आजमगढ़ कस्टोडियल डेथ केस में पूर्व थानाध्यक्ष को उम्रकैद
2003 के आजमगढ़ कस्टोडियल डेथ मामले में 23 साल बाद बड़ा फैसला। पूर्व थाना अध्यक्ष जैनेंद्र कुमार सिंह को उम्रकैद। जानिए पूरी घटना, जाँच और अदालत का निर्णय।
23 साल बाद न्याय का फैसला: आजमगढ़ कस्टोडियल डेथ केस में पूर्व थाना अध्यक्ष को उम्रकैद
साल 2003 में आजमगढ़ के रानी की सराय थाने में हुई एक कथित कस्टोडियल डेथ ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। एफसीआई कर्मचारी हरिलाल यादव को बैटरी चोरी के आरोप में हिरासत में लिया गया और आरोप है कि थाने के भीतर उनकी बेरहमी से पिटाई की गई तथा गोली मार दी गई। 23 वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद 4 फरवरी 2026 को जिला एवं सत्र न्यायाधीश जयप्रकाश पांडे की अदालत ने तत्कालीन थाना अध्यक्ष जैनेंद्र कुमार सिंह को उम्रकैद की सजा सुनाई। यह फैसला कस्टोडियल हिंसा के मामलों में जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।
घटना: हिरासत से अस्पताल तक
29 मार्च 2003 की रात, रानी की सराय थाना पुलिस ने एफसीआई में कार्यरत हरिलाल यादव को बैटरी चोरी के आरोप में हिरासत में लिया। परिवार को जब इसकी सूचना मिली तो उनके पुत्र जितेंद्र यादव और रिश्तेदार रामवचन यादव थाने पहुंचे। आरोप है कि पुलिस ने दोनों को भी हवालात में बंद कर दिया।
परिवार के अनुसार, थाना अध्यक्ष जैनेंद्र कुमार सिंह के निर्देश पर हेड कॉन्स्टेबल नरेंद्र बहादुर सिंह ने हरिलाल की लाठियों से पिटाई की और फिर गोली मार दी। गंभीर अवस्था में उन्हें जिला अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उनकी मृत्यु हो गई।
अगली सुबह जब जितेंद्र और रामवचन को छोड़ा गया और वे अस्पताल पहुंचे, तब उन्हें हरिलाल की मौत की जानकारी मिली। इसके बाद कोतवाली में मुकदमा दर्ज कराया गया।
जाँच की दिशा और बदलाव
मामले की शुरुआत में पुलिस ने इसे गैर-इरादतन हत्या (धारा 304) के तहत दर्ज किया। लेकिन वादी पक्ष की आपत्ति और प्रार्थना पत्र के बाद सरकार ने सितंबर 2003 में जाँच सीबीसीआईडी को सौंप दी।
- फरवरी 2005: सीबीसीआईडी ने धारा 302 (हत्या) में चार्जशीट दाखिल की।
- 2017: सह-अभियुक्त नरेंद्र बहादुर सिंह की मृत्यु हो गई।
- आरोप तय होने और सुनवाई की प्रक्रिया में लंबा अंतराल रहा।
- 2019 में साक्ष्य दर्ज होने शुरू हुए।
- मुख्य गवाहों की जिरह 2021 तक चली।
लंबे समय के दौरान कई गवाहों के बयान बदले, कुछ पक्षद्रोही हो गए और प्रक्रिया बार-बार टलती रही।
अदालत का फैसला
4 फरवरी 2026 को अदालत ने सात प्रमुख गवाहों के बयान और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर निर्णय सुनाया। अदालत ने पाया कि हिरासत में मारपीट और गोली चलने की घटना हुई, जिसकी जिम्मेदारी तत्कालीन थाना अध्यक्ष पर तय होती है।
सजा का विवरण
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अभियुक्त |
स्थिति |
सजा |
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जैनेंद्र कुमार सिंह (तत्कालीन थाना अध्यक्ष) |
दोषी सिद्ध |
उम्रकैद |
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नरेंद्र बहादुर सिंह (हेड कॉन्स्टेबल) |
2017 में निधन |
कार्यवाही समाप्त |
सजा सुनाए जाने के बाद दोषी पूर्व थाना अध्यक्ष को जिला जेल भेज दिया गया। उन्होंने दो वर्ष पूर्व स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ले ली थी।
23 साल की न्यायिक यात्रा
इस मामले की सुनवाई में लगभग 23 वर्ष लगे। आरोप पत्र दाखिल होने से लेकर गवाहों की जिरह और अंतिम बहस तक, हर चरण में देरी हुई। न्यायालय ने माना कि देरी के बावजूद उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दोष सिद्ध होता है।
यह मामला यह भी दिखाता है कि
- न्यायिक प्रक्रिया में विलंब किस प्रकार पीड़ित परिवार को वर्षों तक संघर्ष में रखता है।
- गवाहों के पक्षद्रोही होने और दबाव की आशंका न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
- फिर भी, अदालतें अंततः जवाबदेही तय कर सकती हैं।
क्या यह न्याय है?
हरिलाल यादव के परिवार के लिए यह फैसला एक प्रकार की कानूनी जीत है, लेकिन 23 वर्षों की प्रतीक्षा उनकी पीड़ा को कम नहीं कर सकती। यह मामला कस्टोडियल डेथ जैसे संवेदनशील विषय पर गंभीर प्रश्न उठाता है-
- क्या हिरासत में सुरक्षा सुनिश्चित है?
- क्या जाँच एजेंसियों की स्वतंत्रता पर्याप्त है?
- क्या न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी होनी चाहिए?
यह निर्णय राज्य तंत्र को यह संदेश देता है कि हिरासत में हिंसा के मामलों में जवाबदेही से बचना आसान नहीं है, चाहे समय कितना भी बीत जाए।
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