“हिंदुस्तानी भाषा अंग्रेजों की देन नहीं”: प्रो. इमरे बंघा ने कोलकाता में मिथकों को दी चुनौती
कोलकाता स्थित भारतीय भाषा परिषद में आयोजित एकल व्याख्यान में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय (यू.के.) के प्रख्यात हिंदी विद्वान प्रो. इमरे बंघा ने 'हिंदुस्तानी भाषा : मिथक और नई खोज' विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हिंदुस्तानी भाषा का इतिहास अंग्रेजों से पूर्व का है और इसे औपनिवेशिक निर्मिति मानना ऐतिहासिक सरलीकरण है। उन्होंने मुगलकालीन स्रोतों, यात्रावृत्तों और पांडुलिपियों के आधार पर यह प्रतिपादित किया कि हिंदुस्तानी एक व्यापक संपर्क भाषा के रूप में उत्तर भारत में विकसित हुई थी।
कोलकाता, 28 फरवरी 2026। भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता द्वारा ‘हिंदुस्तानी भाषा : मिथक और नई खोज’ विषय पर एक महत्वपूर्ण एकल व्याख्यान आयोजित किया गया। इस अवसर पर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, यू.के. के प्रख्यात हिंदी विद्वान प्रो. इमरे बंघा ने हिंदुस्तानी भाषा के इतिहास, स्वरूप और औपनिवेशिक पुनर्पाठ पर गंभीर विचार प्रस्तुत किए।
व्याख्यान की शुरुआत करते हुए प्रो. बंघा ने प्रश्न उठाया कि क्या हिंदुस्तानी भाषा का सबसे प्राचीन प्रयोग अमीर खुसरो की रचनाओं में मिलता है, या उसका इतिहास इससे भी पूर्व का है? उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक अकादमिक विमर्श में हिंदी को 19वीं सदी की औपनिवेशिक संरचना के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जबकि ऐतिहासिक साक्ष्य इस धारणा को चुनौती देते हैं।
उन्होंने बताया कि दिल्ली सल्तनत और मुगल काल में एक संपर्क-आधारित भाषा विकसित हुई, जिसे विभिन्न स्रोतों में ‘हिंदुस्तान भाषा’, ‘दहलवी’ या ‘रेख्ता’ कहा गया। यह भाषा प्रशासन, सैनिक शिविरों, व्यापारिक संपर्कों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में व्यापक रूप से प्रयुक्त होती थी।
प्रो. बंघा ने मुगलकालीन अभिलेखों, यात्रियों के विवरणों तथा संत-सूफी साहित्य के उदाहरण देते हुए कहा कि हिंदुस्तानी न तो केवल दरबारी भाषा थी और न ही किसी एक लिपि या समुदाय तक सीमित। यह नागरी, फारसी, गुरुमुखी और कैथी जैसी विविध लिपियों में लिखी जाती थी। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि 18वीं सदी में उर्दू के मानकीकरण और 19वीं सदी में हिंदी के संस्कृतनिष्ठ पुनर्गठन के बाद ‘हिंदुस्तानी’ शब्द धीरे-धीरे विमर्श से बाहर हो गया।
व्याख्यान में यह भी रेखांकित किया गया कि अंग्रेजों से पूर्व हिंदुस्तानी एक जीवंत लोक-संपर्क भाषा के रूप में पंजाब से बंगाल और दक्कन तक प्रयुक्त होती थी। विदेशी यात्रियों और मिशनरियों ने भी इसे व्यावहारिक और आवश्यक भाषा माना।
प्रो. बंघा ने कहा कि भाषा का इतिहास केवल शब्दों का इतिहास नहीं, बल्कि सत्ता, संस्कृति और समाज की संरचना का इतिहास भी है। इसलिए हिंदी-उर्दू विभाजन के पूर्व की साझा भाषाई परंपरा को समझना आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. संजय जायसवाल ने किया। परिषद के निदेशक शंभुनाथ की उपस्थिति में कार्यक्रम संपन्न हुआ। अंत में भारतीय भाषा परिषद की उपाध्यक्ष विमला पोद्दार ने वक्ता के प्रति आभार ज्ञापित किया गया।
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