कड़ाके की ठंड में बदायूं के सरकारी अस्पताल की फर्श पर प्रसव
बदायूं के सरकारी अस्पताल में कड़ाके की ठंड के बीच फर्श पर प्रसव की घटना ने यूपी की स्वास्थ्य व्यवस्था और ‘राम राज्य’ के दावों पर गंभीर सवाल खड़े किए। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
उत्तर प्रदेश के बदायूं में कड़ाके की ठंड के बीच एक गर्भवती महिला ने सरकारी अस्पताल की फर्श पर बच्चे को जन्म दिया, यह घटना राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। सरकार के ‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘राम राज्य’ जैसे दावों के उलट, यह मामला बताता है कि प्रसूति सेवाओं की उपलब्धता, मानवीय संवेदनशीलता और त्वरित चिकित्सा हस्तक्षेप में अब भी गहरी खामियाँ मौजूद हैं। स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, समय पर स्ट्रेचर/बेड और चिकित्सा कर्मियों की तत्परता न मिलने से महिला को फर्श पर प्रसव करना पड़ा।
घटना का विवरण
- ठंड के प्रकोप के बीच गर्भवती महिला दर्द में अस्पताल पहुँची।
- प्रसव कक्ष में समुचित व्यवस्था न होने/तुरंत सहायता न मिलने के कारण महिला को अस्पताल की फर्श पर ही प्रसव करना पड़ा।
- नवजात और माँ दोनों के लिए यह स्थिति स्वास्थ्य जोखिम से भरी रही।
- अस्पताल प्रबंधन की ओर से तत्काल राहत और जवाबदेही को लेकर स्पष्टता का अभाव दिखा।
महत्वपूर्ण: यह रिपोर्ट स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारियों और प्रत्यक्षदर्शी कथनों पर आधारित है। प्रशासनिक जाँच के निष्कर्ष आने पर तथ्यात्मक अद्यतन अपेक्षित है।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठते सवाल
1. प्रसूति सेवाएँ: क्या जिला अस्पतालों में 24×7 प्रसूति तैयारी और स्टाफिंग वास्तव में सुनिश्चित है?
2. इमरजेंसी रिस्पॉन्स: दर्द में पहुँची गर्भवती के लिए त्वरित ट्रायेज क्यों नहीं?
3. इन्फ्रास्ट्रक्चर: सर्दी में बुनियादी सुविधा (बेड, कंबल, गरम वातावरण) क्यों नदारद?
4. जवाबदेही: जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी और कब?
राजनीतिक संदर्भ और नैरेटिव
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी अक्सर ‘सुशासन’ और ‘राम राज्य’ का दावा करती है। लेकिन बदायूं की यह तस्वीर उन दावों को चुनौती देती है, जहाँ मातृत्व जैसे संवेदनशील क्षण में भी व्यवस्था विफल दिखती है। यह घटना नीति-घोषणाओं और ज़मीनी अमल के बीच की खाई को रेखांकित करती है।
कानूनी व नैतिक आयाम
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के मानकों के तहत सुरक्षित प्रसव और गरिमामय देखभाल राज्य की जिम्मेदारी है।
- मानवाधिकार और गरिमा का प्रश्न-क्या ऐसी परिस्थितियाँ स्वीकार्य हैं?
- स्वतंत्र जाँच, दोषियों पर कार्रवाई और पीड़िता को मुआवजा, ये न्यूनतम अपेक्षाएँ हैं।
आगे क्या होना चाहिए?
- तत्काल स्वतंत्र जांच समिति का गठन
- जिम्मेदार कर्मियों/प्रबंधन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई
- सभी जिला अस्पतालों में प्रसूति-इमरजेंसी ऑडिट
- सर्दी/हीटवेव जैसी परिस्थितियों के लिए मौसमी प्रोटोकॉल
- पीड़िता व नवजात की फॉलो-अप चिकित्सा और सहायता
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