देवरिया न्यायालय में पेशी के दौरान अमिताभ ठाकुर ने आमरण अनशन का किया ऐलान
देवरिया न्यायालय में पेशी के दौरान अमिताभ ठाकुर ने जेल में आमरण अनशन पर होने की घोषणा की। गिरफ्तारी स्थल की CCTV फुटेज तत्काल सार्वजनिक करने की मांग से प्रशासन की पारदर्शिता पर सवाल।
देवरिया | विशेष रिपोर्ट : उत्तर प्रदेश की राजनीति और मानवाधिकार विमर्श में शुक्रवार को उस समय तीखी हलचल मच गई, जब आज़ाद अधिकार सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमिताभ ठाकुर ने देवरिया न्यायालय में पेशी के दौरान खुले शब्दों में कहा, “मैं जेल में आमरण अनशन पर हूँ।”
क्या है पूरा मामला?
अमिताभ ठाकुर, जो एक पूर्व IPS अधिकारी होने के साथ-साथ लंबे समय से मानवाधिकार, नागरिक स्वतंत्रता और राज्य सत्ता की जवाबदेही के सवाल उठाते रहे हैं, वर्तमान में न्यायिक हिरासत में हैं।
उनका आरोप है कि
- उनकी गिरफ्तारी न तो पारदर्शी थी,
- न ही संवैधानिक प्रक्रियाओं का पूर्ण पालन किया गया,
- और न ही गिरफ्तारी के समय उपलब्ध तकनीकी साक्ष्यों को सार्वजनिक किया जा रहा है।
इसी संदर्भ में उन्होंने आपको संबोधित एक पत्र में गिरफ्तारी स्थल की CCTV फुटेज तत्काल उपलब्ध कराने की माँग की है।
CCTV फुटेज की माँग क्यों अहम?
अमिताभ ठाकुर का कहना है कि CCTV फुटेज-
1. गिरफ्तारी की विधिसम्मतता (Legality) स्पष्ट करेगी
2. पुलिस के दावों और वास्तविक घटनाक्रम के बीच अंतर उजागर करेगी
3. यह तय करेगी कि बल प्रयोग, दबाव या अधिकारों का उल्लंघन हुआ या नहीं
उन्होंने अपने पत्र में यह भी स्पष्ट संकेत दिया है कि “यदि गिरफ्तारी पूरी तरह कानून के अनुसार हुई है, तो CCTV फुटेज देने में किसी प्रकार की हिचक क्यों?”
कानूनी जानकारों का मानना है कि CCTV फुटेज उपलब्ध न कराना या उसे नष्ट करना, सबूतों से छेड़छाड़ और लोक सेवक द्वारा कर्तव्य के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है।
आमरण अनशन: केवल विरोध नहीं, संवैधानिक चेतावनी
जेल के भीतर आमरण अनशन कोई साधारण विरोध नहीं माना जाता। संविधान और सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों के अनुसार-
- हिरासत में बंद व्यक्ति के जीवन और स्वास्थ्य की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य की होती है
- अनशन की स्थिति में प्रशासन को विशेष चिकित्सकीय निगरानी सुनिश्चित करनी होती है
आज़ाद अधिकार सेना के पदाधिकारियों का कहना है कि यह अनशन किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि “राज्य द्वारा असहमति की आवाज को दबाने की प्रवृत्ति के विरुद्ध अंतिम लोकतांत्रिक प्रतिरोध”
राजनीतिक प्रतिशोध या कानून का पालन?
इस पूरे घटनाक्रम ने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं-
- क्या सत्ता से सवाल पूछना अब अपराध की श्रेणी में आता है?
- क्या पुलिस और प्रशासन जवाबदेही से ऊपर होते जा रहे हैं?
- यदि एक पूर्व IPS अधिकारी के साथ यह स्थिति है, तो आम नागरिक की सुरक्षा कितनी सुनिश्चित है?
मानवाधिकार संगठनों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं का कहना है कि यह मामला राजनीतिक प्रतिशोध (Political Vendetta) के लक्षण दर्शाता है।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
अब तक-
- प्रशासन की ओर से CCTV फुटेज को लेकर कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है
- न ही आमरण अनशन की स्थिति पर कोई औपचारिक मेडिकल बुलेटिन जारी किया गया है
सूत्रों के अनुसार, मामला उच्च स्तर पर विचाराधीन है, लेकिन सार्वजनिक पारदर्शिता का अभाव ही इस विवाद को और गहरा कर रहा है।
मानवाधिकार बनाम राज्य सत्ता
यह प्रकरण अब एक व्यक्ति की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहा। यह टकराव है-
- नागरिक अधिकार बनाम राज्य शक्ति
- पारदर्शिता बनाम गोपनीयता
- लोकतांत्रिक असहमति बनाम दमनकारी कार्रवाई
अमिताभ ठाकुर का आमरण अनशन इस संघर्ष को नैतिक और संवैधानिक दोनों स्तरों पर तीखा कर रहा है।
आगे क्या?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार
- यदि CCTV फुटेज शीघ्र उपलब्ध नहीं कराई जाती,
- या अनशन की स्थिति में स्वास्थ्य सुरक्षा में चूक होती है,
तो यह मामला हाईकोर्ट, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंचों तक जा सकता है।
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