विद्यासागर विश्वविद्यालय में डॉ. नंदिनी साहू का एकल व्याख्यान
विद्यासागर विश्वविद्यालय में डॉ. नंदिनी साहू ने ‘भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुवाद में बौद्धिक संपदा अधिकार की भूमिका’ विषय पर एकल व्याख्यान दिया। कार्यक्रम में कुलपति एवं शिक्षाविदों ने IPR के महत्व पर जोर दिया।
भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुवाद में बौद्धिक संपदा अधिकार की भूमिका पर सारगर्भित विमर्श
19 फरवरी, मिदनापुर। विद्यासागर विश्वविद्यालय के राधाकृष्णन हॉल में गुरुवार को एक महत्वपूर्ण अकादमिक आयोजन हुआ, जिसमें डॉ. नंदिनी साहू, हावड़ा स्थित हिंदी विश्वविद्यालय की पहली महिला कुलपति ने ‘भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुवाद में बौद्धिक संपदा अधिकार की भूमिका’ विषय पर अपना एकल व्याख्यान दिया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. जयंत किशोर नंदी, भाषा विभाग के अध्यक्ष, विभिन्न संकाय सदस्य, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
विषय की प्रासंगिकता पर जोर
डॉ. साहू ने अपने व्याख्यान में कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोक, आदिवासी और मौखिक परंपराओं में भी समृद्ध रूप से विद्यमान है। इन ज्ञान-संपदाओं के अनुवाद में बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, ताकि मूल स्रोतों और समुदायों को उचित मान्यता और संरक्षण मिल सके।
कुलपति का संदेश
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दीपक कुमार कर ने अपने संदेश में डॉ. साहू को उनके प्रथम आमंत्रित संबोधन पर बधाई देते हुए कहा कि यह विषय वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक है, विशेषकर जब भारतीय ज्ञान परंपरा के वैश्विक पुनर्पाठ की प्रक्रिया चल रही है।
भविष्य के दिशा-निर्देशों की आवश्यकता
कार्यक्रम के संयोजक एवं सेंटर फॉर ट्रांसलेशन एंड फॉरेन लैंग्वेज स्टडीज़ के समन्वयक प्रोफेसर इंद्रनील आचार्य ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुवाद परियोजनाओं में IPR के उपयोग पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाने चाहिए। इससे आदिवासी और वंचित समुदायों के ज्ञान-भंडार का सही मूल्यांकन और संरक्षण सुनिश्चित किया जा सकेगा।
शोधार्थियों की सक्रिय भूमिका
इस आयोजन को सफल बनाने में हिंदी विभाग के शोधार्थियों और शिक्षकों की उल्लेखनीय भूमिका रही। कार्यक्रम ने अकादमिक समुदाय में भारतीय ज्ञान, अनुवाद और विधिक अधिकारों के अंतर्संबंध पर एक गंभीर विमर्श को जन्म दिया।
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