उदंत मार्तंड द्वि-शताब्दी समारोह : कोलकाता में हिंदी पत्रकारिता के भविष्य पर गंभीर मंथन

भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता में आयोजित उदंत मार्तंड द्वि-शताब्दी समारोह में शंभुनाथ, ओम थानवी, प्रियदर्शन सहित वरिष्ठ पत्रकारों और साहित्यकारों ने हिंदी पत्रकारिता, लोकतंत्र, फेक न्यूज और मीडिया संकट पर गंभीर चर्चा की।

May 24, 2026 - 22:32
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उदंत मार्तंड द्वि-शताब्दी समारोह : कोलकाता में हिंदी पत्रकारिता के भविष्य पर गंभीर मंथन
मंचासीन विद्वतगण

उदंत मार्तंड द्वि-शताब्दी समारोह में गूंजा सवाल : क्या पत्रकारिता अब जनता की नहीं, सत्ता की आवाज़ बनती जा रही है?”

कोलकाता, 23 मई। हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता में आयोजित उदंत मार्तंड द्वि-शताब्दी समारोहसाहित्य, पत्रकारिता और सांस्कृतिक चेतना का एक महत्वपूर्ण आयोजन बनकर उभरा। समारोह में देश के वरिष्ठ पत्रकारों, लेखकों, शिक्षकों, शोधार्थियों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक भूमिका, वर्तमान संकट और भविष्य की संभावनाओं पर गंभीर विमर्श किया। कार्यक्रम की शुरुआत परिषद की ओर से स्वागत वक्तव्य के साथ हुई, जिसे डॉ. कुसुम खेमानी की ओर से श्रीमती बिमला पोद्दार ने प्रस्तुत किया। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता की दो सौ वर्ष लंबी यात्रा को भारतीय समाज की लोकतांत्रिक चेतना का अभिन्न हिस्सा बताया।

हर महान स्मृति पुनर्निर्माण की प्रेरणा है- शंभुनाथ

वरिष्ठ लेखक एवं वागर्थके संपादक डॉ. शंभुनाथ ने उद्घाटन वक्तव्य में कहा कि हर महान स्मृति पुनर्निर्माण की प्रेरणा होती है।उन्होंने हिंदी के प्रथम समाचार पत्र उदंत मार्तंडके मूल उद्देश्य- हिंदुस्तानियों के हित के हेत को आज भी प्रासंगिक बताया। उन्होंने कहा कि डिजिटल मीडिया के इस दौर में झूठ, भ्रम और फेक न्यूज का प्रसार अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच चुका है। ऐसे समय में प्रिंट मीडिया आज भी पाठकों के बीच अधिक विश्वसनीय माना जाता है।

अखबार समाज के साथ है या सरकार के?” - ओम थानवी

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक ओम थानवी ने पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मीडिया पर बढ़ते आर्थिक और राजनीतिक दबाव ने अखबारों को गोरखधंधेकी स्थिति तक पहुंचा दिया है। उन्होंने तीखा प्रश्न उठाया- आज समझना कठिन हो गया है कि अखबार समाज के साथ खड़ा है या सरकार के। उनका वक्तव्य सभागार में उपस्थित श्रोताओं के बीच गहरी प्रतिक्रिया का कारण बना।

पत्रकार को सच के अधिक निकट जाना होगा- विश्वंभर नेवर

ताज़ा टीवी के संपादक विश्वंभर नेवर ने बंगाल को भारतीय पत्रकारिता की जन्मभूमि बताते हुए कहा कि पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता के कथनों को दोहराना नहीं, बल्कि सच के निकट जाकर उसे देखना और समाज के सामने रखना है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता तभी बचेगी जब पत्रकार स्वतंत्र दृष्टि और नैतिक साहस बनाए रखेंगे।

पत्रकारिता का कमजोर होना लोकतंत्र का कमजोर होना है

इस सत्र का संचालन श्रद्धांजलि सिंह ने किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं बल्कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, और उसका कमजोर होना लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण का संकेत है। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए आशीष झुनझुनवाला ने कहा कि लोकतंत्र के प्रति अखबारों की जिम्मेदारी आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में थी।

दूसरे सत्र में मीडिया संकट, प्रवासी पत्रकारिता और स्त्री उपस्थिति पर विमर्श

दूसरे सत्र में वरिष्ठ पत्रकार गंगा प्रसाद ने वर्तमान मीडिया परिदृश्य की आलोचना करते हुए कहा कि आज पत्रकारों को ‘पॉजिटिव खबर’ लिखने के निर्देश दिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि पेड न्यूज का बाजार इतना व्यापक हो चुका है कि कई बार खबर और विज्ञापन के बीच का अंतर मिट जाता है।

विदेशों में हिंदी पत्रकारिता की भूमिका

अंतरराष्ट्रीय हिंदी केंद्र, रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के निदेशक जवाहर कर्णावट ने प्रवासी हिंदी पत्रकारिता के इतिहास पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि विदेशी धरती पर भी हिंदी पत्रकारिता ने भारतीयों के हित और स्वाधीनता चेतना को जीवित रखा। उन्होंने उल्लेख किया कि ‘सत्याग्रह’ शब्द का वैचारिक विकास भी इंडियन ओपिनियनजैसे प्रकाशनों से जुड़ा हुआ है।

लोकतंत्र का चौथा खंभा संकट में है

स्कॉटिश चर्च कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर गीता दूबे ने कहा कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आज गंभीर संकट से गुजर रहा है। वहीं खिदिरपुर कॉलेज की प्रोफेसर इतु सिंह ने पत्रकारिता में स्त्री पत्रकारों की भूमिका और बढ़ती उपस्थिति पर प्रकाश डाला।

पहले अखबार कमजोरों की आवाज हुआ करता था

वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन ने अध्यक्षीय वक्तव्य में हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक निर्भीकता को याद करते हुए कहा, पहले अखबार कमजोरों की आवाज हुआ करता था, आज वह मजबूतों का बयान बनता जा रहा है।

उन्होंने पत्रकारिता में वैचारिक स्वतंत्रता और सामाजिक सरोकारों के क्षरण पर चिंता जताई। इस सत्र का संचालन आरबीसी सांध्य कॉलेज की हिंदी प्राध्यापक कलावती ने किया।

पुस्तक लोकार्पण और शोध संवाद

इस अवसर पर संयोजक संजय जायसवाल के संपादन में भारतीय भाषा परिषद द्वारा प्रकाशित पुस्तक हिंदी पत्रकारिता: अतीत और भविष्य का लोकार्पण किया गया। इसके बाद आयोजित शोध संवाद सत्र की अध्यक्षता डॉ. अभिज्ञात ने की। डॉ. मधु प्रभा सिंह, डॉ. सुषमा सिंह, बृजेश प्रसाद, रूपल साव, प्रीतम रजक, पूर्णिमा हरि और रविकांत कुमार सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों एवं शिक्षकों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। सत्र का संचालन लिली शाह ने किया।

कविता कोलाज, नृत्य और संगीत से जीवंत हुआ सांस्कृतिक सत्र

कार्यक्रम के सांस्कृतिक सत्र में ‘सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन’ के विभिन्न समूहों ने कविता कोलाज प्रस्तुत किया। इसमें बड़ी संख्या में युवा साहित्यकारों, विद्यार्थियों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने भागीदारी की। कविता प्रस्तुति में डॉ. इतु सिंह, श्रद्धांजलि सिंह, रामशंकर सिंह, मनीषा गुप्ता, नमिता जैन, सुशील पांडेय, पूजा गुप्ता, प्रमोद कुमार, इबरार ख़ान, सुषमा कुमारी, विशाल कुमार साव, आदित्य तिवारी, कंचन भगत, निधि सिंह, आदित्य पासवान सहित अनेक प्रतिभागियों ने अपनी रचनात्मक उपस्थिति दर्ज कराई।

देबजानी अदक एकेडमी फॉर डांस, प्रज्ञा झा और स्नेहा मिश्रा की नृत्य प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं आरिस्ता प्रकाश, राघव डागा और रौनक भट्टाचार्जी की संगीत प्रस्तुतियों ने आयोजन को सांगीतिक ऊंचाई प्रदान की।

सम्मान सत्र में शंभुनाथ का अभिनंदन

समारोह के सम्मान सत्र में रामनिवास द्विवेदी, डॉ. मंजुरानी सिंह और डॉ. अवधेश प्रसाद सिंह ने वरिष्ठ साहित्यकार शंभुनाथ का अभिनंदन किया। कार्यक्रम में कोलकाता एवं आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में साहित्य, पत्रकारिता और संस्कृति से जुड़े लोग उपस्थित रहे। समारोह ने हिंदी पत्रकारिता की दो सौ वर्ष पुरानी विरासत को नई पीढ़ी के सामने पुनः जीवंत कर दिया।

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सुशील कुमार पाण्डेय मैं, अपने देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनने की यात्रा पर हूँ, यही मेरी पहचान है I