29 साल बाद इंसाफ: वाराणसी में पुलिस कस्टडी में प्रताड़ना से मौत, दरोगा को 10 साल, डॉक्टर को 5 साल की सजा
29 साल पुराने वाराणसी कस्टडी मौत मामले में कोर्ट का बड़ा फैसला: बस सीट विवाद में पकड़े गए राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुलिस प्रताड़ना से मौत, फर्जी आत्महत्या का केस, दरोगा को 10 साल और डॉक्टर को 5 साल की सजा। पूरी कहानी पढ़ें।
वाराणसी, 2 जून 2026। लगभग तीन दशक पुराने पुलिस हिरासत में मौत के मामले में वाराणसी की विशेष अदालत (भ्रष्टाचार निवारण) ने सोमवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जंसा थाना क्षेत्र के बखरिया गांव निवासी राजेंद्र प्रसाद सिंह (42) की 5 फरवरी 1997 को सुंदरपुर पुलिस चौकी में हुई मौत को लेकर तत्कालीन चौकी प्रभारी नरेंद्र प्रताप सिंह को 10 वर्ष की कैद, जांच अधिकारी राधेश्याम सिंह को 6 माह की कैद और पोस्टमॉर्टम करने वाले प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केके जैन को 5 वर्ष की कैद व 40 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई है।
घटना का क्रम
5 फरवरी 1997 को राजेंद्र प्रसाद सिंह अपने बीमार बेटे के लिए दवा लेने ककरमट्टा से महानगर बस पकड़कर सुंदरपुर जा रहे थे। बस में एक यात्री के साथ सीट को लेकर छोटा-सा विवाद हो गया। सुंदरपुर चौकी पहुंचकर तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह ने एक यात्री (दयाराम) की जेब से 100 रुपये चोरी करने का आरोप लगाकर राजेंद्र को हिरासत में ले लिया। उसी शाम हिरासत में पुलिस की क्रूर प्रताड़ना से राजेंद्र प्रसाद सिंह की मौत हो गई। पुलिस ने मामले को रफा-दफा करने के लिए आत्महत्या का नाटक रचा। उन्होंने दावा किया कि राजेंद्र ने अपने शॉल को फंदा बनाकर बैरक में सीलिंग फैन से लटककर आत्महत्या कर ली।
पोस्टमॉर्टम और साजिश
6 फरवरी 1997 को बीएचयू (BHU) में पोस्टमॉर्टम हुआ। मंडलीय अस्पताल के डॉक्टर केके जैन ने रिपोर्ट में मौत का कारण फंदे से दम घुटना बताया। पुलिस ने परिजनों को सूचना दिए बिना शव का अंतिम संस्कार कर दिया। राजेंद्र की पत्नी शशीमा देवी ने 11 फरवरी 1997 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) में शिकायत दर्ज कराई। NHRC के हस्तक्षेप के बाद मामले की जांच CBCID को सौंपी गई। CBCID जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए- बैरक में सीलिंग फैन ही नहीं था। मौत प्रताड़ना से हुई थी, आत्महत्या नहीं। डॉ. केके जैन ने पुलिसकर्मियों को बचाने की कोशिश की।
फैसला और सजा
अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश (एंटी करप्शन) अमित कुमार तिवारी की अदालत ने दोषसिद्धि के बाद सजा सुनाई:
- नरेंद्र प्रताप सिंह (तत्कालीन चौकी प्रभारी): 10 वर्ष कैद + 31,000 रुपये जुर्माना
- डॉ. केके जैन: 5 वर्ष कैद + 40,000 रुपये जुर्माना
- राधेश्याम सिंह (जांच अधिकारी): 6 माह कैद + 1,000 रुपये जुर्माना
कोर्ट ने जुर्माने की 50% राशि मृतक के परिजनों को देने का आदेश दिया। तीनों आरोपी अब 70-85 वर्ष के बीच के हैं। यह मामला भारतीय पुलिस व्यवस्था, न्यायिक प्रक्रिया की सुस्त गति और कस्टोडियल डेथ में मिलीभगत की मिसाल बन गया है। 29 वर्षों की लंबी लड़ाई के बाद शशीमा देवी और परिवार को आंशिक न्याय मिला है, लेकिन खोया हुआ जीवन और पीड़ा कभी वापस नहीं आ सकती।
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