“हिंदुस्तानी ही कभी ईरान से बंगाल तक भारत की संपर्क भाषा थी” - प्रो. इमरे बंघा
कोलकाता में प्रो. इमरे बंघा ने कहा कि हिंदुस्तानी 13वीं सदी से भारत की संपर्क भाषा थी और हिंदी अंग्रेजों की निर्मिति नहीं है।
कोलकाता, 1 मार्च। भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता में आयोजित ‘हिंदुस्तानी भाषा : मिथक और नई खोज’ विषयक विशेष व्याख्यान में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय (इंग्लैंड) के हिंदी प्रोफेसर प्रो. इमरे बंघा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह धारणा ऐतिहासिक रूप से असंगत है कि हिंदी का निर्माण अंग्रेजों के काल में हुआ। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तानी 13वीं सदी से ही भारत की संपर्क भाषा के रूप में स्थापित थी और ईरान से बंगाल तक व्यापारियों, सैनिकों तथा विभिन्न भाषायी समुदायों के बीच संवाद का माध्यम थी।
प्रो. बंघा, जो मूलतः हंगरी के हैं और वर्तमान में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर हैं, भारतीय भाषा परिषद के विशेष आमंत्रण पर यह व्याख्यान दे रहे थे। अपने संबोधन में उन्होंने अमीर खुसरो से पूर्व के स्रोतों और मुगलकालीन साक्ष्यों के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि हिंदुस्तानी भाषा का विकास स्वाभाविक ऐतिहासिक प्रक्रिया के अंतर्गत हुआ था, न कि औपनिवेशिक प्रयोगशाला में।
उन्होंने उल्लेख किया कि मराठा शासक शिवाजी और मुगल सम्राट औरंगज़ेब के बीच संवाद की भाषा हिंदुस्तानी थी, जो इस बात का प्रमाण है कि वह तत्कालीन राजनीतिक और सैनिक संप्रेषण की सशक्त भाषा थी। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि प्रदेशानुसार हिंदुस्तानी में विविधता अवश्य थी, परंतु उसका मूल व्याकरणिक ढाँचा और संपर्क-क्षमता व्यापक थी।
18वीं सदी के बांग्ला साहित्यकार भरत चंद्र राय के संदर्भ का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि बंगाल के शिक्षित समाज में भी हिंदुस्तानी का ज्ञान और प्रयोग था। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तानी किसी एक लिपि या समुदाय तक सीमित नहीं थी; वह सांस्कृतिक संपर्क और सामाजिक संवाद की भाषा थी।
कार्यक्रम के प्रारंभ में प्रो. इमरे बंघा का स्वागत करते हुए ईश्वरी प्रसाद टाँटिया ने कहा कि विदेशी होते हुए भी प्रो. बंघा हिंदी के अद्भुत शोधकर्ता और विद्वान हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि प्रो. बंघा ने विश्व भारती, शांतिनिकेतन से शिक्षा प्राप्त की है और भारतीय भाषाई परंपरा से गहरा संबंध रखते हैं।
रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय के प्रो. हितेंद्र पटेल ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी को 19वीं सदी के अंग्रेजी राज की देन बताना ऐतिहासिक भूल है और इस मिथक का अकादमिक प्रतिरोध होना चाहिए।
अध्यक्षीय वक्तव्य में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शंभुनाथ ने कहा कि अवधी, ब्रज, राजस्थानी, भोजपुरी और मैथिली हिंदी की आत्मा हैं, जबकि हिंदुस्तानी खड़ी बोली हिंदी की काया है। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी और प्रेमचंद हिंदुस्तानी के समर्थक थे, पर 1947 के विभाजन के साथ इस साझा भाषाई इतिहास को स्थगित कर दिया गया। लगभग 700 वर्षों तक हिंदुस्तानी एक जीवंत संपर्क भाषा रही, किंतु अंग्रेजी वर्चस्व ने उसके स्थान को सीमित कर दिया।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ. संजय जायसवाल ने कहा कि हिंदुस्तानी ने भारत की सामासिक संस्कृति और साहित्य को विस्तार दिया। ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन से पूर्व ही हिंदुस्तानी की जमीन तैयार हो चुकी थी। उन्होंने हिंदुस्तानी की तुलना यूरोप की लैटिन भाषा से करते हुए कहा कि जिस प्रकार लैटिन यूरोप में ज्ञान और संपर्क की भाषा थी, उसी प्रकार हिंदुस्तानी भारत में व्यापक रूप से प्रचलित थी।
इस अवसर पर रामनिवास द्विवेदी, आशीष झुनझुनवाला, महेश जायसवाल, प्रियंकर पालीवाल, प्रो. वेदरमण पांडेय, अभिज्ञात, जीतेंद्र जीतांशु, सुषमा कुमारी, डॉ. आदित्य गिरी, राहुल गौड़, संजय दास, सुरेश शाह, डॉ. पूजा शुक्ला, डॉ. प्रियंका सिंह, डॉ. संजय राय, डॉ. रमाशंकर सिंह, प्रमोद कुमार, नमिता जैन, डॉ. सुमिता गुप्ता, डॉ. शिव प्रकाश दास, सुशील पांडेय, प्रिया गुप्ता, सत्यम पांडेय, अंजलि साव, वंदना जैन, प्रदीप धानुक, अजय पोद्दार, नैना प्रसाद, सुब्बू तबस्सुम, नेहा कुमारी साव, संजना जायसवाल, अपराजिता, अनिल साह, सुकन्या तिवारी, इशरत जहां सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।
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