जमीन पर लिटाया… पैर पर कपड़ा रखकर गोली मारी

देवबंद जेल में ACGM निरीक्षण के दौरान कैदियों ने पुलिस पर फर्जी एनकाउंटर का आरोप लगाया। 30 जनवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी मुठभेड़ों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, राज्य कानून से चलता है, बंदूक से नहीं। मामले ने प्रदेश में नई बहस छेड़ दी है।

Feb 17, 2026 - 23:08
Feb 17, 2026 - 23:09
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जमीन पर लिटाया… पैर पर कपड़ा रखकर गोली मारी
देवबंद जेल में ACGM व कैदी

देवबंद जेल में ACGM के सामने कैदियों के आरोप; 30 जनवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी से मामला और गंभीर

न्यायिक निरीक्षण के दौरान उठे आरोप

उत्तर प्रदेश के देवबंद स्थित देवबंद उपकारागार में न्यायिक निरीक्षण के दौरान कुछ विचाराधीन बंदियों ने गंभीर आरोप लगाए। निरीक्षण के लिए पहुंचे ACJM न्यायालय के समक्ष बंदियों ने दावा किया कि जिस मुठभेड़के आधार पर उन्हें गिरफ्तार दिखाया गया, वह वास्तविक नहीं थी, बल्कि पूर्वनियोजित कार्रवाई थी।

बंदियों के अनुसार

·         उन्हें पहले पुलिस हिरासत में लिया गया,

·         जमीन पर लिटाया गया,

·         पैर पर कपड़ा रखकर गोली मारी गई,

·         बाद में इसे आत्मरक्षा में की गई मुठभेड़बताया गया।

इन आरोपों ने स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि प्रदेश स्तर पर भी चिंता बढ़ा दी है।

'हाफ एनकाउंटर' पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की कड़ी नाराज़गी

30 जनवरी 2026 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के 'हाफ एनकाउंटर' पर कड़ी नाराज़गी जताई, जिसमें आरोपियों के पैरों या एनकाउंटर के गैर-ज़रूरी हिस्सों में कथित तौर पर गोली मारी जाती है। कोर्ट ने साफ़ किया कि सज़ा देना कोर्ट का खास अधिकार है, पुलिस का नहीं, और प्रमोशन या सोशल मीडिया पर तारीफ़ के लिए बेवजह गोली चलाना एक खतरनाक ट्रेंड है।

कोर्ट की खास बातें

कोर्ट ने यूपी के DGP और होम सेक्रेटरी से पूछा कि क्या पुलिस अधिकारियों को पैरों में गोली मारने के लिए कोई बोलकर या लिखकर निर्देश दिए गए थे। यह टिप्पणी मिर्ज़ापुर के राजू उर्फ ​​राजकुमार समेत तीन आरोपियों की ज़मानत याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई, जहाँ पुलिसवालों के घायल होने पर हथियारों के इस्तेमाल पर सवाल उठाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का उल्लंघन पाया गया, जैसे कि पीड़ित का बयान मजिस्ट्रेट या मेडिकल ऑफिसर के सामने रिकॉर्ड करना।

पुलिस की जिम्मेदारी

कोर्ट ने निर्देश के उल्लंघन के लिए SP और SSP को निजी तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया। भारत को 'पुलिस स्टेट' नहीं बनने देने का संकल्प लिया, डेमोक्रेटिक शासन पर ज़ोर दिया। UP पुलिस के इस तरीके को सीनियर अधिकारियों को खुश करने या 'सबक सिखाने' की चाल बताया गया।

राजनीतिक टिप्पणी

कोर्ट की टिप्पणी के बाद समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश पुलिस और सरकार पर निशाना साधा। यह मामला UP में एनकाउंटर पॉलिसी को लेकर पॉलिटिकल विवाद को हवा दे रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का संदर्भ

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) मामले में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिनमें

·         प्रत्येक एनकाउंटर पर FIR दर्ज करना,

·         स्वतंत्र एजेंसी से जांच,

·         मजिस्ट्रियल जांच,

·         NHRC को सूचना देना,

·         फोरेंसिक पोस्टमार्टम रिपोर्ट की पारदर्शिता जैसे प्रावधान शामिल हैं।

देवबंद मामले में यदि बंदियों के आरोपों की पुष्टि होती है, तो इन दिशा-निर्देशों के अनुपालन की जांच अनिवार्य होगी।

प्रशासनिक और कानूनी संभावनाएँ

सूत्रों के अनुसार

·         मजिस्ट्रेट ने बंदियों के बयान दर्ज किए हैं;

·         संबंधित थाना और पुलिस अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी जा सकती है;

·         मेडिकल और बैलिस्टिक रिपोर्ट की पुनः समीक्षा संभव है;

·         आवश्यकता पड़ने पर SIT या विशेष जांच टीम गठित की जा सकती है।

यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो संबंधित अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज हो सकता है।

व्यापक बहस: एनकाउंटर बनाम न्यायिक प्रक्रिया

उत्तर प्रदेश में हाल के वर्षों में मुठभेड़ों को लेकर व्यापक राजनीतिक और सामाजिक बहस चलती रही है। सरकार अपराध नियंत्रण की दृष्टि से इसे आवश्यक कार्रवाई बताती है, जबकि मानवाधिकार संगठन पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करते हैं। देवबंद जेल में कैदियों द्वारा लगाए गए आरोप और 30 जनवरी को हाईकोर्ट की टिप्पणी दोनों मिलकर यह संकेत देते हैं कि न्यायपालिका इस विषय को अत्यंत गंभीरता से देख रही है।

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