफआईआर दर्ज करने वालों, दुर्भावनापूर्ण मुकदमे दायर करने वालों और गलत शपथपत्र देने वालों पर कठोर दंड नहीं होगा, तब तक अदालतों पर बोझ कम नहीं होगा। मुकदमे दर्ज करने की प्रक्रिया जितनी सरल है, झूठे मुकदमे के लिए जवाबदेही उतनी ही दुर्लभ है।

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न न्यायिक लेखन का है। भारत में कई बार निर्णय सैकड़ों पृष्ठों के होते हैं, जिनमें मूल प्रश्न कहीं खो जाता है। दुनिया के विकसित लोकतंत्रों में संक्षिप्त, स्पष्ट और निर्णायक फैसलों की परंपरा है। न्याय की गुणवत्ता उसके पृष्ठों की संख्या से नहीं, बल्कि उसकी स्पष्टता और प्रभावशीलता से मापी जानी चाहिए।

वास्तविक सुधार तब होगा जब न्यायपालिका अपने भीतर भी जवाबदेही की संस्कृति विकसित करेगी। प्रत्येक मुकदमे में सुनवाई की संख्या, देरी के कारण और न्यायाधीशों की कार्यक्षमता का पारदर्शी मूल्यांकन होना चाहिए। जिस प्रकार प्रशासनिक अधिकारियों की वार्षिक समीक्षा होती है, उसी प्रकार न्यायिक प्रशासन के लिए भी प्रभावी निगरानी तंत्र आवश्यक है। भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसे यह निर्णय लेना है कि वह ‘तारीखों का गणराज्य’ बना रहेगा या ‘न्याय का गणराज्य’ बनेगा। अदालतों में लंबित मुकदमे केवल कानूनी फाइलें नहीं हैं; वे करोड़ों लोगों के टूटे हुए सपने, रुके हुए जीवन और अधूरे अधिकार हैं। न्याय में विलंब केवल न्याय का इनकार नहीं है; यह लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न है।

यदि न्यायपालिका, सरकार, पुलिस और समाज मिलकर मुकदमेबाजी की संस्कृति को चुनौती देने का साहस नहीं दिखाते, तो आने वाले वर्षों में लंबित मुकदमों का पहाड़ और ऊँचा होगा। लेकिन यदि पारदर्शिता, तकनीक, जवाबदेही और न्याय-केंद्रित सुधारों को अपनाया गया, तो संभव है कि भारत सचमुच उस संवैधानिक वादे के करीब पहुँचे जिसे हम ‘सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय’ कहते हैं।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I