भारतीय भाषा परिषद में प्रथम साहित्य व्याख्यानमाला आयोजित
भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता की प्रथम साहित्य व्याख्यानमाला में प्रो. वेदरमण ने कहा कि स्वतंत्र चिंतन ही श्रेष्ठ इतिहास लेखन की आधारशिला है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के योगदान पर हुआ विमर्श।
इतिहास लेखन के लिए स्वतंत्र दृष्टि जरूरी: प्रो. वेदरमण
कोलकाता, 18 जुलाई। भारतीय भाषा परिषद के पुस्तकालय में आयोजित प्रथम साहित्य व्याख्यानमाला में इतिहास लेखन और साहित्य की स्वतंत्र दृष्टि पर गंभीर विमर्श हुआ। उद्घाटन व्याख्यान देते हुए प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. वेदरमण ने कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल का ऐतिहासिक ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ अपनी जन्मशती के निकट है और आज भी इतिहास लेखन के लिए स्वतंत्र चिंतन का महत्वपूर्ण मानदंड प्रस्तुत करता है।
उन्होंने कहा कि लगभग एक शताब्दी पूर्व लिखी गई इस कृति को लाखों पाठकों ने पढ़ा है। यह ग्रंथ स्पष्ट करता है कि इतिहास और साहित्य का श्रेष्ठ लेखन स्वतंत्र दृष्टि से ही संभव है, जबकि राजाश्रय में लिखा गया साहित्य वस्तुनिष्ठता खो देता है।
प्रो. वेदरमण ने अपने व्याख्यान में कहा कि जहाँ पश्चिमी चिंतन ने मनुष्य को केंद्र में रखा, वहीं आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने प्रकृति, पशु-पक्षियों, वृक्षों और पर्यावरण को भी समान महत्व दिया। उन्होंने लोकधर्म, लोकजीवन और साहित्यिक विविधता को भारतीय साहित्य की मूल शक्ति बताया। उनके अनुसार शुक्ल के इतिहास लेखन की सबसे बड़ी कसौटी सत्यनिष्ठा है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में भारतीय भाषा परिषद की ओर से आशीष झुनझुनवाला ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि परिषद का पुस्तकालय विद्यार्थियों और युवा शोधार्थियों के ज्ञान-विस्तार के उद्देश्य से प्रत्येक माह साहित्यिक व्याख्यानमाला आयोजित करेगा।
व्याख्यान के पश्चात विद्यार्थियों एवं साहित्यप्रेमियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। इशरत जहां, पॉली रानी राउत सहित अन्य प्रतिभागियों ने विषय से संबंधित जिज्ञासाएँ प्रस्तुत कीं, जिनका वक्ताओं ने विस्तार से समाधान किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शंभुनाथ ने कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल के साहित्य-इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने उस समय हिंदी को 'गंवारू भाषा' मानने वाली धारणाओं का सशक्त प्रतिवाद किया और हिंदी के लगभग एक हजार वर्षों की समृद्ध साहित्यिक परंपरा को व्यवस्थित रूप से सामने रखा। उन्होंने ब्रजभाषा, अवधी, मैथिली, भोजपुरी और बुंदेलखंडी जैसी लोकभाषाओं के साहित्य को हिंदी साहित्य के इतिहास का अभिन्न अंग बनाया, जिससे लाखों विद्यार्थियों और शोधार्थियों को लाभ मिला।
कार्यक्रम के अंत में परिषद की ओर से बिमला पोद्दार ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया।
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