हावड़ा में सुर, शब्द और संतोष का संगम: पद्मश्री संतोष आनंद ने रचा भावनाओं का अमर उत्सव
हावड़ा के शरत सदन में आयोजित भव्य कवि सम्मेलन में पद्मश्री संतोष आनंद ने अपने अमर गीतों से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। कविता, ग़ज़ल और देशभक्ति से सजी इस संध्या ने साहित्य प्रेमियों को अविस्मरणीय अनुभव दिया।
हावड़ा, 15 फरवरी 2026। शहर के ऐतिहासिक शरत सदन मुख्य सभागार में रविवार की शाम शब्दों और सुरों के नाम रही। हिंदी साहित्य परिषद द्वारा आरआईएस सिक्यूरिटी लिमिटेड एवं कोल इण्डिया लिमिटेड के सहयोग से आयोजित इस विराट कवि सम्मेलन में देश के सुप्रसिद्ध गीतकार पद्मश्री संतोष आनंद मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। सभागार खचाखच भरा हुआ था और श्रोताओं में अद्भुत उत्साह देखने को मिला।
कार्यक्रम की शुरुआत परंपरागत दीप प्रज्वलन और माँ सरस्वती वंदना से हुई। डॉ. ज्योत्सना शर्मा की माँ सरस्वती की स्तुति ने वातावरण को आध्यात्मिक और सुरमय बना दिया। वंदना के पश्चात मंच संचालन ने कार्यक्रम को रोचक और जीवंत दिशा दी।
मंच संचालन और प्रारंभिक प्रस्तुतियाँ
मंच संचालकों ने अपने ओजपूर्ण और हास्यपूर्ण अंदाज से शुरुआत में ही श्रोताओं का मन जीत लिया। “आँसू और मुस्कान के बीच बहने वाली नदी” जैसे रूपकों के माध्यम से उन्होंने कवि सम्मेलन की भावभूमि तैयार की।
कवियों ने क्रमशः शृंगार, वीर, करुण और हास्य रस की रचनाओं का पाठ किया।
- कवयित्री प्रगति ठाकुर ने सीमा पर तैनात वीरों और उनकी प्रतीक्षा करती वीरांगनाओं की मनोदशा को गीत में ढाला - “सजन घर आ जाते एक बार…” जिसने सभागार को भावुक कर दिया।
- सामाजिक सरोकारों पर आधारित कविता में कवि आदित्य त्रिपाठी ने आतंकवाद और विस्फोट की घटनाओं पर तीखा सवाल उठाते हुए कहा, “धमाका अगर करना है तो ऐसा करो कि रोटियाँ बरसें।” इस पंक्ति पर जोरदार तालियाँ गूँजीं।
- गजलकार व कार्यकारी निदेशक, कोल इण्डिया लि. ओम प्रकाश मिश्र ने गाँव के छूटते जाने और शहर की ओर पलायन के दर्द को मार्मिक शब्द दिए, “मेरा गाँव मुंतजर है, अब भी वतन तुम्हारा…”
हास्य कवियों ने भी अपनी चुटीली शैली से श्रोताओं को खूब हँसाया। हल्के-फुल्के व्यंग्य और किस्सों ने माहौल को संतुलित बनाए रखा।
संतोष आनंद का आगमन: भावनाओं का ज्वार
जब संचालक ने पद्मश्री संतोष आनंद को मंच पर आमंत्रित किया तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। 87 वर्ष की आयु में भी उनका उत्साह और आत्मीयता देखकर लोग अभिभूत हो उठे।
उन्होंने मंच से कहा, “जिंदगी हर जगह नहीं होती, प्यार की जरूरत हर जगह होती है।”
इसके बाद जैसे ही उन्होंने अपने अमर गीत ‘एक प्यार का नगमा है…’ की पंक्तियाँ छेड़ीं, पूरा सभागार एक स्वर में उनके साथ गाने लगा। फिर ‘जिंदगी की ना टूटे लड़ी…’ और अन्य लोकप्रिय गीतों ने श्रोताओं को पुरानी स्मृतियों की दुनिया में पहुंचा दिया।
देशभक्ति गीतों के दौरान ‘भारत माता की जय’ के नारे गूँजे। उन्होंने तिरंगे और शहीदों को समर्पित पंक्तियाँ सुनाईं, जिन पर पूरा सभागार खड़ा हो गया।
आयोजन की विशेषताएँ
- माँ सरस्वती वंदना से आध्यात्मिक आरंभ
- हास्य, गजल, शृंगार और ओज का संतुलित संयोजन
- सामाजिक सरोकारों से जुड़ी समकालीन रचनाएँ
- संतोष आनंद के गीतों पर सामूहिक गायन
- भावनात्मक, ऊर्जावान और अनुशासित आयोजन
श्रोताओं की प्रतिक्रिया
कार्यक्रम के अंत में श्रोताओं ने संतोष आनंद के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया। कई दर्शकों की आँखें नम थीं। युवा पीढ़ी ने भी बड़ी संख्या में भाग लेकर यह साबित किया कि हिंदी कविता और गीतों के प्रति आकर्षण आज भी जीवित है।
दर्शक विनोद यादव (अध्यापक, जवाहरलाल नेहरू बिद्यापीठ (बॉयज) हाई स्कूल) ने कहा, “आज लगा जैसे शब्द नहीं, जीवन बोल रहा था।”
सदीनामा पत्रिका के संपादक जीतेन्द्र जितांशु ने कहा, “आज की शाम ने मुझे मेरे युवाकाल में लौटा दिया। संतोष आनंद जी को सुनना केवल गीत सुनना नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन सुनना है। ऐसी आत्मीयता आज कम ही देखने को मिलती है।”
युवा छात्र रवि बैठा (स्नातकोत्तर विद्यार्थी) ने कहा कि मैंने ‘एक प्यार का नगमा है’ सिर्फ यूट्यूब पर सुना था। आज जब पूरा हॉल उनके साथ गा रहा था, तो लगा जैसे इतिहास के बीच बैठा हूँ। यह पीढ़ियों को जोड़ने वाला कार्यक्रम था।
दर्शक त्रिनेत्रकांत त्रिपाठी ने कहा, “आज समझ आया कि कविता केवल तुकबंदी नहीं होती, वह जीवन का निचोड़ होती है। संतोष जी की ऊर्जा 87 वर्ष की आयु में भी प्रेरणादायक है।”
कॉलेज छात्र (पहली बार कवि सम्मेलन में शामिल) “मैं दोस्तों के साथ सिर्फ जिज्ञासा में आया था, लेकिन अब लगता है कि ऐसे कार्यक्रमों में नियमित आना चाहिए। लाइव कविता का प्रभाव अलग ही होता है।”
वरिष्ठ नागरिक “जब ‘तिरंगा मेरी जान है’ गूँजा, तो पूरा सभागार खड़ा हो गया। यह केवल कार्यक्रम नहीं था, यह भावनाओं का राष्ट्रोत्सव था।”
एक गृहिणी दर्शक ने कहा कि वीरांगनाओं पर जो गीत प्रस्तुत हुआ, उसने मेरी आँखें नम कर दीं। मंच से जब कहा गया ‘चलो तिनका बन जाएँ’, तो लगा कि हम सचमुच समाज के लिए कुछ कर सकते हैं। मैं संतोष आनंद जी के गीतों के बीच कई बार रोई।
सामूहिक प्रतिक्रिया
कार्यक्रम के अंत में जब संतोष आनंद ने कहा, “मेरी ताकत आप हैं…” तो श्रोताओं ने खड़े होकर तालियों से उनका अभिवादन किया। सभागार में मौजूद कई युवाओं ने मंच के पास जाकर आशीर्वाद लिया। कई दर्शक भावुक होकर एक-दूसरे से कह रहे थे, “ऐसी शाम बार-बार नहीं मिलती।”
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